एथनॉल का मास्टरस्ट्रोक या चीनी की कीमत पर ऊर्जा नीति?

“जब गन्ने से पेट्रोल भी बना और अब चीनी भी आयात करनी पड़ी”

राजनीतिक बहस में असहमति को तर्क से नहीं, उपाधियों से जवाब देने का चलन बढ़ गया है। किसी नीति पर सवाल उठाइए तो पहले सवाल पूछने वाले की नीयत पर सवाल उठता है और फिर तथ्यों को ‘प्रचार’ बताकर खारिज कर दिया जाता है। लेकिन अर्थव्यवस्था न भक्त पहचानती है, न विरोधी; वह अंततः उत्पादन, कीमत, आयात, निर्यात और उपभोक्ता की जेब की भाषा बोलती है। आज गन्ने और एथनॉल की नीति इसी कसौटी पर परखी जानी चाहिए।

सबसे पहले उस तथ्य को स्पष्ट कर देना चाहिए जिस पर अब राजनीतिक धुंध डालने की कोशिश की जा रही है। “भारत सरकार के खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग की आधिकारिक Sugar Policy में साफ दर्ज है कि एथनॉल उत्पादन के लिए B-Heavy Molasses के साथ-साथ sugarcane juice, sugar syrup और sugar की भी अनुमति है।” उसी आधिकारिक दस्तावेज में 2024-25 के लिए ‘Sugarcane juice/sugar/sugar syrup’ को एथनॉल का फीडस्टॉक और उसका निर्धारित ex-mill मूल्य भी दिया गया है। अर्थात यह कोई सोशल मीडिया की कल्पना नहीं है। यह सरकारी नीति का हिस्सा है।

दरअसल, सरकार ने यह व्यवस्था पहली बार हाल में नहीं बनाई। पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण बढ़ाने की रणनीति के तहत 2018-19 से ही sugarcane juice, sugar, sugar syrup और B-Heavy Molasses जैसे फीडस्टॉक को एथनॉल उत्पादन के लिए अनुमति दी गई थी।

इस नीति के पीछे तर्क भी स्पष्ट था—देश में कई वर्षों तक चीनी का उत्पादन घरेलू खपत से अधिक रहा, मिलों पर स्टॉक बढ़ता रहा, गन्ना किसानों का बकाया बढ़ता रहा और चीनी मिलों की नकदी फंसती रही। सरकार का कहना था कि अतिरिक्त गन्ने और चीनी को एथनॉल में मोड़ने से अधिशेष कम होगा, मिलों की तरलता सुधरेगी और किसानों को गन्ने का भुगतान समय पर हो सकेगा।

यहीं तक नीति बिल्कुल तर्कसंगत दिखाई देती है। “लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब ‘अधिशेष’ और ‘आवश्यक उपलब्धता’ के बीच की सीमा धुंधली हो जाए।”

चीनी का अर्थ केवल मिल का स्टॉक नहीं है। वह करोड़ों परिवारों की रोजमर्रा की खपत की वस्तु है। इसलिए किसी भी ऐसी नीति का अंतिम मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं हो सकता कि उससे कितने लीटर एथनॉल बना या कितनी चीनी मिलों को अतिरिक्त आय हुई। सवाल यह भी होगा कि उसका असर चीनी की घरेलू उपलब्धता और उपभोक्ता कीमत पर क्या पड़ा?

यह प्रश्न आज इसलिए अधिक गंभीर हो गया है क्योंकि अगस्त 2026 में चीनी की कीमतों पर दबाव इतना बढ़ा कि सरकार को बाजार में आपूर्ति बनाए रखने के लिए कई हस्तक्षेप करने पड़े।” 28 जुलाई 2026 से चीनी डीलरों पर स्टॉक-होल्डिंग सीमा लगाई गई ताकि जमाखोरी और सट्टेबाजी पर अंकुश लगे तथा उपभोक्ताओं के लिए पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। और अब घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सामने आया है।

20 अगस्त 2026 को भारत सरकार ने करीब 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी, क्योंकि घरेलू चीनी की कीमतें दो महीनों में लगभग 40 प्रतिशत तक बढ़ गई थीं और उत्पादन में कमी से बाजार पर दबाव था। यह लगभग एक दशक बाद इतना बड़ा आयात निर्णय है।

यहीं वह सवाल उठता है जिसे राजनीतिक नारे से नहीं, आर्थिक गणित से पूछना चाहिए—”क्या हमने गन्ने का एक हिस्सा पेट्रोल में मिलाने के लिए एथनॉल में बदला, उससे कच्चे तेल के आयात पर विदेशी मुद्रा बचाई, और अब चीनी की घरेलू कमी या तंगी से निपटने के लिए विदेश से चीनी खरीदने पर विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ रही है?”

