लोकतंत्र के गलियारे या भीड़तंत्र का पहरा: प्रेस की स्वतंत्रता पर मंडराता संकट

लोकतंत्र का चतुर्थ स्तंभ समझी जाने वाली स्वतंत्र पत्रकारिता पर बढ़ता वैचारिक और राजनीतिक संकट किसी भी सभ्य राष्ट्र के लिए एक गंभीर आत्ममंथन का विषय है। पश्चिम बंगाल के राजनीतिक क्षितिज पर हाल ही में घटी घटनाएँ—विशेषकर एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र ‘आनंद बाज़ार पत्रिका’ के कार्यालय के बाहर भगवा रंग पोतने की गुंडागर्दी, संपादकीय टीम पर आपराधिक मुकदमे (FIR) और सत्ता समर्थित दबाव—इस बात की बानगी हैं कि कैसे असहमति के स्वरों को कुचलने के लिए असहिष्णुता का लोकतांत्रिक आवरण ओढ़ा जा रहा है। एक तरफ जहाँ अकादमिक परिसरों में वैचारिक असहमतियों को मिटाने के लिए बल प्रयोग की धमकियाँ दी जा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक प्रावधानों को कानूनी दांव-पेंच और राजनीतिक धमकियों से रौंदा जा रहा है।

यह पूरा प्रकरण किसी एक समाचार पत्र या एक राजनीतिक दल के बीच का द्वंद्व नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र के मूल चरित्र, संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की गरिमा पर एक सीधा प्रहार है।

संवैधानिक और विधिक परिप्रेक्ष्य: प्रेस की स्वतंत्रता और कानून का दुरुपयोग

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों और प्रेस को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। हालांकि यह अधिकार अनुच्छेद 19(2) के तहत राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता के आधार पर कुछ उचित प्रतिबंधों के अधीन है, परंतु इन प्रतिबंधों का अर्थ यह कतई नहीं है कि सत्ता के खिलाफ उठने वाली हर आवाज या तीखे संपादकीय शीर्षक को ‘धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने’ का आपराधिक षडयंत्र मान लिया जाए।

  • आपराधिक मामलों का हथियार के रूप में प्रयोग: जब किसी समाचार पत्र के शीर्षक—जैसे ‘भगवा गुंडागर्दी’—पर आपत्ति जताते हुए संपादकों और रिपोर्टरों के खिलाफ ताबड़तोड़ एफआईआर दर्ज कराई जाती है, तो यह स्पष्ट होता है कि कानून की प्रक्रिया का उपयोग न्याय के लिए नहीं, बल्कि विरोधियों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने और डराने (Chilling Effect) के लिए एक औजार के रूप में किया जा रहा है।
  • संपादकीय स्वतंत्रता पर हमला: पुलिस या शिकायतकर्ताओं द्वारा यह माँग करना कि यह तय किया जाए कि शीर्षक का सुझाव किसने दिया, उसे किसने मंजूर किया और संपादन प्रक्रिया में कौन-कौन शामिल था, सीधे तौर पर संपादकीय स्वतंत्रता की गोपनीयता और स्वायत्तता पर हमला है। यदि संपादकीय निर्णयों की जाँच इस तरह होने लगेगी, तो लोकतंत्र में निर्भीक पत्रकारिता का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

लोकतांत्रिक और सामाजिक निहितार्थ: असहिष्णुता का बढ़ता ग्राफ

लोकतंत्र की खूबसूरती बहुलतावाद और संवाद में निहित है। सत्ता चाहे किसी भी दल की हो, उसकी आलोचना को सहन करना स्वस्थ लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है। पश्चिम बंगाल में चुनाव उपरांत हिंसा और वैचारिक असहमतियों के प्रति जिस प्रकार की असहिष्णुता का प्रदर्शन किया जा रहा है, वह लोकतंत्र को एक खतरनाक दिशा में धकेल रहा है।

जब समाचार पत्रों के दफ़्तरों के बाहर भीड़ इकट्ठा होकर नारेबाज़ी करती है, दीवारों पर रंग पोतती है और प्रशासन मूकदर्शक बना रहता है, तो यह कानून के शासन (Rule of Law) की विफलता को दर्शाता है। यह केवल एक क्षेत्रीय राजनीतिक संस्कृति का संकट नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर उस प्रवृत्ति का विस्तार है जहाँ राजनीतिक विरोधियों को ‘शत्रु’ मान लिया जाता है और उनके वैचारिक आधार को नष्ट करने के लिए भौतिक और कानूनी दोनों दबावों का खुलकर उपयोग किया जाता है।

राष्ट्रहित और जनहित में निष्पक्ष निष्कर्ष

प्रेस संगठनों (जैसे इंडियन वीमेंस प्रेस कॉर्प्स और प्रेस एसोसिएशन) ने इस घटना की निंदा करते हुए बिल्कुल सही रेखांकित किया है कि पत्रकारों का काम तथ्यों को सामने लाना है। यदि रिपोर्टिंग या इस्तेमाल किए गए शब्द कुछ लोगों को अप्रिय लगते हैं, तो उसके कानूनी और लोकतांत्रिक उपाय मौजूद हैं, न कि भीड़तंत्र (Mobocracy) का सहारा लेकर संस्थानों को डराना।

परंतु इस पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा पहलू भी है जिस पर आत्ममंथन आवश्यक है। जैसा कि हालिया परिदृश्य में देखा गया है, चाहे वह राष्ट्रीय स्तर पर पत्रकारों को ‘दिमागी नक्सल’ करार देने की प्रवृत्ति हो या क्षेत्रीय स्तर पर दफ़्तरों को निशाना बनाने की, यह स्पष्ट है कि पिछले एक दशक में प्रेस की स्वतंत्रता का सूचकांक लगातार नीचे गिरा है। केवल नैतिक बयानों या जुबानी जमा-खर्च से इस प्रवृत्ति को नहीं रोका जा सकता। इसके लिए पत्रकारों, संपादकों और नागरिक समाज को वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर एक मजबूत, एकजुट और निर्भीक पेशेवर मोर्चा बनाना होगा। यदि आज प्रेस सत्ता के दबाव में झुक गई, तो कल नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने वाला कोई पहरेदार नहीं बचेगा।

“लोकतंत्र की जीवंतता कागजी संविधान से नहीं, बल्कि असहमति के प्रति समाज और सत्ता की सहनशीलता से मापी जाती है; और जब अखबारों के दफ़्तरों पर भगवा या किसी भी रंग की गुंडागर्दी का पहरा बैठने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र का सूर्य अपने अस्त होने की ओर अग्रसर है।”

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