जल, जंगल, ज़मीन और जनादेश: विकास किसका, संसाधन किसके लिए?
…….पण्डित प्रदीप शुक्ल भारत का संविधान केवल शासन चलाने का दस्तावेज़ नहीं है; वह प्राकृतिक संसाधनों पर जनता के न्यायसंगत…
…….पण्डित प्रदीप शुक्ल भारत का संविधान केवल शासन चलाने का दस्तावेज़ नहीं है; वह प्राकृतिक संसाधनों पर जनता के न्यायसंगत…
“शक्ति-संतुलन, ऊर्जा-सुरक्षा और बदलती विश्व-व्यवस्था के बीच एक वैश्विक विमर्श” पश्चिम एशिया एक बार फिर उस ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा…
भारतीय ऊर्जा परिदृश्य का एक नया अध्याय : भारत इस समय अपने इतिहास के सबसे बड़े और महत्वाकांक्षी ऊर्जा संक्रमण…
“भारतीय लोकतंत्र की नींव” शासकों की जनता के प्रति अटूट जवाबदेही और विमर्श की शालीनता पर टिकी है। परंतु, हाल…