म.प्र. सरकार में युवाओं का भविष्य या डिग्री माफियाओं का कारोबार?
भोपाल । मध्यप्रदेश की राजनीति में इन दिनों धर्म, संस्कृति, सनातन गौरव और विकास के दावे सबसे अधिक सुनाई देते हैं। सरकार अपने हर बड़े कार्यक्रम में विकसित मध्यप्रदेश और विकसित भारत की बात करती है। मंचों से युवाओं के उज्ज्वल भविष्य की बातें होती हैं, नई शिक्षा नीति की उपलब्धियां गिनाई जाती हैं और शिक्षा के क्षेत्र में सुधारों का दावा किया जाता है। लेकिन इसी बीच प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कुछ ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिन्होंने इन तमाम दावों की सच्चाई पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
भोपाल के मुगलिया कोट क्षेत्र में स्थित बताए जा रहे एक बीएड कॉलेज का मामला आज पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है। सरकारी रिकॉर्ड में कॉलेज मौजूद है। विश्वविद्यालय की सूची में उसका नाम दर्ज है। वर्षों से वहां छात्रों का प्रवेश होता रहा है। फीस जमा होती रही है। परीक्षाएं आयोजित होती रही हैं। डिग्रियां जारी होती रही हैं। लेकिन जब सत्यापन टीम मौके पर पहुंची तो वहां कॉलेज नहीं मिला। जिस स्थान पर कॉलेज संचालित होना बताया गया था, वहां केवल खेत, झाड़ियां और एक बोर्ड दिखाई दिया।
यह केवल एक कॉलेज का मामला नहीं है। यह उस पूरी व्यवस्था पर सवाल है जिसके भरोसे लाखों युवाओं का भविष्य तैयार किया जा रहा है। यदि कोई कॉलेज वर्षों तक कागजों में चलता रहे और किसी को इसकी जानकारी न हो, तो यह केवल संस्थान की गलती नहीं बल्कि पूरे नियामक तंत्र की विफलता है।
बरकतउल्ला विश्वविद्यालय से संबद्ध 127 निजी बीएड कॉलेजों के सत्यापन में जो तथ्य सामने आए हैं, वे और भी अधिक चिंताजनक हैं। जांच के दौरान 25 कॉलेजों में गंभीर कमियां पाई गईं। पांच संस्थानों में बड़ी गड़बड़ियां मिलीं। दो कॉलेज मौके पर नहीं मिले और तीन कॉलेज निर्धारित स्थानों के बजाय दूसरी जगह संचालित पाए गए। इसके बावजूद अधिकांश कॉलेजों को सशर्त संबद्धता दे दी गई।
सबसे बड़ा विवाद इस बात को लेकर है कि कई संस्थानों को केवल नोटरीकृत हलफनामे के आधार पर राहत मिल गई। कॉलेज प्रबंधन ने लिखकर दे दिया कि वे सभी नियमों और मानकों का पालन कर रहे हैं तथा यदि भविष्य में कोई कमी पाई जाती है तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। सवाल यह है कि क्या शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में केवल एक हलफनामा पर्याप्त हो सकता है? क्या लाखों छात्रों का भविष्य कागज के एक टुकड़े के भरोसे छोड़ा जा सकता है?
शिक्षा किसी भी समाज की सबसे महत्वपूर्ण बुनियाद होती है। सड़क, पुल, भवन और उद्योग किसी राज्य के विकास के संकेत हो सकते हैं, लेकिन वास्तविक विकास शिक्षा से ही आता है। जिस राज्य की शिक्षा व्यवस्था मजबूत होती है, वही राज्य आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से आगे बढ़ता है। लेकिन यदि शिक्षा व्यवस्था ही कमजोर हो जाए, तो विकास के सारे दावे खोखले साबित होने लगते हैं।
बीएड कॉलेजों का महत्व इसलिए और अधिक बढ़ जाता है क्योंकि वे भविष्य के शिक्षकों को तैयार करते हैं। शिक्षक केवल एक नौकरी करने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह समाज की अगली पीढ़ी का निर्माण करता है। यदि शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों की स्थिति ही संदिग्ध होगी तो वहां से निकलने वाले शिक्षक कितने सक्षम होंगे, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
मध्यप्रदेश में 600 से अधिक शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान संचालित हैं। लगभग 58 हजार बीएड सीटें उपलब्ध हैं। हर वर्ष करीब 47 से 48 हजार विद्यार्थी इन संस्थानों में प्रवेश लेते हैं। इनमें बड़ी संख्या ग्रामीण और मध्यमवर्गीय परिवारों के युवाओं की होती है। उनके माता-पिता अपनी जीवनभर की बचत खर्च करते हैं। कई परिवार कर्ज लेते हैं। कई लोग जमीन तक बेच देते हैं ताकि उनके बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें। लेकिन यदि संस्थान केवल डिग्री बांटने का केंद्र बन जाएं तो सबसे बड़ा धोखा इन्हीं छात्रों और उनके परिवारों के साथ होता है।
एक अच्छे बीएड कॉलेज में प्रशिक्षित शिक्षक, पुस्तकालय, मनोविज्ञान प्रयोगशाला, शिक्षण सामग्री, प्रायोगिक प्रशिक्षण और नियमित शैक्षणिक गतिविधियां आवश्यक होती हैं। शिक्षक बनने के लिए केवल परीक्षा पास करना पर्याप्त नहीं होता। शिक्षण कला, छात्र मनोविज्ञान, कक्षा प्रबंधन और व्यवहारिक प्रशिक्षण भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। यदि कॉलेजों में ये व्यवस्थाएं नहीं हैं तो वहां से निकलने वाले छात्र केवल डिग्रीधारी बन सकते हैं, योग्य शिक्षक नहीं।
