लाठियों से नहीं बचेगी सरकार, शिक्षा बचाइए!

…….पण्डित प्रदीप शुक्ल

“जब छात्र सड़कों पर हों, संसद मौन हो और सत्ता बैरिकेडों के पीछे खड़ी दिखाई दे, तब समझ लेना चाहिए कि संकट केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, लोकतंत्र के चरित्र का है।”

दिल्ली की सड़कों पर इस समय जो कुछ घट रहा है, वह किसी एक दल और दूसरे दल की राजनीतिक लड़ाई भर नहीं है। यह उस शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ उबलता हुआ असंतोष है, जिसने लाखों युवाओं का विश्वास बार-बार तोड़ा है। पेपर लीक, परीक्षा अनियमितताएँ, बढ़ती फीस, बेरोज़गारी, निजीकरण का दबाव और भविष्य का असुरक्षित क्षितिज—इन्हीं सबके बीच जब छात्र न्याय की मांग लेकर सड़क पर उतरते हैं और जवाब में उन्हें बैरिकेड, हिरासत और लाठियाँ मिलती हैं, तब प्रश्न केवल सरकार से नहीं, पूरे लोकतांत्रिक ढाँचे से पूछा जाता है।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना देकर सरकार के सामने पाँच माँगें रखीं—शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और गृह मंत्री अमित शाह का इस्तीफ़ा, छात्रों पर कथित बल प्रयोग की जवाबदेही, दर्ज मुकदमों की वापसी, संसद में विस्तृत चर्चा और सरकार की सार्वजनिक माफी। इन मांगों से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन उन सवालों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता जो उन्होंने उठाए—”बार-बार पेपर लीक क्यों हो रहे हैं? शिक्षा लगातार महँगी क्यों होती जा रही है? मेहनत करने वाले छात्र हर साल व्यवस्था की विफलताओं की कीमत क्यों चुकाएँ?”

विडंबना देखिए। जिस संसद को जनता के सवालों का सबसे बड़ा मंच माना जाता है, वहीं यदि शिक्षा जैसे राष्ट्रीय प्रश्न पर बहस कराने के लिए भी राजनीतिक रस्साकशी करनी पड़े, तो यह संसदीय लोकतंत्र की आत्मा पर प्रश्नचिह्न है। सत्ता यदि कहती है कि चर्चा के लिए तैयार थी, और विपक्ष कहता है कि उसे अवसर नहीं मिला, तो दोनों पक्षों के बीच सबसे बड़ा नुकसान छात्रों का होता है। राजनीति अपना रास्ता निकाल लेती है; युवाओं का एक वर्ष वापस नहीं आता।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का आरोप है कि राहुल गांधी छात्रों का राजनीतिक इस्तेमाल कर रहे हैं और संसद का कामकाज बाधित करना चाहते हैं। यह आरोप लोकतंत्र में नया नहीं है। हर सरकार विपक्ष पर यही आरोप लगाती रही है। लेकिन उतना ही बड़ा प्रश्न सरकार के सामने भी खड़ा है—”यदि शिक्षा व्यवस्था इतनी सुदृढ़ है, तो हर कुछ महीनों में परीक्षा प्रणाली विवादों में क्यों घिर जाती है? यदि छात्रों की शिकायतें निराधार हैं, तो देश भर के विश्वविद्यालयों और प्रतियोगी परीक्षाओं में असंतोष बार-बार क्यों फूट पड़ता है?”

लोकतंत्र की सबसे बड़ी कसौटी यह नहीं है कि सरकार विरोध सहन करती है या नहीं; बल्कि यह है कि वह विरोध के पीछे छिपी पीड़ा को समझती है या नहीं। छात्रों को केवल भीड़, कानून-व्यवस्था की समस्या या राजनीतिक मोहरा मान लेना सबसे बड़ी प्रशासनिक भूल होगी। इतिहास गवाह है—विश्वविद्यालयों की आवाज़ को जितना दबाया गया, वह उतनी ही व्यापक सामाजिक बेचैनी में बदलती गई।

जंतर-मंतर पर विभिन्न विपक्षी नेताओं का पहुँचना स्वाभाविक रूप से इस आंदोलन को राजनीतिक रंग देता है। परन्तु इससे पहले यह पूछना होगा कि क्या छात्रों के पास अपनी बात कहने का कोई प्रभावी संस्थागत मंच बचा है? यदि संसद में बहस नहीं, विश्वविद्यालयों में संवाद नहीं और सड़कों पर प्रदर्शन भी संदेह की दृष्टि से देखा जाएगा, तो लोकतांत्रिक असहमति आखिर व्यक्त कहाँ होगी?

दिल्ली में भारी बैरिकेडिंग, सुरक्षा व्यवस्था और गिरफ्तारियों का दृश्य किसी विजयी लोकतंत्र का प्रतीक नहीं है। यह उस अविश्वास का प्रतीक है जो सत्ता और समाज के बीच बढ़ता जा रहा है। लोकतंत्र में सरकार की असली ताक़त पुलिस की लाठियाँ नहीं, जनता का विश्वास होता है। बैरिकेड सड़कें रोक सकते हैं, लेकिन युवाओं के मन में उठे प्रश्नों को नहीं।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चिंताजनक बात यह है कि शिक्षा का मूल संकट कहीं पीछे छूटता जा रहा है। बहस इस पर होनी चाहिए थी कि परीक्षा प्रणाली को भ्रष्टाचार और पेपर लीक से कैसे मुक्त किया जाए; सरकारी शिक्षा को अधिक सुलभ कैसे बनाया जाए; कोचिंग-निर्भर मॉडल से कैसे निकला जाए; और करोड़ों युवाओं को गुणवत्तापूर्ण तथा किफायती शिक्षा कैसे मिले। दुर्भाग्य से बहस इस पर हो रही है कि किसने किसे हिरासत में लिया, किसने किस पर आरोप लगाया और किसने किसके खिलाफ प्रदर्शन किया।

आज आवश्यकता किसी राजनीतिक विजय की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्ममंथन की है। शिक्षा किसी सरकार की उपलब्धि या विपक्ष का हथियार नहीं हो सकती। यह संविधान द्वारा प्रदत्त समान अवसर की भावना का आधार है। यदि छात्र ही व्यवस्था पर भरोसा खो देंगे, तो भारत की जनसांख्यिकीय शक्ति सबसे बड़ी राष्ट्रीय चुनौती में बदल जाएगी।

सरकार यदि वास्तव में छात्रों के साथ खड़ी है, तो उसे संवाद, पारदर्शिता और जवाबदेही का रास्ता अपनाना चाहिए। संसद में व्यापक बहस हो, परीक्षा सुधारों पर सर्वदलीय सहमति बने, पेपर लीक के दोषियों पर त्वरित और कठोर कार्रवाई हो तथा आंदोलन के दौरान हुई प्रत्येक घटना की निष्पक्ष जाँच कराई जाए। दूसरी ओर, विपक्ष की भी जिम्मेदारी है कि छात्रों की वास्तविक पीड़ा को केवल राजनीतिक मंच न बनाए, बल्कि समाधान-केंद्रित राष्ट्रीय सहमति विकसित करने का प्रयास करे।

“देश की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं कि छात्र सड़क पर हैं; सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उनकी पुकार अभी भी सत्ता और राजनीति के शोर में दब रही है।”

“जिस देश में छात्रों की कलम से अधिक लाठियाँ दिखाई देने लगें, वहाँ संकट सरकार का नहीं—लोकतंत्र के भविष्य का होता है।”

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