अखबार का सिंगल कॉलम और पत्रकार की अनदेखी: जब समाचारदाता खुद खबर नहीं बन पाता

पत्रकारिता की कमान पर बैठे कुछ नामचीन संपादक और बड़े प्रकाशन घर अक्सर इस बात का फैसला करते हैं कि किस खबर को कितना महत्व मिलेगा। पर सवाल यह है कि क्या वही नियम उन लोगों पर भी लागू किए जाने चाहिए जो सालों हुए समाज के लिए खबरें लाते रहे — पर स्वयं का अंतिम समाचार सिंगल कॉलम में समेट दिया जाए।

दीपेश जी जैसे अनुभवी पत्रकार, जिनका करियर चालीस साल के आस-पास गुजरा, उनके जाने पर अधिकांश बड़े अखबारों ने वही परम्परागत “सिंगल कॉलम” सौंप कर जैसा तामझाम नहीं दिखाया, उसने एक व्यापक सोच की कमी को उजागर किया है।
पत्रकार अपना जीवन समाज के दर्पण बने रहने में लगा देता है। वे न सिर्फ खबरें जुटाते हैं, बल्कि लोकतंत्र की निगरानी करते हैं, सत्ता को प्रश्नों के घेरे में लाते हैं और आमजन की आवाज़ बनते हैं। फिर भी जब वही पत्रकार दुनिया से विदा ले लेता है, तो उसे मिलने वाला सम्मान अक्सर औपचारिक और सीमित रह जाता है—यह सिर्फ व्यक्तिगत प्रति के मामले नहीं है, यह मीडिया-संस्कृति और प्राथमिकताओं का प्रतिबिम्ब है। यदि समाज पत्रकार को महत्व ही न दे, तो पत्रकारिता की गरिमा पर भी असर पड़ेगा।
यहाँ दोष केवल मालिकों या संपादकों का नहीं ठहराया जा सकता; पेजीनेटर, उप-संपादक और प्रकाशन की दैनिक प्राथमिकताएँ—सब मिलकर तय करते हैं कि कौन-सा नाम हेडलाइन में रहेगा और किसे एक सिंगल कॉलम में निबटा दिया जाए। पर इसका अर्थ यह नहीं बनना चाहिए कि अनुभवी और कर्मठ पत्रकारों की जिंदगियों और संघर्षों को छोटा आँका जाए। मीडिया संस्थानों को अपने आंतरिक मनदंडों पर पुनर्विचार करना चाहिए और एक संवेदनशील, सम्मानजनक रीति-रिवाज विकसित करना चाहिए जो अनुगामी नीति से ऊपर खड़ा हो।
कुछ अखबार—जैसे दैनिक आजाद सिपाही—ने दीपेश जी के निधन पर तीन कॉलम की जगह देकर दिखाया कि सम्मान केवल शब्दों में नहीं, बल्कि मंच की चौड़ाई में भी दिया जा सकता है। यह एक सकारात्मक उदाहरण है जिसे अन्य संस्थानों को अपनाना चाहिए। नीतिगत तौर पर यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि दीर्घकालिक सेवा देने वाले पत्रकारों के निधन पर उन्हें कम-से-कम सम्मानजनक श्रेणी और स्मृति स्थान दिया जाएगा, ताकि प्रकाशन केवल व्यावसायिक प्राथमिकता न बनकर सामाजिक ज़िम्मेदारी भी निभाएँ।
समाज के लिए खबर लाने वालों की बदौलत ही हम सच से परिचित होते हैं; उनका अंतिम सम्मान समाज की परिपक्वता और मीडिया के आत्म-सम्मान का परीक्षण है। दीपेश जी जैसे पत्रकारों को वह दर्जा मिलना चाहिए जिसका वे हकदार हैं—न केवल व्यक्तिगत श्रद्धांजलि के रूप में, बल्कि संस्थागत नीति में बदलाव के जरिए भी। मीडिया हाउसों, संपादकों और पत्रकार संगठनों से आग्रह है कि वे इस मसले पर गंभीर विमर्श करें और एक संवेदनशील, सम्मानजनक प्रैक्टिस अपनाएँ।
दीपेश जी को विनम्र श्रद्धांजलि। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दें।

dilip karndhar ✍🏽

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