14 अगस्त : विभाजन विभीषिका स्मृति एवं अखण्ड भारत संकल्प दिवस

….पण्डित प्रदीप शुक्ल

“इतिहास केवल तिथि नहीं, चेतावनी भी है”

“माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः।” — (अथर्ववेद)

यह केवल कोई साधारण वेद-वाणी नहीं है, अपितु भारतीय चेतना की वह आदिम और शाश्वत अनुभूति है जिसमें भूमि और मनुष्य का संबंध किसी भौतिक स्वार्थ या राजनीतिक सौदेबाजी का नहीं, बल्कि गहरी आत्मीयता, प्राण-संयोग और मातृत्व का है। यह धरती केवल मिट्टी और खनिजों का कोई भौगोलिक विस्तार मात्र नहीं है; यह स्मृतियों, संस्कारों, आस्थाओं, संघर्षों, तपस्याओं, परंपराओं और पीढ़ियों के सपनों से निर्मित एक जीवंत सभ्यता है।

इसीलिए जब किसी राष्ट्र की जीवंत धरती पर राजनीतिक कैंची चलती है और वहाँ रेखाएँ खिंचती हैं, तो केवल नक्शे की लकीरें नहीं बदलतीं—घरों के आँगन उजड़ जाते हैं, स्मृतियों के रास्ते टूट जाते हैं, पीढ़ियों के विश्वास बिखर जाते हैं, रिश्तों के द्वार अनिश्चितता के अंधकार में बंद हो जाते हैं और इतिहास की छाती पर एक ऐसा गहरा नासूर बन जाता है जिसकी कसक पीढ़ियों तक टीस बनकर बनी रहती है।

14 अगस्त हमें ठीक उसी ऐतिहासिक और मानवीय पीड़ा के सम्मुख ला खड़ा करता है।

यह वह दिन है जब हम वर्ष 1947 के विभाजन की अकल्पनीय विभीषिका का स्मरण करते हैं—उस विभाजन का, जिसकी पृष्ठभूमि में औपनिवेशिक साम्राज्यवादी राजनीति, साम्प्रदायिक अविश्वास की विषैली हवा, तात्कालिक सत्ता-संघर्ष, अदूरदर्शी राजनीतिक निर्णयों और परिस्थितियों की एक जटिल व क्रूर शृंखला थी; और जिसकी अंतिम परिणति में असंख्य सामान्य मनुष्यों ने अपने घर, अपने गाँव, अपनी बस्तियाँ, अपनी स्मृतियाँ और कभी-कभी अपना संपूर्ण जीवन व सुहाग तक होम कर दिया।

पंद्रह अगस्त 1947 का सूर्य भारत के लिए स्वतंत्रता का स्वर्णिम प्रभात लेकर आया था, किंतु उसी प्रभात की उजली किरणों के साथ उपमहाद्वीप के अनेक हिस्सों में विस्थापन, क्रूर हिंसा, और असह्य शोक की एक ऐसी खूनी रात भी उतर आई थी जिसके घाव आज भी पूरी तरह भर नहीं पाए हैं।

इसलिए, चौदह अगस्त का यह दिन केवल अतीत के पन्नों को पलटने या किसी पुरानी तारीख को दोहराने का दिन नहीं है। यह गहन आत्मावलोकन, आत्ममंथन और वैचारिक चेतना का दिन है। यह उन मौन और अनाम पीड़ितों को स्मरण करने का दिन है जिनके नाम इतिहास की बड़ी पुस्तकों में शायद दर्ज नहीं हैं, किंतु जिनके अनकहे आँसू राष्ट्र की सामूहिक स्मृति में अमिट रूप से अंकित हैं।

यह उन माताओं को शत-शत नमन करने का दिन है जिन्होंने अपने कलेजे के टुकड़ों को खोया; उन मासूम बच्चों को स्मरण करने का दिन है जिन्होंने अपनी आँखों के सामने अपने माता-पिता की अर्थियाँ उठते देखीं; उन उजड़े हुए परिवारों को श्रद्धांजलि देने का दिन है जिनके पुश्तैनी आशियाने एक ही रात में पराये भूगोल का हिस्सा बना दिए गए; और उन तमाम संवेदनशील मनुष्यों को प्रणाम करने का दिन है जिन्होंने भीषण भय, अराजकता और उन्माद के बीच भी मानवता के उस छोटे से दीपक को बुझने नहीं दिया, जो इंसानियत की आखिरी उम्मीद था।

