पत्रकारिता की सबसे बड़ी परीक्षा: सत्ता के साथ खड़े होना या सच के साथ?

…….पण्डित प्रदीप शुक्ल

लोकतंत्र में पुलिस, न्यायपालिका, मीडिया और नागरिक—ये चारों एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि जवाबदेही की श्रृंखला के हिस्से हैं। लेकिन जब किसी जनआंदोलन के दौरान पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगते हैं और उसी समय मीडिया का एक वर्ग लगभग पुलिस के जनसंपर्क विभाग की तरह दिखाई देने लगता है, तब सबसे बड़ा संकट केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास का होता है।

दिल्ली के छात्र आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया पर अनेक वीडियो सामने आए। कुछ वीडियो में पुलिसकर्मियों के घायल होने के दृश्य हैं, तो कुछ में प्रदर्शनकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार के आरोप लगाए गए। इनमें एक वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर यह दावा भी किया गया कि एक महिला प्रदर्शनकारी के साथ पुलिस ने अत्यंत अमानवीय व्यवहार किया। इस दावे की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि अभी आवश्यक है, इसलिए इसकी निष्पक्ष जांच ही सत्य तक पहुँचने का एकमात्र लोकतांत्रिक रास्ता है। किसी भी अधिकारी को दोषी या निर्दोष घोषित करना जांच और न्यायिक प्रक्रिया का विषय है, न कि सोशल मीडिया का। लेकिन इस पूरे प्रकरण ने एक अधिक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या हमारी अपराध पत्रकारिता (Crime Reporting) अपनी संस्थागत संरचना के कारण पुलिस पर इतनी निर्भर हो चुकी है कि वह पुलिस की जवाबदेही तय करने की क्षमता खोती जा रही है?

यह किसी एक पत्रकार का प्रश्न नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था का प्रश्न है। वर्षों से अपराध संवाददाता अपनी अधिकांश सूचनाएँ पुलिस तंत्र से प्राप्त करते रहे हैं। प्राथमिकी, गिरफ्तारी, प्रेस नोट, ब्रीफिंग, विशेष सूचनाएँ—इन सबका प्राथमिक स्रोत पुलिस ही होती है। यह स्वाभाविक भी है। समस्या तब शुरू होती है जब सूचना का यह संबंध निर्भरता में बदल जाता है और निर्भरता निकटता में।

पत्रकार का सबसे बड़ा दायित्व सत्ता और नागरिक के बीच दूरी बनाए रखना है। यदि वह सत्ता का विस्तार बन जाए, तो पत्रकारिता समाप्त होकर जनसंपर्क (Public Relations) में बदल जाती है। इसी प्रकार यदि पत्रकार केवल भीड़ का प्रवक्ता बन जाए, तब भी पत्रकारिता समाप्त हो जाती है। पत्रकार का धर्म किसी पक्ष का प्रतिनिधित्व करना नहीं, बल्कि सत्य का प्रतिनिधित्व करना है।

यदि पुलिसकर्मी घायल हुए हैं तो वह भी समाचार है। यदि प्रदर्शनकारी घायल हुए हैं तो वह भी समाचार है। यदि पुलिस पर झूठे आरोप लगाए गए हैं तो उनका तथ्यात्मक परीक्षण होना चाहिए। यदि पुलिस ने कानून का उल्लंघन किया है तो उसकी निष्पक्ष जांच और जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है।

लोकतंत्र में किसी भी राज्य संस्था की सबसे बड़ी शक्ति उसका नैतिक विश्वास होता है। पुलिस यदि कानून से ऊपर दिखाई देगी तो जनता का भरोसा टूटेगा। मीडिया यदि पुलिस से ऊपर नहीं, बल्कि पुलिस के साथ खड़ा दिखाई देगा तो मीडिया पर भी भरोसा टूटेगा।

आज सूचना का एकाधिकार समाप्त हो चुका है। हर नागरिक के हाथ में कैमरा है। हर घटना कई कोणों से रिकॉर्ड होती है। इसलिए किसी भी नैरेटिव को अब केवल प्रेस विज्ञप्तियों के सहारे स्थापित नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि पारंपरिक पत्रकारिता के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती विश्वसनीयता की है।

पत्रकारों को यह समझना होगा कि जनता उनसे पुलिस-विरोध नहीं, बल्कि निष्पक्षता की अपेक्षा करती है। यदि वे केवल सरकारी संस्करण प्रसारित करेंगे और नागरिकों के प्रश्नों को अनसुना करेंगे, तो जनता का अविश्वास स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा। और जब पत्रकार पर से विश्वास उठता है, तब सबसे अधिक क्षति लोकतंत्र को होती है।

यह भी उतना ही सत्य है कि किसी वायरल वीडियो को अंतिम सत्य मान लेना भी पत्रकारिता नहीं है। हर वीडियो का स्रोत, संदर्भ, समय, क्रम और प्रामाणिकता जांची जानी चाहिए। लोकतंत्र अफवाहों पर नहीं, सत्यापित तथ्यों पर चलता है। आज आवश्यकता न तो पुलिस की अंध-समर्थक पत्रकारिता की है और न ही भीड़ की अंध-समर्थक पत्रकारिता की।

आवश्यकता उस पत्रकारिता की है जो सत्ता से असहज प्रश्न पूछ सके, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कर सके, और साथ ही तथ्यों के प्रति अपनी बौद्धिक ईमानदारी बनाए रखे। क्योंकि जिस दिन पत्रकार सत्ता के बहुत निकट खड़ा दिखाई देने लगता है, उसी दिन जनता उससे दूर होने लगती है। और लोकतंत्र में पत्रकार की सबसे बड़ी पूँजी सत्ता का विश्वास नहीं, जनता का विश्वास होता है।

“पत्रकार यदि सत्ता का प्रवक्ता बन जाए और नागरिक यदि केवल सोशल मीडिया पर भरोसा करने लगें, तो संकट केवल मीडिया का नहीं—पूरे लोकतंत्र का होता है।”

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