मां की मौत ने जगाया सेवा का संकल्प, 101वीं बार रक्तदान कर आशीष पाठक ने पेश की मिसाल

18 वर्ष की उम्र में शुरू हुआ सफर आज 101वें रक्तदान तक पहुंचा — दुर्लभ AB नेगेटिव रक्त समूह के बावजूद जरूरतमंदों की मदद के लिए इंदौर से मुंबई और दिल्ली तक पहुंचे

रतलाम। पुलिस दर्पण

रतलाम। किसी अपने को रक्त के अभाव में खोने का दर्द जिंदगी भर नहीं भुलाया जा सकता। रतलाम के आशीष पाठक के जीवन में भी ऐसा ही एक दुखद अनुभव सेवा के संकल्प की वजह बन गया। उनकी मां का निधन रक्त की कमी के कारण हुआ। इस घटना ने उनके मन पर ऐसा प्रभाव डाला कि उन्होंने संकल्प लिया कि वे स्वयं नियमित रक्तदान करेंगे और जरूरतमंदों को रक्त की कमी के कारण जीवन न गंवाना पड़े, इसके लिए अपनी ओर से योगदान देंगे। इस संकल्प के साथ शुरू हुआ उनका रक्तदान का सफर अब 101वीं बार रक्तदान तक पहुंच गया है। सेवा संकल्प अभियान के अंतर्गत नगर निगम परिसर रतलाम में आयोजित रक्तदान शिविर में आशीष पाठक ने 101वीं बार रक्तदान किया। उनका यह कदम रक्तदान को लेकर समाज में जागरूकता और सेवा भावना का संदेश देता है।

18 वर्ष 4 माह की उम्र में पहली बार किया रक्तदान

आशीष पाठक ने बताया कि वर्ष 1992 में जून माह में, जब उनकी उम्र महज 18 वर्ष 4 माह थी, उन्होंने पहली बार रक्तदान किया था। उस समय लिया गया संकल्प लगातार उनके जीवन का हिस्सा बना रहा। एक रक्तदान से शुरू हुआ यह सिलसिला आज 101वें रक्तदान तक पहुंच चुका है। उनके लिए रक्तदान किसी एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि लंबे समय से निभाया जा रहा सेवा का संकल्प है।

AB नेगेटिव रक्त समूह, जरूरत पर कई शहरों तक पहुंचे

आशीष पाठक का रक्त समूह AB नेगेटिव है, जो अपेक्षाकृत दुर्लभ रक्त समूहों में शामिल माना जाता है। जरूरतमंदों तक रक्त पहुंचाने के उद्देश्य से वे रतलाम के अलावा इंदौर, मंदसौर, मुंबई, दिल्ली और दाहोद सहित विभिन्न स्थानों पर भी रक्तदान के लिए जा चुके हैं।
उनकी 101वीं बार रक्तदान की उपलब्धि इस बात को रेखांकित करती है कि नियमित रक्तदान के माध्यम से समाज में जरूरतमंद मरीजों की मदद की जा सकती है।

“रक्तदान केवल सामाजिक कार्य नहीं, जीवन बचाने का माध्यम”

101वीं बार रक्तदान करने के बाद आशीष पाठक ने कहा कि रक्तदान केवल सामाजिक कार्य नहीं है, बल्कि यह किसी जरूरतमंद व्यक्ति के जीवन को बचाने का माध्यम है। उन्होंने स्वस्थ एवं पात्र लोगों से नियमित रक्तदान के लिए आगे आने की अपील की।
उन्होंने कहा कि यदि लोग अपनी क्षमता और पात्रता के अनुसार रक्तदान के लिए आगे आएं तो रक्त की आवश्यकता वाले मरीजों को समय पर मदद मिल सकती है।

मां की याद को सेवा में बदल दिया

आशीष पाठक की कहानी का सबसे भावुक पहलू उनकी मां से जुड़ा है। रक्त की कमी के कारण मां को खोने के बाद उन्होंने उस पीड़ा को अपने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे समाजसेवा के संकल्प में बदल दिया। वर्ष 1992 में शुरू हुआ रक्तदान का सफर तीन दशक से अधिक समय बाद 101वें रक्तदान तक पहुंचा है। यह उपलब्धि सेवा संकल्प अभियान के उद्देश्य के अनुरूप रक्तदान के प्रति जागरूकता का संदेश देती है।
वर्तमान में आशीष पाठक पत्रिका समाचार पत्र के रतलाम संस्करण में संपादक के रूप में कार्यरत हैं। पत्रकारिता के साथ रक्तदान के माध्यम से सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उनकी निरंतर सक्रियता भी सामने आती है।

101वां रक्तदान—सिर्फ आंकड़ा नहीं, वर्षों से निभाया जा रहा संकल्प

आशीष पाठक का 101वां रक्तदान केवल एक संख्या नहीं, बल्कि वर्ष 1992 में लिए गए उस संकल्प की निरंतरता है, जो उनकी मां की मृत्यु के बाद उनके मन में जन्मा था। उनकी यह कहानी नियमित रक्तदान के लिए पात्र लोगों को आगे आने और जरूरतमंदों के जीवन में योगदान देने का संदेश देती है।

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