इतिहास केवल तिथि नहीं, चेतावनी भी है। यह हमें यह सिखाता है कि जब-जब समाज में विवेक का प्रकाश धीमा होता है और संकीर्णता सिर उठाती है, तब-तब इतिहास अपने सबसे क्रूर चेहरों के साथ पुनरावृत्ति की माँग करता है।

वह अगस्त : स्वतंत्रता की भोर और विभाजन की सांझ
वर्ष 1947 का वह माह भारतीय इतिहास का सबसे अधिक उज्ज्वल और साथ ही सबसे अधिक विषादपूर्ण अध्याय एक साथ बन गया।

एक ओर सदियों की पराधीनता, गुलामी और शोषण से मुक्ति का अभूतपूर्व उल्लास था—देश के आकाश में तिरंगा पूरे गौरव के साथ फहरा रहा था, स्वतंत्रता का महान स्वप्न अपनी आँखों के सामने साकार हो रहा था, और एक प्राचीन राष्ट्र अपने भाग्य का स्वयं निर्धारण करने की दिशा में आत्मविश्वास के साथ अग्रसर था। करोड़ों देशवासियों के चेहरों पर मुक्ति की मुस्कान थी।

किंतु, उसी समय दूसरी ओर क्रूरता की सीमाएँ लांघती हुई सीमा-रेखाएँ खींची जा रही थीं। नक्शों पर खींची गई वे स्याह लकीरें खेतों, घरों, बाज़ारों, मंदिरों, गुरुद्वारों, मस्जिदों और मनुष्य की स्मृतियों के बीच से होकर गुजर रही थीं। एक प्रशासनिक कलम के झटके से लिया गया निर्णय उपमहाद्वीप के करोड़ों साधारण परिवारों के लिए जीवन का सबसे बड़ा और सबसे दर्दनाक विस्थापन बन गया।

लोग अपने घरों से बेघर होकर निकल पड़े—कोई बैलगाड़ियों पर सामान लादकर, कोई पैदल मीलों धूल भरे रास्तों पर, कोई रेलगाड़ियों की छतों पर ठुँसे हुए, तो कोई केवल अपने शरीर पर पहने फटे वस्त्रों के साथ। किसी ने अपनी पुश्तैनी हवेली छोड़ी, किसी ने अपनी छोटी सी दुकान, किसी ने खून-पसीने से सींचे खेत, किसी ने अमूल्य पुस्तकालय, तो किसी ने अपनी पीढ़ियों की आस्था के केंद्र। बहुतों ने पीछे मुड़कर अपने घरों को देखने का साहस भी नहीं किया; क्योंकि पीछे केवल विलाप और उजड़ी हुई स्मृतियाँ थीं, और सामने केवल एक अनिश्चित, डरावना और अंधकारमय भविष्य था।

इस संपूर्ण त्रासदी का सबसे अधिक मार्मिक और हिला देने वाला पक्ष यह था कि साधारण मनुष्य—जो इस राजनीति का निर्माता बिल्कुल नहीं था—वही इस कुत्सित राजनीति के सबसे बड़े दंश और यंत्रणा का शिकार बना।

इतिहास की किताबों में सत्ता के हस्तांतरण और बड़े नेताओं के निर्णय कुछ पंक्तियों में दर्ज हो सकते हैं, किंतु उन निर्णयों के कारण टूटे हुए करोड़ों परिवारों, उजड़े हुए सुहागों और बिखरे हुए बचपन की महागाथा सदियों में भी पूरी नहीं कही जा सकती। किसी राजनीतिक सीमा-रेखा की लंबाई कुछ सौ किलोमीटर हो सकती है, किंतु उस रेखा द्वारा मानव-मनों के बीच उत्पन्न की गई मनोवैज्ञानिक और वैचारिक दूरी इतनी लंबी और चौड़ी हो गई कि उसे पाटने में पीढ़ियाँ बीत गईं।

यही कारण है कि विभाजन को केवल एक भू-राजनीतिक घटना या सत्ता-परिवर्तन का उपोत्पाद मानना उसकी मानवीय त्रासदी के साथ अन्याय करना होगा। वह मानव-इतिहास की सबसे बड़ी नैतिक और मानवीय परीक्षाओं में से एक थी—और वह परीक्षा आज भी समकालीन समाज को कटघरे में खड़ा करती है।

विभाजन की स्मृति : प्रतिशोध नहीं, विवेक का दीपक

इतिहास के ऐसे संवेदनशील मोड़ों पर अक्सर यह जोखिम रहता है कि स्मृति कहीं प्रतिशोध की आग में न बदल जाए। किंतु हमें यह स्पष्ट रूप से समझना होगा कि विभाजन की स्मृति को जीवित रखने का अर्थ किसी भी समुदाय या वर्ग के प्रति वैमनस्य या बदला लेने की भावना को जीवित रखना नहीं है।

