…..प्रदीप कुमार नायक
मधुबनी जिला मुख्यालय से लेकर जयनगर-झंझारपुर तक हजारों लीटर दूध की जांच नहीं, मिलावट का खतरा_ तो हैं ही l सुबह-सुबह शहर की गलियों में दूध की कैन लेकर निकलने वाले विक्रेताओं की भीड़ आम बात है। लेकिन मधुबनी जिला मुख्यालय के साथ-साथ जयनगर, राजनगर, खजौली, बेनीपट्टी, बाबूबरही और झंझारपुर जैसे बड़े बाजारों में जो दूध रोज हजारों घरों में पहुंच रहा है, उसमें से अधिकांश का न तो FSSAI रजिस्ट्रेशन है और न ही कोई लाइसेंस। यानी जो दूध आपके बच्चों की चाय और बुजुर्गों के गिलास में जा रहा है, उसकी गुणवत्ता की कोई गारंटी नहीं।
जमीनी हकीकत यह है कि मधुबनी के मुख्य बाजार, स्टेशन रोड, बस स्टैंड और कॉलेज रोड पर दर्जनों दूध की दुकानें और ठेले लगे हैं। इनमें से ज्यादातर विक्रेता ग्रामीण इलाकों से दूध लाकर सीधे बेच देते हैं। पूछने पर कोई रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट नहीं दिखाता। किसी के पास बिल है न कोई लैब टेस्ट रिपोर्ट। यही हाल जयनगर बॉर्डर इलाके का है जहां नेपाल से सटे गांवों से दूध आकर खुले में बिकता है। खजौली,राजनगर और बेनीपट्टी के मंडी क्षेत्रों में भी सुबह 4 बजे से ही दूध की आवाजाही शुरू हो जाती है, लेकिन यहां भी नियम-कानून के नाम पर सिर्फ अंधेरा है।
FSSAI के नियम साफ कहते हैं कि दूध और दूध से बने उत्पाद “उच्च जोखिम वाले खाद्य पदार्थ” हैं। कोई भी व्यक्ति अगर सालाना 12 लाख रुपये से कम का कारोबार करता है तो उसे कम से कम बेसिक FSSAI रजिस्ट्रेशन लेना ही होगा। उससे ऊपर के कारोबारियों के लिए स्टेट या सेंट्रल लाइसेंस अनिवार्य है। इसके बिना दूध बेचना सीधे कानून का उल्लंघन है और इसमें 6 महीने तक की जेल और 5 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। लेकिन मधुबनी में यह कानून सिर्फ कागजों पर दिखता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि दूध की बढ़ती मांग और प्रशासन की ढिलाई के कारण मिलावटखोरों की चांदी हो गई है। पानी मिलाना, स्किम्ड मिल्क पाउडर घोलना, डिटर्जेंट और यूरिया तक की शिकायतें अक्सर सुनने को मिलती हैं। बाबूबरही और झंझारपुर के उपभोक्ताओं ने बताया कि गर्मी में दूध जल्दी फट जाता है और उसमें अजीब सी गंध आती है। कई बार शिकायत करने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं होती।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि बिना जांच वाला दूध बच्चों और बुजुर्गों के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक है। इसमें ई-कोलाई, साल्मोनेला जैसे बैक्टीरिया और एंटीबायोटिक के अवशेष हो सकते हैं जो पेट की बीमारी, टाइफाइड और किडनी की समस्या तक दे सकते हैं। गर्भवती महिलाओं के लिए यह और भी जोखिम भरा है।
मधुबनी जिला खाद्य सुरक्षा पदाधिकारी कार्यालय में कर्मचारियों की कमी और जांच किट की अनुपलब्धता को इसका कारण बताया जाता है। छापेमारी के नाम पर साल में एक-दो बार खानापूर्ति हो जाती है, फिर सब पहले जैसा। बड़े डेयरी वाले भी छोटे विक्रेताओं से बिना बिल का दूध खरीदकर पैकेट में भरकर बेच देते हैं। नतीजा यह कि आम आदमी को पता ही नहीं चलता कि वह क्या पी रहा है।
उपभोक्ताओं में भी जागरूकता की कमी है। अधिकांश लोग सस्ते के चक्कर में पैकेट पर FSSAI का 14 अंकों का लाइसेंस नंबर और हरा-नीला लोगो तक नहीं देखते। दूध वाले से रजिस्ट्रेशन मांगने पर जवाब मिलता है “साहब 20 साल से बेच रहे हैं, कुछ नहीं हुआ।”
अब जरूरत है कि जिला प्रशासन इस पर सख्ती करे। बाजारों में औचक जांच हो, मोबाइल फूड टेस्टिंग लैब चलाई जाए और दोषी विक्रेताओं पर तुरंत कार्रवाई हो। साथ ही छोटे विक्रेताओं को ₹100 में मिलने वाला बेसिक FSSAI रजिस्ट्रेशन कराने के लिए जागरूक किया जाए ताकि वे भी कानूनी दायरे में आ सकें।
जब तक दूध की हर बूंद की जांच नहीं होगी, मधुबनी के लोग इसी तरह अनजाने में जहर पीते रहेंगे। सवाल सिर्फ व्यापार का नहीं है, सवाल है हमारे बच्चों की सेहत और कानून के राज का।

