पत्रकार की पिटाई खबर है, लेकिन भ्रष्टाचार उसकी जड़ है

.….सी एम जैन

दिल्ली में 4PM News Network की पत्रकार शाहीन खान और नफीसा खान के साथ मारपीट का मामला राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है। ऐसा होना भी चाहिए। यदि कोई पत्रकार सवाल पूछने की वजह से प्रताड़ित किया जाता है, तो यह केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि लोकतंत्र के उस सिद्धांत पर हमला है जो सत्ता से जवाब मांगने का अधिकार देता है। पत्रकारिता का मूल काम ही सवाल पूछना है। इसलिए किसी पत्रकार के साथ हिंसा या दुर्व्यवहार की निंदा जितनी की जाए, कम है।

लेकिन इस घटना के शोर के बीच एक और सवाल है, जो शायद अधिक असहज है और इसलिए कम पूछा जाता है।

आखिर हम केवल तब क्यों जागते हैं जब कोई पत्रकार पिटता है, कोई वीडियो वायरल होता है, कोई बड़ी त्रासदी सामने आती है या किसी नागरिक के साथ खुला अन्याय हो जाता है? उससे पहले उन परिस्थितियों पर बहस क्यों नहीं होती जो ऐसी घटनाओं को संभव बनाती हैं?

आज देश में शायद ही कोई ऐसा नागरिक होगा जिसे यह न पता हो कि भ्रष्टाचार क्या है, कैसे होता है और किन स्तरों पर होता है। रिश्वत लेकर फाइल आगे बढ़ाना, पैसे लेकर लाइसेंस जारी करना, अवैध निर्माण को संरक्षण देना, नियमों को धन के बदले मोड़ देना, प्रभावशाली लोगों के लिए कानून को कमजोर और आम आदमी के लिए कठोर बना देना—यह सब किसी रहस्य का हिस्सा नहीं है। यह सब खुली आंखों के सामने होता है। फिर भी समाज का बड़ा हिस्सा इसे व्यवस्था का सामान्य हिस्सा मानकर स्वीकार कर चुका है।

यही स्वीकार्यता सबसे खतरनाक है।

भ्रष्टाचार केवल पैसे का लेन-देन नहीं है। यह सत्ता के समानांतर एक ऐसी अदृश्य व्यवस्था है जो नियमों से अधिक प्रभावशाली हो जाती है। एक रिश्वत केवल किसी एक अधिकारी की जेब नहीं भरती; वह अक्सर संरक्षण, राजनीतिक संपर्क, प्रशासनिक नेटवर्क और जवाबदेही से बच निकलने की संस्कृति को भी मजबूत करती है। धीरे-धीरे यह व्यवस्था इतनी मजबूत हो जाती है कि कानून का भय कम और सत्ता का अहंकार अधिक दिखाई देने लगता है।

यही कारण है कि जब किसी नागरिक, व्यापारी, किसान, मजदूर या पत्रकार के साथ अन्याय होता है, तो हमें केवल अंतिम घटना दिखाई देती है। हम पेड़ देखते हैं, जंगल नहीं।

हम उस पुलिसकर्मी, अधिकारी या कर्मचारी को देखते हैं जिसने कथित रूप से गलत व्यवहार किया, लेकिन उस तंत्र को नहीं देखते जिसने वर्षों तक जवाबदेही से मुक्त होकर उसे यह विश्वास दिलाया कि वह बच जाएगा। हम उस दिन पर चर्चा करते हैं जब अत्याचार हुआ, लेकिन उन हजारों दिनों पर नहीं जब छोटी-छोटी अनियमितताओं को सामान्य मानकर छोड़ दिया गया।

दरअसल किसी भी लोकतंत्र में दमन अचानक पैदा नहीं होता। वह धीरे-धीरे विकसित होता है। उसकी शुरुआत किसी पत्रकार की पिटाई से नहीं होती। उसकी शुरुआत तब होती है जब रिश्वत को “चलता है” कहा जाता है। जब फर्जीवाड़े को “सब करते हैं” कहकर टाल दिया जाता है। जब नियमों की हत्या को “व्यवस्था ऐसे ही चलती है” कहकर उचित ठहराया जाता है। जब जनता शिकायत करना छोड़ देती है और केवल सहना सीख जाती है।