  • स्मरण और प्रतिशोध में उतना ही मौलिक अंतर है जितना प्रकाश और अग्नि में अंतर होता है।
  • स्मरण हमें सचेत करता है, जबकि प्रतिशोध हमें पतन की ओर धकेलता है।
  • स्मृति का वास्तविक उद्देश्य अतीत के घावों को कुरेदना नहीं, बल्कि उन घावों से वैचारिक और नैतिक शिक्षा ग्रहण करना है।

हमें उस ऐतिहासिक पीड़ा को अपनी सामूहिक चेतना में संजोकर रखना है, किंतु उसके नाम पर घृणा की किसी भी आग को प्रज्वलित नहीं होने देना है। हमें इतिहास को भूलना भी नहीं है, पर इतिहास की भूलों और विसंगतियों को अपने वर्तमान या भविष्य का भाग्य भी नहीं बनने देना है।

जो समाज अपने अतीत की त्रासदियों, भूलों और आपदाओं को भुला देता है, वह उन त्रासदियों को भविष्य में पुनः भुगतने के अभिशाप से कभी मुक्त नहीं हो सकता। परंतु जो समाज अपने अतीत को केवल आँखें तरेरकर प्रतिशोध की संकीर्ण दृष्टि से देखता है, वह अपने भविष्य की शांति, प्रगति और सद्भाव को हमेशा के लिए खो बैठता है।

इसलिए, विभाजन की स्मृति का सबसे उत्कृष्ट और परिपक्व रूप वही है जिसमें आँखों में आँसू भी हों और मस्तिष्क में विवेक भी; हृदय में गहन वेदना भी हो और करुणा भी; इतिहास की गंभीर चेतावनी भी हो और भविष्य निर्माण का अटूट संकल्प भी।

आज जब हम इस विभीषिका का स्मरण कर रहे हैं, तो हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि तब किसकी क्या भूल थी; हमें आत्मविश्लेषण करते हुए यह भी पूछना चाहिए कि ऐसी परिस्थितियाँ भविष्य में कभी दोबारा न पनप सकें, इसके लिए आज हमारा व्यक्तिगत और सामूहिक दायित्व क्या है?

नफरत और उन्माद की राजनीति चाहे किसी भी वैचारिक दिशा या कोने से आए, उसका सबसे पहला और अंतिम शिकार हमेशा निरीह मनुष्य ही होता है।

जब-जब समाज में पड़ोसी अपने ही पड़ोसी से भय खाने लगता है, जब-जब किसी की धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान उसकी नागरिक गरिमा और मानवता पर भारी पड़ने लगती है, जब-जब जाति मनुष्य के व्यक्तित्व और स्वाभिमान से बड़ी हो जाती है, जब-जब भाषा संवाद का सेतु बनने के बजाय वैमनस्य की दीवार बन जाती है, और जब-जब राजनीतिक असहमति को शत्रुता का रूप दे दिया जाता है—तब-तब इतिहास की वही पुरानी चेतावनी हमारे द्वारों पर फिर से दस्तक देने लगती है।

वेदों की वाणी : मनुष्य को जोड़ने की सनातन पुकार
भारत की मूल सांस्कृतिक चेतना और सभ्यतागत मिजाज का मूल स्वर कभी भी विभाजन या अलगाव नहीं रहा है, बल्कि उसका स्थायी स्वर हमेशा समन्वय, सहजीविता और बंधुत्व का रहा है।

हमारी प्राचीन दार्शनिक और ऋचाओं से परिपूर्ण परंपरा हमें हमेशा जोड़ने का संदेश देती है। ऋग्वेद का यह प्रसिद्ध और महान मंत्र भारतीय समाज की मूल आत्मा को उद्घाटित करता है—

“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।”
— (ऋग्वेद 10.191.2)

अर्थात्—”तुम सब साथ-साथ चलो, एक-दूसरे के साथ संवाद करो, और तुम्हारे मन एक-दूसरे की भावनाओं को भली-भांति समझें।”

वैदिक परंपरा और भारतीय दर्शन में यह मंत्र सामूहिक और सामाजिक जीवन के उस सर्वोत्कृष्ट आदर्श को व्यक्त करता है जहाँ एकता किसी बलपूर्वक थोपी गई एकरूपता (Uniformity) का नाम नहीं है, बल्कि विभिन्न और भिन्न प्रकृति वाले मनुष्यों के बीच संवाद, आपसी तालमेल और सहिष्णुता की एक निरंतर साधना है।

