मुरैना। पुलिस दर्पण
मुरैना। कभी देश की सुरक्षा के लिए कंधे पर वर्दी और हाथ में जिम्मेदारी थी। फिर एक मामूली कहासुनी ने नौकरी छीन ली। जिंदगी का रास्ता बदला तो मंदिर में संत का चोला पहन लिया, लेकिन देश सेवा का जुनून और अपने हक के लिए लड़ने का जज्बा कभी खत्म नहीं हुआ। 26 वर्षों तक अदालत की चौखट पर संघर्ष चलता रहा और आखिरकार न्याय मिला। यह कहानी मुरैना जिले के छिछावली गांव निवासी 50 वर्षीय गिरवरसिंह तोमर की है। वर्षों पहले जिस CRPF जवान से वर्दी छीन ली गई थी, वही गिरवरसिंह अब दोबारा CRPF की वर्दी पहनकर देश सेवा के लिए तैयार हैं।
1991 में शुरू हुआ देश सेवा का सफर
गिरवरसिंह पुत्र दामोदर सिंह तोमर को बचपन से ही सेना में जाने का जुनून था। मेहनत और तैयारी के बाद वर्ष 1991 में उनका चयन CRPF में हवलदार के पद पर हुआ। करीब आठ वर्ष तक नौकरी सामान्य रूप से चलती रही। उन्हें आगे पदोन्नति की उम्मीद थी।
लेकिन वर्ष 1999 की शुरुआत में एक वरिष्ठ अधिकारी से किसी बात को लेकर उनकी कहासुनी हो गई। गिरवरसिंह के मुताबिक उन्होंने अपनी बात को सही मानते हुए पीछे हटने से इनकार कर दिया। इसके बाद मामला विभागीय कार्रवाई तक पहुंच गया।
21 अक्टूबर 1999 को उन्हें CRPF से बर्खास्त कर दिया गया।
एक आदेश ने उनकी नौकरी ही नहीं छीनी, बल्कि उनके जीवन की दिशा भी बदल दी। नौकरी गई तो टूटे नहीं, मंदिर में मिली नई पहचान
बर्खास्तगी के बाद गिरवरसिंह मानसिक रूप से बेहद परेशान रहे। कुछ समय तक घर में ही रहे। परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ीं तो मजदूरी तक करनी पड़ी।
देश सेवा से दूर होने का दर्द उन्हें भीतर से परेशान करता रहा। इसी दौरान वह अपने गांव के पास स्थित बारहद्वारी मंदिर पहुंचे। वहां करीब चार-पांच वर्ष रहे। बाद में लगभग 20 वर्ष पहले मुरैना के प्रसिद्ध गुफा मंदिर पहुंचे। मंदिर में उन्होंने पूजा-पाठ, सेवा और धार्मिक कार्यों में खुद को समर्पित कर दिया। मंदिर के मुख्य पुजारी ने उन्हें ‘गिरवरदास महाराज’ नाम दिया। एक तरफ मंदिर में साधना और सेवा चलती रही, दूसरी तरफ अदालत में अपने अधिकार की लड़ाई।
संत बनकर परिवार भी संभाला, अदालत में लड़ाई भी
गिरवरसिंह ने अपनी कानूनी लड़ाई छोड़ी नहीं। वर्ष 1999 में उन्होंने बर्खास्तगी के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। वर्ष 2007 में फैसला उनके पक्ष में आया, लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। CRPF की ओर से फैसले के खिलाफ स्टे लिया गया। इसके बाद गिरवरसिंह ने दोबारा कानूनी लड़ाई जारी रखी। वर्षों तक तारीखें आती रहीं। मंदिर में सेवा करने वाला यह व्यक्ति हर बार अदालत की तारीख पर उम्मीद लेकर पहुंचता रहा।
28 अगस्त 2025 का फैसला बना निर्णायक मोड़