इस सवाल को पूरी तरह खारिज कर देना भी गलत होगा और यह दावा कर देना कि चीनी आयात का एकमात्र कारण एथनॉल नीति है, वह भी तथ्यात्मक रूप से अतिरंजित होगा। क्योंकि सरकार के अपने आंकड़े बताते हैं कि 2024-25 में देश में चीनी की उपलब्धता 340 लाख टन थी, जबकि घरेलू मांग 281 लाख टन थी; इसी अवधि में 34 लाख टन चीनी एथनॉल के लिए डायवर्ट की गई।” यानी उस समय राष्ट्रीय स्तर पर कुल उपलब्धता घरेलू मांग से अधिक थी। सरकार ने इसी आधार पर तर्क दिया कि एथनॉल के लिए डायवर्जन ने अतिरिक्त भंडार को नियंत्रित करने और किसानों का भुगतान सुनिश्चित करने में मदद की। इसलिए असली बहस यह नहीं है कि ‘एथनॉल सही है या गलत।’ असली बहस है—”किस कीमत पर, किस मात्रा में और किस समय गन्ने को चीनी से एथनॉल की ओर मोड़ा जाए?”

यही सार्वजनिक नीति का केंद्रीय प्रश्न है। सरकार एथनॉल से विदेशी मुद्रा बचने का दावा करती है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, Ethanol Blended Petrol कार्यक्रम से ESY 2014-15 से अक्टूबर 2025 तक किसानों को ₹1.36 लाख करोड़ से अधिक का भुगतान हुआ और ₹1.55 लाख करोड़ से अधिक की विदेशी मुद्रा बचत का अनुमान सरकार ने दिया है।

यह उपलब्धि भी महत्वहीन नहीं है। लेकिन किसी एक बचत को दूसरी संभावित लागत से अलग करके नहीं देखा जा सकता। “आर्थिक नीति का वास्तविक लाभ ‘नेट लाभ’ होता है, केवल एक तरफ की बचत नहीं।”

यदि एक ओर पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण से कच्चे तेल के आयात का भार घटता है, तो दूसरी ओर यदि घरेलू चीनी की उपलब्धता इतनी कस जाती है कि सरकार को आयात खोलना पड़े और खुदरा महंगाई का दबाव बढ़े, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारी फीडस्टॉक नीति मौसम, उत्पादन, मांग और बफर स्टॉक की वास्तविक स्थिति के अनुसार पर्याप्त लचीली है? आज सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है। “एथनॉल नीति को ‘या तो पूरी तरह सफल’ या ‘पूरी तरह विफल’ बताना दोनों ही गैर-जिम्मेदाराना हैं।”

एक जिम्मेदार सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि एथनॉल मिश्रण के लक्ष्य पूरे हों, किसानों को बेहतर और स्थिर बाजार मिले, मिलों की वित्तीय स्थिति मजबूत रहे, लेकिन इसके लिए ऐसा न हो कि मानव उपभोग की आवश्यक चीनी उपलब्धता पर अनावश्यक दबाव पड़े। और इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण सुधार है—”फीडस्टॉक का विविधीकरण।”

सरकार स्वयं मक्का, FCI के अधिशेष चावल और अन्य अनाजों से एथनॉल उत्पादन को भी प्रोत्साहित कर रही है। तो फिर नीति का अगला चरण क्यों न ऐसा हो जिसमें खाद्य-सुरक्षा संवेदनशील फसलों और गन्ने के बीच संतुलित फीडस्टॉक व्यवस्था बनाई जाए? क्यों न एथनॉल मिश्रण के लक्ष्य को स्थिर रखते हुए यह तय किया जाए कि जब चीनी का घरेलू स्टॉक किसी निर्धारित सुरक्षित सीमा से नीचे जाए तो गन्ने के रस से एथनॉल बनाने की मात्रा स्वतः सीमित हो?