इस मंत्र के अगले चरणों में समान संकल्प, समान मन और परस्पर सौहार्द व आत्मीयता की कामना की गई है। यही तो भारत की वह मूल और शाश्वत आत्मा है जो विविधता में एकता, भिन्नता में बंधुत्व और बहुलता में समरसता की संस्कृति का पोषण करती है।

भारतवर्ष ने कभी यह उपदेश नहीं दिया कि इस विशाल धरती पर बसने वाले सभी लोग एक जैसे दिखने लगें या एक ही तरह की पूजा-पद्धति अपना लें; भारत ने हमेशा यह उद्घोष किया—”भिन्न और विविध होकर भी परस्पर प्रेम और सद्भाव के साथ साथ रहो।”

यही हमारी महान सभ्यता की सबसे बड़ी और अजेय शक्ति रही है।

हमारी दीर्घकालिक सांस्कृतिक स्मृति में वेद भी हैं और उपनिषद भी; रामायण और महाभारत के महाकाव्य भी हैं; गौतम बुद्ध और भगवान महावीर की करुणा और अहिंसा भी है; कबीर और गुरु नानक देव की वाणी भी है; तुलसीदास और सूरदास के पद भी हैं; मीरा की भक्ति भी है और रहीम के दोहे भी हैं; अमीर खुसरो का संगीत भी है और रसखान का समर्पण भी है।

इस देश की माटी में सदियों से मंदिर की घंटियों की गूँज और मस्जिद की अज़ान की स्वर-लहरियाँ एक ही नीले आकाश के नीचे सहोदर की तरह उठती और मिलती रही हैं। गंगा के तट पर और भारत के हर कोने में विविध आस्थाओं, संस्कृतियों और विचारों ने एक ही थाली में बैठकर जीवन का उत्सव मनाया है।

इसलिए, 1947 के विभाजन को इस महान सभ्यता का स्वाभाविक चरित्र मान लेना इतिहास के साथ सबसे बड़ा छल और अज्ञान होगा। हमारी मूल चेतना कभी विभाजनकारी नहीं रही, वह हमेशा से समन्वयकारी, समावेशी और सर्वग्राही रही है।

अखण्ड भारत : भूगोल से आगे, एक सांस्कृतिक चेतना

जब हम “अखण्ड भारत” की संकल्पना पर विचार करते हैं, तो यदि इस शब्द को केवल किसी तात्कालिक राजनीतिक, सैन्य अथवा संकीर्ण भौगोलिक विस्तार के आग्रह तक सीमित कर दिया जाए, तो इसकी अंतर्निहित सांस्कृतिक और दार्शनिक गहराई बहुत हद तक धूमिल हो जाती है।

अखण्डता का सबसे पहला और वास्तविक अर्थ है—हृदयों की अखण्डता।

वह उदात्त चेतना जिसमें बाहरी भौगोलिक सीमाएँ भले ही भिन्न हों, किंतु आपसी शत्रुता या बैर का कोई स्थान न हो; जहाँ स्वतंत्र राष्ट्र हों, किंतु मानवता का वैचारिक विखंडन न हो; जहाँ भिन्न-भिन्न संस्कृतियाँ और भाषाएँ हों, किंतु एक-दूसरे के प्रति अगाध सम्मान हो; और जहाँ ऐतिहासिक स्मृतियों के पन्ने अलग-अलग हो सकते हैं, किंतु भविष्य के प्रति शांति, विकास और सह-अस्तित्व की एक साझा आकांक्षा जीवित हो।

इस परिप्रेक्ष्य में, अखण्ड भारत केवल कोई भू-राजनीतिक नक्शा नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक स्मृति भी है और एक उच्च नैतिक व मानवीय स्वप्न भी है।

यह उस विराट सभ्यतागत चेतना का स्मरण है जिसकी सीमाएँ किसी एक सनद या राजकीय सत्ता की सीमाओं से नहीं बाँपी जा सकतीं। संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में भाषा, दर्शन, साहित्य, संगीत, तीर्थ, लोक-संस्कृति, शिक्षा और निरंतर चलने वाले सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने ऐसे सुदृढ़ और अदृश्य ताने-बाने बुने हैं जिन्हें समय की कोई भी राजनीतिक दीवार हमेशा के लिए समाप्त नहीं कर सकती।