सबसे गंभीर चिंता यह है कि यह समस्या केवल बीएड कॉलेजों तक सीमित नहीं दिखाई देती। पिछले कुछ वर्षों में मध्यप्रदेश के नर्सिंग कॉलेजों को लेकर भी बड़े खुलासे हुए थे। कई संस्थानों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव पाया गया। अस्पताल नहीं थे लेकिन प्रशिक्षण दिया जा रहा था। मरीज नहीं थे लेकिन प्रैक्टिकल दिखाए जा रहे थे। पैरामेडिकल और अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में भी समय-समय पर इसी प्रकार की शिकायतें सामने आती रही हैं।
इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर शिक्षा के क्षेत्र में निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है? यदि बार-बार जांच में अनियमितताएं सामने आती हैं तो इसका अर्थ है कि कहीं न कहीं निरीक्षण और मान्यता की प्रक्रिया में गंभीर खामियां मौजूद हैं। केवल कॉलेज प्रबंधन को दोषी ठहराकर समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता। यह भी देखना होगा कि ऐसे संस्थानों को अनुमति किसने दी, निरीक्षण किसने किया और वर्षों तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
इस पूरे मामले का एक राजनीतिक पक्ष भी है। प्रदेश की सरकार लगातार सनातन संस्कृति, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक गौरव को अपने प्रमुख राजनीतिक एजेंडे के रूप में प्रस्तुत करती रही है। यह किसी भी लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का अधिकार है। लेकिन सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मूलभूत विषयों के प्रति भी होती है। यदि युवाओं का भविष्य सुरक्षित नहीं है, यदि शिक्षा की गुणवत्ता लगातार सवालों के घेरे में है और यदि डिग्री प्राप्त करने के बाद भी रोजगार की स्थिति संतोषजनक नहीं है, तो केवल नारों और अभियानों से समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा व्यवस्था को राजनीतिक बहसों से ऊपर उठाकर देखा जाए। शिक्षा किसी दल या विचारधारा का विषय नहीं है। यह पूरे समाज का प्रश्न है। यदि शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता कमजोर होगी तो इसका असर सरकारी और निजी दोनों प्रकार के स्कूलों पर पड़ेगा। वहां पढ़ने वाले लाखों बच्चों की शिक्षा प्रभावित होगी। और अंततः इसका प्रभाव पूरे समाज पर दिखाई देगा।
सरकार को चाहिए कि प्रदेश के सभी शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों का स्वतंत्र और पारदर्शी ऑडिट कराया जाए। प्रत्येक कॉलेज का भौतिक सत्यापन किया जाए। संस्थानों में उपलब्ध भवन, पुस्तकालय, प्रयोगशालाओं और शिक्षकों की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जाए। जिन संस्थानों में गंभीर कमियां पाई जाएं, उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई हो। साथ ही उन छात्रों के हितों की रक्षा की जाए जिन्होंने इन संस्थानों में प्रवेश लेकर अपना समय और पैसा निवेश किया है।
इसके साथ ही विश्वविद्यालयों और नियामक संस्थाओं की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। यदि किसी कॉलेज का अस्तित्व ही संदिग्ध पाया जाता है तो यह केवल कॉलेज संचालक की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। यह भी देखना होगा कि निरीक्षण रिपोर्ट किसने बनाई, संबद्धता किस आधार पर दी गई और वर्षों तक निगरानी क्यों नहीं की गई।
मध्यप्रदेश आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसे तय करना होगा कि वह शिक्षा को सेवा मानता है या व्यवसाय। यदि शिक्षा केवल फीस वसूली और डिग्री वितरण का माध्यम बनकर रह जाएगी तो आने वाले वर्षों में इसके गंभीर परिणाम सामने आएंगे। समाज को योग्य शिक्षक नहीं मिलेंगे। विद्यालयों में शिक्षा का स्तर प्रभावित होगा और युवाओं का भविष्य लगातार कमजोर होता जाएगा।
विकसित भारत का सपना तभी साकार हो सकता है जब शिक्षा व्यवस्था मजबूत हो। मजबूत शिक्षा व्यवस्था केवल भवनों और योजनाओं से नहीं बनती, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और गुणवत्ता से बनती है। यदि कॉलेज खेतों में और शिक्षा कागजों पर मिलेगी तो विकास के दावे भी कागजों तक ही सीमित रह जाएंगे।
इसलिए यह केवल बीएड कॉलेजों का विवाद नहीं है। यह लाखों युवाओं के भविष्य का प्रश्न है। यह शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न है। यह सरकार की प्राथमिकताओं का प्रश्न है। और सबसे बढ़कर यह उस आने वाली पीढ़ी का प्रश्न है जिसके हाथों में कल का भारत होगा।
यदि आज भी इस विषय पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो आने वाले समय में डिग्रियां तो बहुत होंगी, लेकिन ज्ञान कम होगा; कॉलेज बहुत होंगे, लेकिन शिक्षा कम होगी; और विकास के दावे बहुत होंगे, लेकिन वास्तविक प्रगति दिखाई नहीं देगी। यही सबसे बड़ी चिंता है और यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण संदेश भी।

