Editorial

लोकतंत्र के गलियारे या भीड़तंत्र का पहरा: प्रेस की स्वतंत्रता पर मंडराता संकट

लोकतंत्र का चतुर्थ स्तंभ समझी जाने वाली स्वतंत्र पत्रकारिता पर बढ़ता वैचारिक और राजनीतिक संकट किसी भी सभ्य राष्ट्र के…

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बढ़ती प्याज की कीमतें, ‘कांदा एक्सप्रेस’ और भारतीय खाद्य राजनीति के कड़े यथार्थ

भारतीय रसोई की थाली में आवश्यक मानी जाने वाली सब्जियों में से एक—प्याज—के तेवर एक बार फिर तल्ख हो चले…

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झारखंड का छात्र आंदोलन : जब लोकतंत्र ने लाठी से नहीं, संवाद से रास्ता खोजा

झारखंड के 24 दिनों लंबे छात्र आंदोलन ने केवल एक भर्ती परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल नहीं उठाया है; उसने…

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“दिमागी नक्सल” का शिगूफा और लोकतंत्र में सवाल पूछने का मौलिक अधिकार

…….पण्डित प्रदीप शुक्ल भारतीय राजनीतिक विमर्श में पिछले कुछ वर्षों में शब्दावलियों का एक नया शस्त्रागार तैयार किया गया है।…

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Gen Z की राजनीतिक चेतना और राष्ट्रीय परिदृश्य—नए युग की आहट या व्यवस्था से असंतोष?

भारत की राजनीति का कैनवास तेजी से बदल रहा है। पारंपरिक समीकरणों, जातिगत लामबंदी और दलीय निष्ठाओं के दौर से…

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80वाँ स्वतंत्रता दिवस: जिस भारत का सपना देखा था, उससे हम कितनी दूर आ गए हैं?

“आजादी की 79वीं सालगिरह, 80वें स्वतंत्रता दिवस की दहलीज और आत्ममंथन का वह सवाल जिससे बचना अब संभव नहीं” 15…

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14 अगस्त : विभाजन विभीषिका स्मृति एवं अखण्ड भारत संकल्प दिवस

….पण्डित प्रदीप शुक्ल “इतिहास केवल तिथि नहीं, चेतावनी भी है” “माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः।” — (अथर्ववेद) यह केवल कोई साधारण…

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