इसलिए, अखण्ड भारत का सच्चा संकल्प सबसे पहले यह होना चाहिए कि हम आधुनिक भारत की आंतरिक आत्मा को अखण्ड रखें—उस आत्मा को जो न्याय, करुणा, सहिष्णुता, सत्य, लोकतांत्रिक संवाद और मानवीय बंधुत्व के मजबूत धागों से गूँथी गई है।

राजनीतिक सीमाओं से परे सांस्कृतिक निकटता और मानवीय शांति की यह कामना किसी भी आक्रामक राष्ट्रवाद का नाम नहीं है; यह इतिहास के इन गहरे और नासूर बन चुके घावों पर सभ्यता और भाईचारे का मरहम रखने की एक पवित्र और गंभीर मानवीय आकांक्षा है।

महर्षि अरविन्द का स्वप्न : स्वतंत्रता से आगे एकता की ओर
भारत की स्वतंत्रता के ऐतिहासिक अवसर पर महर्षि अरविन्द ने देश के भविष्य को केवल सत्ता के हस्तांतरण और राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं माना था। 15 अगस्त 1947 के अपने ऐतिहासिक और दूरदर्शी संदेश में उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के साथ-साथ उसकी पूर्ण एकता, एशिया महाद्वीप के सांस्कृतिक पुनर्जागरण, वैश्विक स्तर पर मानव-एकता, भारत की महान आध्यात्मिक देन और संपूर्ण मानव-जाति के विकास की संभावनाओं को अपने ‘पाँच महान स्वप्नों’ के रूप में राष्ट्र के सामने रखा था।

उनके उस संदेश में एक गहरी और टीसभरी चिंता भी व्यक्त हुई थी कि यद्यपि भारत औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्र हो गया है, किंतु क्रूर विभाजन के कारण उसकी पूर्ण और स्वाभाविक एकता अभी खंडित है और उसे भविष्य में प्राप्त होना बाकी है। यह दार्शनिक दृष्टि आज के समय में हमारे लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण और प्रासंगिक है।

स्वतंत्रता केवल कुछ लोगों के हाथों में सत्ता का परिवर्तन मात्र नहीं है; वह तो किसी भी राष्ट्र के लिए आत्मनिर्माण, आत्मगौरव और आत्मचेतना की एक कठिन और लंबी शुरुआत है। और इसी प्रकार, एकता केवल नक्शे पर खींची गई लकीरों या राजनीतिक समझौतों का प्रश्न नहीं है; वह प्रत्येक मनुष्य के अंतःकरण में उपस्थित उस नैतिक शक्ति का प्रश्न है जो उसे अपने से भिन्न रंग, रूप, भाषा या विचार वाले व्यक्ति के प्रति भी समान रूप से सम्मान, आदर और करुणा का भाव रखने की प्रेरणा देती है।

आज महर्षि अरविन्द के उन विचारों का स्मरण करते हुए हमें यह भली-भांति समझ लेना चाहिए कि किसी भी राष्ट्र की सच्ची महानता केवल उसके भूभाग के क्षेत्रफल या उसकी सैन्य शक्ति की विशालता में नहीं होती, बल्कि उसके नागरिकों के नैतिक चरित्र और सहिष्णुता में होती है। जिस राष्ट्र के नागरिक एक-दूसरे की मानवीय गरिमा और अधिकारों की रक्षा करते हैं, वह राष्ट्र भीतर से हमेशा अखण्ड और अजेय रहता है।

वसुधैव कुटुम्बकम् और लोकतंत्र का नैतिक आधार

भारत की प्राचीन और गौरवशाली दृष्टि संकीर्ण राष्ट्रीयता को कभी भी मानवता की विरोधी या पृथकतावादी नहीं मानती। हमारे उपनिषदों का वह उद्घोष आज भी गूँजता है जो पूरी दुनिया को एक परिवार मानता है—

“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥”

अर्थात्—”यह अपना है और यह पराया है—इस प्रकार की संकीर्ण और छोटी सोच केवल छोटे मन वाले लोगों की होती है; इसके विपरीत, उदार चरित्र और विशाल हृदय वाले महानुभावों के लिए तो यह संपूर्ण पृथ्वी ही उनका अपना परिवार है।”

विभाजन की इस विदारक स्मृति के संदर्भ में यह श्लोक और अधिक प्रासंगिक और मार्गदर्शक बन जाता है।

