ऐतिहासिक संदर्भ और भूराजनीतिक परिदृश्य
12 और 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit) समकालीन वैश्विक राजनीति, भूअर्थशास्त्र और कूटनीति के एक बेहद संवेदनशील और निर्णायक मोड़ पर हो रहा है। यद्यपि संयुक्त राज्य अमेरिका इस समूह का सदस्य नहीं है, तथापि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक व्यापारिक नीतियों, टैरिफ़ के भुनाने योग्य हथियारों और वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर उनके प्रत्यक्ष नियंत्रण के प्रयासों की लंबी परछाई इस सम्मेलन के एजेंडे पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। ईरान संघर्ष और अमेरिकी प्रतिबंधों की दोहरी मार ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति शृंखला को गहरा आघात पहुँचाया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक प्रणाली और भूराजनीतिक सुरक्षा में गहरी अनिश्चितता पैदा हो गई है। ऐसे में, ब्रिक्स (जिसमें अब 11 प्रमुख देश—भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, चीन, रूस, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और आमंत्रित सदस्य के रूप में सऊदी अरब शामिल हैं) का यह जमावड़ा केवल एक औपचारिक कूटनीतिक संवाद नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक वैश्विक व्यवस्था की रूपरेखा तय करने का बौद्धिक व रणनीतिक मंच बन गया है।
डी-डॉलराइजेशन और अमेरिकी आर्थिक दबाव
वैश्विक भूअर्थशास्त्र के केंद्र में इस समय अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने की ब्रिक्स की महत्त्वाकांक्षा और अमेरिकी प्रशासन के तीखे तेवर के बीच खुला संघर्ष चल रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा बार-बार दी जाने वाली धमकियाँ—विशेषकर ब्रिक्स देशों द्वारा स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने या डॉलर के विकल्प तलाशने की स्थिति में 100 प्रतिशत टैरिफ़ आरोपित करने का बयान—वैश्विक व्यापार के भविष्य को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है। रूस और ईरान जैसी अर्थव्यवस्थाएं, जो पश्चिमी प्रतिबंधों के पाश में जकड़ी हुई हैं, द्विपक्षीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं के उपयोग और भुगतान प्रणालियों के विविधीकरण की पुरजोर पैरोकार हैं। इसके विपरीत, समूह के भीतर ही वैचारिक और आर्थिक विषमताएं इस बात की सीमा तय करती हैं कि यह संगठन अमेरिका के विरुद्ध कितना मुखर हो सकता है।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और ब्रिक्स के भीतर अंतर्विरोध
ब्रिक्स का हालिया विस्तार (जिसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई और सऊदी अरब का प्रवेश हुआ है) ने इसकी आर्थिक और जनसांख्यिकीय धमक को जरूर बढ़ाया है (जो दुनिया की 49 प्रतिशत आबादी और 40 प्रतिशत जीडीपी का प्रतिनिधित्व करता है), लेकिन इसके साथ ही आंतरिक अंतर्विरोधों में भी बेतहाशा वृद्धि हुई है। माइकल कुगलमैन जैसे वरिष्ठ भूराजनीतिक विश्लेषकों का आकलन है कि समूह के सदस्य देशों के रणनीतिक हित और वैश्विक व्यवस्था को देखने के दृष्टिकोण में व्यापक भिन्नता है:
- भारत की कूटनीतिक संतुलन नीति: भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक और व्यापारिक समझौतों (विशेषकर अंतिम चरण में पहुँचे ट्रेड डील) के इस नाजुक दौर में ऐसा कोई जोखिम मोल नहीं लेना चाहेगा जिससे वाशिंगटन के साथ उसके कूटनीतिक संबंध असहज हों। साथ ही, भारत ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) की सशक्त आवाज बनकर बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का नेतृत्व करना चाहता है।
- चीन का रणनीतिक संतुलन: बीजिंग वैश्विक मंच का उपयोग अमेरिका के खिलाफ सीधे टकराव के रूप में चित्रित होने से बचना चाहता है, ताकि उसके अपने अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक हित सुरक्षित रहें।
- मध्य-पूर्वी जटिलताएं: यूएई जैसे देशों के भूक्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं और हालिया क्षेत्रीय संघर्षों के मद्देनजर वे ऐसे किसी भी साझा घोषणापत्र का समर्थन करने से कतराएंगे जो ईरान के पक्ष में अमेरिका विरोधी खेमेबंदी को बढ़ावा देता हो।
न्यू डेवलपमेंट बैंक और संस्थागत उपलब्धियां
वैश्विक वित्तीय वास्तुकला में ब्रिक्स की सबसे मूर्त उपलब्धि ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ (NDB) और 100 अरब डॉलर का आकस्मिक रिजर्व फंड है। वैश्विक संस्थाओं जैसे कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक में पश्चिमी आधिपत्य के बरक्स, ब्रिक्स ने विकासशील देशों की अवसंरचनात्मक प्राथमिकताओं को वित्तपोषित करने में एक मजबूत साख बनाई है। हालांकि आपातकालीन रिजर्व फंड का उपयोग अभी तक नहीं हुआ है, फिर भी यह मंच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित तमाम वैश्विक संस्थाओं में सुधारों की मांग को मुखर करने का प्राथमिक माध्यम बन चुका है।
भारत के लिए रणनीतिक और संप्रभुता संबंधी निहितार्थ
नई दिल्ली में आयोजित यह शिखर सम्मेलन भारत की कूटनीतिक परिपक्वता और रणनीतिक स्वायत्तता की सबसे बड़ी परीक्षा है। भारत के समक्ष दोहरी चुनौती है: एक तरफ जहाँ उसे ईरान संघर्ष, रूस-यूक्रेन संकट और अमेरिका के साथ व्यापारिक संतुलन के बीच एक साझा सहमति वाला संयुक्त वक्तव्य जारी करवाना है—जैसा कि उसने 2023 की अपनी ऐतिहासिक G20 अध्यक्षता के दौरान कर दिखाया था—वहीं दूसरी ओर, चीन के बढ़ते क्षेत्रीय प्रभाव और ग्लोबल साउथ (विशेषकर अफ्रीका और लैटिन अमेरिका) में कूटनीतिक पहुँच की होड़ में अपनी बढ़त को बनाए रखना है।
इसके अतिरिक्त, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ होने वाली द्विपक्षीय बैठकें इस सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक उप-उत्पाद हैं। भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों में जमी बर्फ को पिघलाने, रूस के साथ बढ़ते व्यापार घाटे को पाटने और मध्य-पूर्व में उभरते नए सामरिक समीकरणों (विशेषकर पाकिस्तान की हालिया कूटनीतिक सक्रियता के संदर्भ में) के बीच भारत के लिए अपनी क्षेत्रीय महत्ता और वैश्विक नेतृत्व को स्थापित करने का यह स्वर्णिम अवसर है। अंततः, इस सम्मेलन की सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि यह अमेरिका की कितनी तीखी आलोचना करता है, बल्कि इस बात पर टिकी है कि यह ब्रिक्स को एक ‘संवाद मंच’ से आगे ले जाकर व्यावहारिक, बहुपक्षीय और आर्थिक रूप से संप्रभु सहयोग का एक स्थायी स्तंभ साबित कर सके।

