… आवाज की दुनिया के श्रोता मधुर गीत-संगीत : सुखमय जीवन का आधार

भारतीय रेडियो प्रसारण की संगठित शुरुआत 23 जुलाई 1927 को इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी के बम्बई केंद्र से हुई थी। 1930 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने इस माध्यम के महत्व को समझते हुए अपने नियंत्रण में लेकर “इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस” का नाम दिया। 1936 में ऑल इंडिया रेडियो के नाम से जाना जाने लगा। भारत में सर्वप्रथम 20 अगस्त 1927 को भारतीय रेडियो प्रसारण बम्बई द्वारा श्रोताओं के फरमाइशी कार्यक्रम का प्रसारण किया गया। इसीलिए उस दिन को श्रोता दिवस मनाया जाने लगा।

आजाद हिन्दुस्तान के सूचना प्रसारण मंत्रालय ने तब इसे एकमात्र सार्वजनिक सरकारी प्रसारण माध्यम का नामकरण “आकाशवाणी” कर दिया। धीरे-धीरे आकाशवाणी शब्द ही भारतीय रेडियो प्रसारण का पर्याय बन गया। इन आठ दशकों में रेडियो ने महानगरों के आलीशान बंगलों से लेकर गाँवों की चौपालों, भेलतकशों के झोपड़ों, खेत में काम करने किसानों तथा व्यापारियों तक पहुँचने का सफर तय किया है। रिकॉर्डिंग तथा ब्रॉडकास्टिंग में डिजिटल तकनीक का उपयोग तथा “फोन-इन” कार्यक्रमों के जरिए अधिक से अधिक श्रोताओं को अपने से जोड़ने के रेडियो के प्रयास सफल हो रहे हैं।

निःसंदेह सभ्यता उद्देश्य एकजुट होकर श्रोताओं को एक नई दिशा प्रदान करना है तथा इसके साथ-साथ परस्पर बन्धुत्व की भावना, ज्ञान व मनोरंजन, चेतना, शांति, सद्भावना, एकता की भावना व हमारी संस्कृति को कायम रखना है। गीत-संगीत भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। जिन्होंने कल्पना और यथार्थ की एक मिली-जुली प्रक्रिया है और हम सभी को हमेशा ही इसका एक अहम हिस्सा बनकर खुद को प्रदर्शित करने का अवसर मिलता है। हम कह सकते हैं कि मधुर गीत-संगीत ही सुखमय जीवन का आधार है। श्रोता आकाशवाणी के दर्पण होते हैं। श्रोता जिस रुचि से आकाशवाणी के प्रोग्रामों को सुनते हैं और उन पर अपनी प्रतिक्रियाएँ देते हैं उससे आकाशवाणी का मार्गदर्शन होता है।

कहा जाता है कि तानसेन जब तीन छौंटते थे तो पानी बरसने लगता था और दीपक जल उठता था। बैजू बावरा के गाने पर रीझकर हिरण जंगल से आ जाता था। बताया जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण की मधुर मुरली की तान पर पशु-पक्षी सुध-बुध खो बैठते थे। वीणा की तान पर नाग सीप रीझता है तो मीणा की राग पर कस्तूरी, मृग, सील, मछली की संगीत प्रियता तो विश्वविख्यात है। प्यार भरी बोली से रोता हुआ बच्चा भी चुप हो जाता है। गाने से रक्त संचार में वृद्धि होती है और शिराओं में नवजीवन का आभास मिलने लगता है तथा मानव शरीर विजातीय द्रव्यों से मुक्त हो जाता है। यहाँ तक कि गायकों में हृदय रोग एवं ब्लड प्रेशर के रोग नहीं पाये जाते हैं।

संगीत की उत्पत्ति वेदों से मानी जाती है, संगीत प्रधान ग्रंथ है। संगीत केवल मनोरंजन ही नहीं है बल्कि सृष्टि के हृदय को रोगात्मक सूत्र से जोड़ने का बंधन भी है। गाने के बारह राग हैं और प्रत्येक राग में किसी न किसी रोग को ठीक करने की ताकत है। इसप्रकार हम देखते हैं कि संगीत हमारे जीवन और प्रकृति के प्रसन्नता के लिए कितना अनिवार्य है। संगीत की स्वर लहरियों की मधुर स्पर्श हमें शांति और अलौकिक आनन्द प्रदान करता है। सही अर्थ में कहें तो रेडियो से जुड़े व्यक्ति ही आवाज की दुनिया के असली श्रोता हैं।

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