चूंकि विभाजन ने हमें यह कड़वा पाठ पढ़ाया है कि मनुष्यों के बीच कृत्रिम रूप से बनाई गई राजनीतिक और भौगोलिक सीमाएँ उनके मनों में स्थायी बैर और शत्रुता का कारण नहीं बननी चाहिए। इतिहास की भूलों के प्रति पूरी तरह सजग और सतर्क रहते हुए भी, हमारा यह परम कर्तव्य है कि हम आने वाली पीढ़ियों को घृणा, प्रतिशोध और पूर्वाग्रहों की जहरीली विरासत न सौंपें।

  • हम अपनी युवा पीढ़ी को वैचारिक चेतना दें, कटुता नहीं।
  • हम उन्हें ऐतिहासिक तथ्य दें, पूर्वाग्रहों का अंधकार नहीं।
  • हम उन्हें अपनी महान स्मृतियाँ दें, बदले की आग नहीं।
  • हम उन्हें सच्चा राष्ट्रप्रेम दें, मानवद्वेष और कट्टरता नहीं।

और इसके लिए आधुनिक भारत का लोकतांत्रिक ढांचा सबसे बड़ा और सुरक्षित माध्यम है। लोकतंत्र केवल मतपेटियों में वोट डालने या सरकारें चुनने की एक प्रशासनिक व्यवस्था भर नहीं है; वह असहमति के प्रति आदर, बहुलता का उत्सव, और हर एक नागरिक की गरिमा की रक्षा करने की एक जीवंत सांस्कृतिक जीवन-शैली है। हमारा संविधान केवल शासन चलाने का एक सूखा कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह हम सबका एक ऐसा पवित्र नैतिक अनुबंध है जो न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के शाश्वत स्तंभों पर टिका हुआ है।

इक्कीसवीं सदी और आज की युवा पीढ़ी का ऐतिहासिक दायित्व
आज की इक्कीसवीं सदी की युवा पीढ़ी ने विभाजन के उस भयानक दौर को अपनी आँखों से नहीं देखा है, किंतु वे उसके बहुविध प्रभावों, विस्थापन के दर्द और देश की मानसिक बनावट पर पड़े उसके प्रभावों को भली-भांति महसूस कर सकते हैं। आज की पीढ़ी के लिए वह इतिहास पुस्तकों के पन्नों में है, बुजुर्गों के कांपते हुए संस्मरणों में है, पुराने उजड़े हुए घरों की दीवारों की दरारों में है, और दादा-दादी की उन अधूरी कहानियों में है जिनकी आँखें आज भी अपनों को याद करके नम हो जाती हैं। इसलिए, आज यह अत्यंत आवश्यक है कि विभाजन की इन ऐतिहासिक स्मृतियों को पूरी प्रमाणिकता, संवेदनशीलता और विवेक के साथ नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए।

उन्हें यह स्पष्ट रूप से बताया जाए कि किसी भी साम्प्रदायिक उन्माद या हिंसा में अंततः कोई भी पक्ष विजयी नहीं होता, बल्कि मानवता की हर बार पराजय होती है।

उन्हें यह समझाया जाए कि समाज में फैलाई जाने वाली अफवाहें और नफरत भरे प्रोपेगैंडा कभी-कभी बंदूकों की गोलियों से भी अधिक तीव्र गति से समूचे समाज को तहस-नहस कर सकते हैं।

उन्हें यह संस्कार दिया जाए कि किसी भी पड़ोसी की पहचान उसका धर्म, उसकी जाति या उसकी भाषा उसके मनुष्य होने के मौलिक सत्य से बड़ी कभी नहीं हो सकती।

उन्हें यह सिखाया जाए कि राष्ट्र की सच्ची सुरक्षा सीमाओं पर लगे पहरे के साथ-साथ नागरिकों के आपसी विश्वास और भाईचारे पर भी निर्भर करती है।

आँसू से संकल्प तक

14 अगस्त का यह गंभीर दिन हमें एक साथ दो दिशाओं में प्रेरित करता है—यह हमें इतिहास के मौन पीड़ितों के सामने सिर झुकाने की प्रेरणा भी देता है और भविष्य की चुनौतियों के सामने सीना तानकर अडिग खड़े होने का साहस भी प्रदान करता है।

आइए, इस वेला में हम उन तमाम अज्ञात आत्माओं को नमन करें जिनका कोई समाधि स्थल या स्मारक कभी नहीं बन सका।

  • उन माताओं और बहनों की असीम पीड़ा को याद करें जिनके आँसू इतिहास की किसी भी भाषा या लिपि से बहुत बड़े और भारी थे।
  • उन मासूम बच्चों के खोए हुए बचपन को स्मरण करें जिनका संसार एक ही रात की आंधी में उजड़ गया।