क्यों न एक ऐसी “Dynamic Sugar-Ethanol Balance Policy” बनाई जाए जिसमें देश की चीनी की उपलब्धता, घरेलू खपत, मानसून, गन्ने के रकबे, अनुमानित उत्पादन, निर्यात और एथनॉल की आवश्यकता को एक साथ देखकर हर सीजन में डायवर्जन का प्रतिशत तय किया जाए?

यही विवेकपूर्ण रास्ता है। क्योंकि किसान को सिर्फ यह नहीं चाहिए कि उसका गन्ना खरीदा जाए। उसे स्थिर मांग, समय पर भुगतान और उचित मूल्य चाहिए। उपभोक्ता को सिर्फ यह नहीं चाहिए कि पेट्रोल में एथनॉल का प्रतिशत बढ़े। उसे यह भी चाहिए कि रसोई की चीनी उसकी पहुंच से बाहर न हो।

देश को सिर्फ विदेशी मुद्रा बचाने का आंकड़ा नहीं चाहिए। उसे “कुल राष्ट्रीय आर्थिक संतुलन” चाहिए। इसलिए आज प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि किसने सरकार की नीति की तारीफ की और किसने आलोचना की। प्रश्न यह होना चाहिए कि क्या नीति समय के साथ अपने परिणामों के आधार पर संशोधित होती है या नहीं?”

किसी नीति को लागू करना शासन है। “उसके बदलते परिणामों को देखकर उसे सुधारना सुशासन है।” और यहीं ‘मास्टरस्ट्रोक’ वाली राजनीति बेअसर हो जाती है। क्योंकि अगर एथनॉल से पेट्रोल की विदेशी मुद्रा बची, तो यह उपलब्धि है। अगर उसी समय चीनी बाजार में दबाव बढ़ा और सरकार को विदेश से चीनी मंगानी पड़ी, तो यह भी एक वास्तविक आर्थिक तथ्य है।

दोनों तथ्यों को एक साथ स्वीकार करना ही ईमानदार सार्वजनिक विमर्श है। “न राष्ट्रहित अंधभक्ति में है, न जनहित अंधविरोध में। राष्ट्रहित उस पारदर्शी नीति में है जिसमें किसान की आय, उपभोक्ता की थाली, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और विदेशी मुद्रा—पाँचों का संतुलन दिखाई दे।”

गन्ने से एथनॉल बनना अपने आप में समस्या नहीं है। “समस्या तब होगी जब नीति यह भूल जाए कि वही गन्ना किसी किसान की फसल और किसी परिवार की चीनी भी है।”

इसलिए सवाल सरकार से है— एथनॉल का प्रतिशत कितना हुआ, यह बताने के साथ यह भी बताइए कि “गन्ने के हर एक अतिरिक्त मोड़ का चीनी बाजार पर कितना असर पड़ा, कितना एथनॉल किस फीडस्टॉक से बना, कितनी चीनी डायवर्ट हुई, घरेलू स्टॉक कितना बचा, और आज आयात की जरूरत क्यों पड़ी?”

लोकतंत्र में यही सवाल विपक्ष का विशेषाधिकार नहीं, जनता का अधिकार है। और किसी भी सरकार की असली परीक्षा यही है कि वह अपने समर्थकों की तालियों से नहीं, अपने फैसलों के वास्तविक परिणामों से अपनी नीतियों को परखे।

  • गन्ने से एथनॉल बना—यह नीति है।
  • एथनॉल से पेट्रोल चला—यह ऊर्जा नीति का परिणाम है।
  • चीनी महंगी हुई—यह बाजार का संकेत है।
  • चीनी आयात करनी पड़ी—यह सरकार के लिए नीति की पुनर्समीक्षा का संकेत होना चाहिए।

इसे ‘मास्टरस्ट्रोक’ कहकर बहस समाप्त करना आसान है। “लेकिन राष्ट्र चलाना नारे से नहीं, संतुलन से होता है।”

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