लंबी कानूनी लड़ाई के बाद हाईकोर्ट की डबल बेंच ने 28 अगस्त 2025 को CRPF को निर्देश दिया कि गिरवरसिंह को तीन महीने के भीतर दोबारा सेवा में लिया जाए। इसके बावजूद ज्वाइनिंग में देरी हुई। गिरवरसिंह को एक बार फिर अदालत की शरण लेनी पड़ी। CRPF ने पुराने मामले की फाइलें तलाशने में समय लगने की बात कहते हुए समय मांगा। आखिरकार 26 अगस्त 2026 को वह दिन आया जिसका इंतजार गिरवरसिंह ने 26 वर्षों तक किया था। CRPF ने उन्हें दोबारा सेवा में लेने का आदेश जारी कर दिया। अब उनकी पोस्टिंग छत्तीसगढ़ के बीजापुर में की गई है।
‘अगर नौकरी नहीं जाती तो कई बार प्रमोशन हो चुका होता’
गिरवरसिंह का कहना है कि अगर 1999 में उन्हें सेवा से बर्खास्त नहीं किया गया होता तो अब तक वह कई पदोन्नतियां पा चुके होते। इसलिए उनकी लड़ाई अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। अब वह पदोन्नति और सेवा संबंधी अपने अन्य अधिकारों के लिए भी कानूनी रास्ता अपनाने की बात कह रहे हैं।
बच्चों को भी दिखाई देश सेवा की राह
26 वर्षों के संघर्ष के दौरान गिरवरसिंह ने परिवार की जिम्मेदारियां भी निभाईं। पत्नी मंजू देवी, बेटियां शिवानी और राधा तथा बेटे अभिषेक और कृष्णा परिवार का हिस्सा हैं। उन्होंने बच्चों की शिक्षा और भविष्य के लिए भी मेहनत जारी रखी। बड़ा बेटा अभिषेक एयरफोर्स में जवान है, जबकि दूसरा बेटा भी पढ़ाई के साथ देश सेवा के क्षेत्र में जाने की इच्छा रखता है। दोनों बेटियों की शादी भी वह कर चुके हैं।
गुफा मंदिर में 20 साल की सेवा
गुफा मंदिर के महामंडलेश्वर शिवशरण महाराज महंत के अनुसार, गिरवरदास महाराज ने करीब 20 वर्षों तक मंदिर में सेवा की। वह पूजा-पाठ और भक्ति में लगे रहते थे। मंदिर से जुड़े लोगों को उनकी पुरानी CRPF नौकरी और चल रहे मुकदमे की जानकारी थी। वह हर तारीख पर बड़ी उम्मीद और चिंता के साथ जाते थे।
जब आखिरकार उन्हें न्याय मिला और CRPF में दोबारा ज्वाइनिंग का बुलावा आया तो मंदिर छोड़ते समय वह भावुक हो गए। मंदिर प्रबंधन के लिए भी यह क्षण भावुक करने वाला था—जिस व्यक्ति ने वर्षों तक संत बनकर मंदिर की सेवा की, वह अब दोबारा सैनिक की वर्दी पहनकर देश सेवा के लिए लौट रहा था।
एक कहानी, जिसमें वर्दी से ज्यादा मजबूत था हौसला
गिरवरसिंह तोमर की कहानी सिर्फ नौकरी वापस पाने की कहानी नहीं है। यह उस जिद की कहानी है जिसमें व्यक्ति परिस्थितियों के सामने झुकने के बजाय अपने अधिकार के लिए खड़ा रहता है। वर्दी छिनी तो उन्होंने उसे अपनी पहचान का अंत नहीं माना। मंदिर मिला तो सेवा को जीवन बना लिया, परिवार मिला तो जिम्मेदारी निभाई और अदालत मिली तो न्याय के लिए 26 वर्षों तक लड़ते रहे।
संत का चोला उतरा और CRPF की वर्दी फिर लौट आई।
26 साल लंबी यह कहानी शायद यही संदेश देती है कि समय कितना भी लंबा क्यों न हो, यदि संघर्ष ईमानदार हो और विश्वास कायम रहे तो न्याय की उम्मीद कभी नहीं छोड़नी चाहिए।