उन वृद्धों के विलाप को याद करें जिन्होंने अपनी जन्मभूमि की मिट्टी को अपने जीवन के अंतिम समय में सिर्फ दूर से देखा; और उन परिवारों को याद करें जो अपनी पुश्तैनी हवेलियों और घरों की चाबियाँ तो अपनी जेब में सुरक्षित ले आए थे, किंतु उन चाबियों से उन दरवाजों को दोबारा खोलने का अवसर उन्हें जीवन भर कभी नहीं मिला।

किंतु इसी के साथ-साथ, हमें उन अनगिनत और साहसी मनुष्यों को भी पूरे आदर के साथ याद करना चाहिए जिन्होंने इस महाविपत्ति और घनघोर अंधकार के बीच भी किसी अजनबी भूखे को अपने आँगन में रोटी खिलाई, किसी घायल और लहूलुहान अजनबी को पानी पिलाया, और किसी पूरी तरह बेसहारा परिवार को अपनी छाती से लगाकर अपने घर में शरण दी।

क्योंकि विभाजन की यह संपूर्ण कहानी केवल क्रूरता और हिंसा की ही कहानी नहीं है; यह उस विकट परिस्थितियों में भी इंसानियत की आखिरी और सबसे तेज जलती हुई लौ की भी उतनी ही प्रेरणादायक कहानी है। जहाँ अंधकार सबसे घना था, वहीं किसी न किसी साधारण मनुष्य ने अपने हिस्से का दीपक जरूर जलाया था; और वही मानवीय दीपक आज हमारी सबसे मूल्यवान और पवित्र राष्ट्रीय विरासत है।

हम भूलेंगे नहीं — पर रुकेंगे भी नहीं
आज इस ऐतिहासिक दिवस पर हमारा संकल्प अत्यंत स्पष्ट, अडिग और सरल होना चाहिए—

हम इतिहास की इस विभीषिका को कभी भूलेंगे नहीं,
किंतु इतिहास के उन पुराने घावों को कभी भी नफरत और बैर का हथियार नहीं बनाएँगे।

हम अपने पूर्वजों के उस असह्य दुखों और पीड़ा को हमेशा स्मरण रखेंगे, परंतु आने वाली पीढ़ियों के कोमल मनों में कभी भी भय या आतंक की विरासत नहीं डालेंगे।

हम भारत की इस प्राचीन और सनातन सांस्कृतिक चेतना को हमेशा जीवंत रखेंगे, किंतु मानवता की सार्वभौमिक गरिमा और स्वतंत्रता को कभी भी छोटा या कमजोर नहीं होने देंगे।

हम यह प्रतिज्ञा लेते हैं कि हम अपने महान राष्ट्र की एकता, अखंडता और संप्रभुता की हर कीमत पर रक्षा करेंगे; हम अपने संविधान द्वारा प्रदत्त मूल्यों—सामाजिक न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—को केवल कागजों पर नहीं, बल्कि अपने दैनिक आचरण और व्यवहार में उतारेंगे।

हम धर्म, आस्था या पूजा-पद्धति के नाम पर मनुष्य को मनुष्य से कभी दूर नहीं होने देंगे। हम जाति, वर्ग या वर्ण के नाम पर किसी की मेधा, श्रम और सम्मान को नहीं बाँटेंगे। हम भाषा और प्रांत के नाम पर हृदयों के बीच कोई भी कृत्रिम दीवार खड़ी नहीं होने देंगे।

हम राजनीति को केवल लोकतंत्र की सच्ची और निष्ठावान सेवा का माध्यम बनाएँगे, समाज को कभी भी आपसी संघर्ष या गृहकलह का मैदान नहीं बनने देंगे। और यदि कभी भविष्य में इतिहास ने फिर से हमें किसी कठिन परीक्षा या चौराहे पर खड़ा किया, तो हम घृणा, हिंसा या प्रतिक्रिया के साथ नहीं, बल्कि विवेक, करुणा और संविधानसम्मत न्याय के साथ उसका उत्तर देंगे।

एक संकल्प : एक भारत, एक मानवीय भविष्य

अखण्ड भारत का यह महान स्वप्न तभी अपने वास्तविक अर्थ में सार्थक हो सकता है, जब आधुनिक भारत सबसे पहले अपने आंतरिक धरातल पर पूरी तरह अखण्ड, सुदृढ़ और समरस हो।