एक ईमानदार अधिकारी और एक भ्रष्ट अधिकारी के बीच सबसे बड़ा अंतर केवल नैतिकता का नहीं, बल्कि निर्भरता का होता है। ईमानदार अधिकारी को अपने पद को बचाने के लिए किसी भ्रष्ट नेटवर्क की जरूरत नहीं होती। उसे किसी अवैध कमाई की रक्षा नहीं करनी होती। उसे किसी संरक्षणदाता को खुश नहीं रखना होता। लेकिन जब भ्रष्टाचार व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है, तब पद, पोस्टिंग, प्रभाव और संरक्षण एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। ऐसे माहौल में अधिकार सेवा का माध्यम नहीं, शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन सकता है।

यही वजह है कि भ्रष्टाचार को केवल आर्थिक अपराध समझना भूल होगी। यह लोकतांत्रिक संस्थाओं के चरित्र को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया है। यह नागरिक और राज्य के बीच भरोसे को कमजोर करता है। यह कानून को समानता से लागू होने से रोकता है। और सबसे महत्वपूर्ण बात, यह उन लोगों को साहस देता है जो मान बैठते हैं कि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी।

आज यदि पत्रकारों के साथ मारपीट का मामला देशभर में चर्चा का विषय है, तो यह स्वागतयोग्य है। लेकिन यदि यह चर्चा केवल घटना तक सीमित रह जाए और उस व्यवस्था पर सवाल न उठाए जो जवाबदेही से बच निकलने की संस्कृति पैदा करती है, तो हम फिर वही गलती दोहराएंगे जो वर्षों से करते आए हैं।

समस्या केवल यह नहीं कि कोई पत्रकार पिटा। समस्या यह भी है कि हम उस मिट्टी को पहचानने से इंकार करते हैं जिसमें ऐसे घटनाक्रम पनपते हैं।

समाज अक्सर भ्रष्टाचार को एक मामूली बुराई मानता है और दमन को बड़ी बुराई। जबकि वास्तविकता यह है कि दमन अक्सर भ्रष्टाचार की ही परिपक्व अवस्था होता है। जब नियम बिकने लगते हैं, तब अधिकार कमजोर पड़ने लगते हैं। जब जवाबदेही समाप्त होती है, तब मनमानी शुरू होती है। और जब मनमानी सामान्य हो जाती है, तब अत्याचार केवल समय का प्रश्न रह जाता है।

इसलिए पत्रकारों की सुरक्षा, नागरिक अधिकारों की रक्षा और लोकतंत्र की मजबूती की लड़ाई केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की लड़ाई नहीं है। यह भ्रष्टाचार के विरुद्ध भी लड़ाई है। क्योंकि जो व्यवस्था रोजमर्रा की बेईमानी को सहन करती है, वही एक दिन बड़े अन्याय को भी जन्म देती है।

सवाल केवल यह नहीं है कि शाहीन खान और नफीसा खान के साथ क्या हुआ।

सवाल यह भी है कि हम उस व्यवस्था के बारे में कब बात करेंगे जो ऐसे आरोपों को संभव बनाती है।

और शायद उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या हम अभी भी भ्रष्टाचार को एक मामूली समस्या मानते रहेंगे, या उसे लोकतंत्र की जड़ों को खोखला करने वाली सबसे बड़ी बीमारी के रूप में पहचानेंगे?

क्योंकि इतिहास बताता है—लोकतंत्र की हत्या हमेशा किसी बड़े धमाके से नहीं होती, कई बार वह छोटे-छोटे समझौतों, सामान्यीकृत भ्रष्टाचार और समाज की लंबी खामोशी से होती है। शेष फिर।

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