….प्रदीप कुमार नायक
इन दिनों देश में महंगाई की मार आम आदमी की कमर तोड़ रही है और इसकी रफ्तार बेलगाम होती जा रही है। अगस्त 2026 के आंकड़े इस चिंता को और गहरा कर रहे हैं। भारतीय बाजार में खाद्य वस्तुओं की कीमतों में जो भारी उछाल दर्ज किया गया है, उसने हर घर के बजट को अस्त-व्यस्त कर दिया है। मौसम की अनिश्चितता और मानसून की कमजोरी का सीधा असर खेतों पर पड़ा है। फसल प्रभावित होने से चीनी के खुदरा भाव आसमान छू रहे हैं। वहीं सीमित आपूर्ति के कारण प्याज के दाम पिछले साल की तुलना में कई गुना तेजी से बढ़े हैं। स्थिति केवल एक-दो चीजों तक सीमित नहीं है। सरसों तेल, रिफाइंड तेल और दालों के दाम भी लगातार ऊंचे स्तर पर बने हुए हैं, जिससे गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों की थाली दिन-प्रतिदिन महंगी होती जा रही है।
आने वाले दिनों में यह संकट और गहरा सकता है। त्योहारों का मौसम नजदीक है, ऐसे में बाजार में मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ेगी। इसके साथ ही चारे की लागत में वृद्धि और परिवहन खर्च महंगा होने से दूध, मिठाइयों, पैकबंद खाद्य पदार्थों और पैक्ड चाय की कीमतों में और बढ़ोतरी होने की आशंका जताई जा रही है। यह परिदृश्य स्पष्ट संकेत देता है कि कमजोर मानसून और आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतें आने वाले महीनों में आम नागरिक के बजट पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती हैं। यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर जीवन निर्वाह की लागत से जुड़ा सवाल है।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी एनएसओ द्वारा जारी ताजा आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं। देश में जुलाई महीने में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.45 प्रतिशत हो गई है, जो जून में 4.38 प्रतिशत थी। यह आंकड़ा भारतीय रिजर्व बैंक के चार प्रतिशत के तय लक्ष्य से ऊपर बना हुआ है। महंगाई में इस बढ़ोतरी की मुख्य वजह खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें ही हैं। निश्चित रूप से खाद्य वस्तुओं की बढ़ती महंगाई के कारण आम आदमी की थाली महंगी हो गई है और उसकी जेब पर सीधा असर पड़ा है।
ऐसे में महंगाई नियंत्रण के लिए सरकार को और अधिक नए रणनीतिक कदमों के साथ आगे बढ़ना होगा। केवल बयानबाजी से काम नहीं चलेगा। सरकारी गोदामों में पड़े गेहूं, चावल और दालों के विशाल भंडार को उपयुक्त रूप से खुले बाजार में जारी किया जाना होगा, ताकि आगामी त्योहारी सीजन में आपूर्ति बनी रहे और कृत्रिम कमी न पैदा हो। प्याज, टमाटर और आलू जैसी रोजमर्रा की सब्जियों की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए नाफेड जैसी सरकारी संगठनों के माध्यम से उपभोक्ताओं को रियायती दरों पर सीधी बिक्री बढ़ाई जानी होगी।
इसके साथ ही आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी रोकने के लिए व्यापारियों के स्टॉक सीमाओं की सख्त निगरानी आवश्यक होगी। कहीं ऐसा न हो कि कुछ लोग इस संकट को अवसर बनाकर मुनाफाखोरी करें। खाद्य तेलों और दालों की उपलब्धता सुधारने हेतु आयात शुल्क में अस्थायी कटौती की जानी होगी, जिससे बाहर से सस्ता माल आ सके और घरेलू बाजार में कीमतें स्थिर हों। अंत में सबसे जरूरी बात यह है कि महंगाई में पिस रहे गरीब लोगों को राहत देनी होगी, क्योंकि महंगाई का सबसे ज्यादा बोझ उन्हीं पर पड़ता है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह बढ़ती महंगाई न केवल अर्थव्यवस्था के लिए बल्कि सामाजिक स्थिरता के लिए भी बड़ी चुनौती बन सकती है।