  • जब हमारे किसी भी दूरदराज के गाँव का गरीब से गरीब व्यक्ति और महानगर का सबसे समृद्ध नागरिक समान गरिमा और अधिकारों के अधिकारी बन सकें।
  • जब हमारे देश की आधी आबादी यानी स्त्रियाँ और पुरुष कंधे से कंधा मिलाकर समान सम्मान, सुरक्षा और अवसरों के साथ आगे बढ़ सकें।
  • जब जाति किसी भी मनुष्य की योग्यता, क्षमता और उसके मानवीय मूल्य से बड़ी पहचान न बन सके।
  • जब धर्म मनुष्य की व्यक्तिगत आस्था का विषय बना रहे, वह किसी के भी विरुद्ध वैमनस्य या घृणा का औजार कभी न बने।
  • जब विचारों और नीतियों में गहरे मतभेद होने के बावजूद, हृदयों के बीच संवाद का खुला दरवाजा हमेशा सुरक्षित रहे।
  • जब देश की सत्ता शक्तिशाली हो, किंतु देश का संविधान और आम नागरिक की गरिमा उससे भी अधिक शक्तिशाली और सुरक्षित हो।
  • जब हमारी राष्ट्रीयता का गौरव अपनी जगह ऊँचा हो, किंतु उससे भी ऊँचा हमारी साझा मानवता का प्रकाश दिखाई दे।

तभी जाकर अखण्डता का यह उद्घोष केवल किसी नारे या भाषण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वह हमारे दैनिक जीवन और राष्ट्रीय आचरण का हिस्सा बन जाएगा। तभी विभाजन की यह दुखद स्मृति भविष्य में केवल आँसू बहाने का माध्यम नहीं रहेगी—वह हमारी सजग सभ्यता की चेतना का सबसे बड़ा और सबसे सशक्त प्रहरी बन जाएगी।

वन्दे मातरम्—एक शाश्वत प्राण-प्रतिष्ठा

आज चौदह अगस्त की इस गंभीर और विचारोत्तेजक वेला में जब हम अतीत के धुंधलके की ओर दृष्टिपात करते हैं, तो इतिहास के पन्नों में हमें केवल उजड़े हुए घर, टूटे हुए रास्ते और वीरान बस्तियाँ ही नहीं दिखाई देतीं; हमें उन दीपों की एक लंबी और अटूट कतार भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है जो उस भीषण आपदा के अंधकार के बीच भी टिमटिमाते हुए जलती रही थी।

हम उन सभी ज्ञात और अज्ञात अमर आत्माओं को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं जिन्होंने विभाजन की इस क्रूर विभीषिका में अपने प्राण गँवाए।

हम उन सभी विस्थापित और उजड़े हुए परिवारों के धैर्य, संघर्ष और पीड़ा को नमन करते हैं जिन्होंने राख के ढेर से उठकर अपनी मेहनत से फिर से जीवन का ताना-बाना बुना।

हम उन तमाम उदार मनुष्यों को प्रणाम करते हैं जिन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए धर्म, जाति और सीमाओं की दीवारों से बहुत ऊपर उठकर अपनी सच्ची मानवता का परिचय दिया।

रेखाएँ खिंचीं भूमि पर, मन पर न खिंचने दें,
घृणा के बीज किसी आँगन में फिर न पनपने दें।
इतिहास की राख से उठे नवयुग का उजियारा—
मानवता हो धर्म हमारा, भारत हो हमारा प्यारा।

न कोई अपना कम हो, न कोई पराया हो,
हर हृदय में भारत का उज्ज्वल दीप जलाया हो।
सत्य, करुणा, न्याय, समता—जिसकी हो पहचान,
ऐसा अखण्ड रहे भारत, ऐसा रहे महान।

वन्दे मातरम्!

माँ, तेरी इस पावन माटी के कण-कण को हमारा बारंबार प्रणाम।
तेरी स्मृतियों को प्रणाम।
तेरे संघर्षशील और बलिदानियों को प्रणाम।
तेरे अनगिनत आँसुओं को प्रणाम।
और तेरे आने वाले सुनहरे स्वप्नों को हमारा अनंत प्रणाम।

और आज, उसी पावन और अमर स्मृति के सम्मुख हमारा केवल एक ही अटूट, अविचल और सर्वोपरि संकल्प है—

  • भारत की आत्मा सदा अखण्ड रहे।
  • भारत की एकता सर्वदा अटूट रहे।
  • भारत का लोकतंत्र सदैव अडिग रहे।
  • भारत की मानवता इस ब्रह्मांड में अमर रहे।

वन्दे मातरम्!

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