…..एक पत्रकार ने खुलवाया इंडो-नेपाल झापा बाजार और दिघलबैंक बॉर्डर का दरवाजा


…….प्रदीप कुमार

कोरोना काल में जब पूरी दुनिया अपने घरों में कैद थी, तब भारत-नेपाल की सीमा पर झापा बाजार और किशनगंज के दिघलबैंक का रास्ता भी ढाई साल तक बंद रहा। सीमा पिलर संख्या 134/20 पर लगा ताला सरकारी फाइलों में “बॉर्डर सील” था, पर झापा बाजार और दिघलबैंक के लोगों के लिए ये भूख, बीमारी और रिश्ते टूटने का दूसरा नाम बन गया था।
झापा बाजार नेपाल का तराई जिला है। यहां की मिट्टी में गंगाई और राजबंशी समुदाय की जड़ें हैं। इन्हें ही यहां का मूल आदिवासी माना जाता है। साथ में मधेशी, कोच और पहाड़ी लोग भी रहते हैं। नेपाल तथा भारत के पश्चिम से आए लोगों को वहाँ स्थानीय बोली में “पच्छिमा” कहा जाता है। कभी-कभी पहचान को लेकर खटपट हो जाती है, पर कुल मिलाकर सबका तालमेल ठीक-ठाक है। यहां के शिक्षक भी समाज से कटे नहीं हैं। वे पढ़ाने के साथ-साथ गांव की छोटी-मोटी राजनीति में भी हिस्सेदारी रखते हैं।
इस पूरे इलाके की धड़कन दिघलबैंक बाजार से जुड़ी है। झापा के लोग खाने-पीने का सामान, कपड़ा, किराना से लेकर दवा तक सब यहीं से खरीदने आते हैं। कारण साफ है की पास पड़ता है, रेट सस्ता है और भाषा अपनी है। महंगाई और बेरोजगारी पहले से यहां की सबसे बड़ी समस्या थी। ऊपर से बॉर्डर बंद हो गया तो मानो सांस ही रुक गई। स्कूलों में किताबें नहीं पहुंचीं, दुकानदारों के गल्ले खाली हो गए और बीमार लोगों के लिए इलाज दूर हो गया।
उसी दौरान झापा बाजार में पत्रकारिता करने गए एक शख्स प्रदीप कुमार नायक, स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार ने महसूस किया कि अब सिर्फ खबर लिखने से काम नहीं चलेगा। लोगों का दर्द सुनकर उसे कागज तक सीमित नहीं रखना है, समाधान तक पहुंचाना है।
इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सुरुंगा में उठाया गया। “होटल डी लाइट”* में नेपाल उद्योग वाणिज्य संघ और दोनों ओर के नागरिकों के साथ एक बड़ी बैठक हुई। इस बैठक में बॉर्डर बंद होने से हो रहे नुकसान और उसे खोलने की जरूरत पर खुलकर चर्चा हुई। होटल डी लाइट के संचालक खेम ओली ने सभी लोगों का स्वागत बड़े आत्मीय भाव से किया। उन्होंने बैठक के लिए न सिर्फ जगह दी, बल्कि सभी का आतिथ्य भी निःशुल्क किया। सीमा के इस संकट में उनके इस सहयोग की जितनी तारीफ की जाए कम है।
बैठक के बाद शिक्षकों और समाजसेवियों से भी लंबी चर्चा हुई। संतोष कुमार गणेश, सीताराम यादव, राम प्रसाद ठाकुर, मोहित लाल कामती, मिथिलेश गणेश और सुन्दर लाल गणेश जैसे शिक्षकों ने बताया कि बच्चों की पढ़ाई रुक गई है, स्कूल की कॉपियां-किताबें नहीं आ पा रही हैं। खाने-पीने की सामान से लेकर कपड़ा तक लाना मुश्किल हो गया है। रिश्तेदारों से मिलना-जुलना भी असंभव लगता है।
समाजसेवियों ने भी आगे आकर मदद की। अनन्त कोच, गणेश कुमार गणेश, मनी शंकर चौधरी, नवल किशोर भगत, नरेन्द्र गुप्ता, रामबाबू साह, नादिर आलम, सुनील चक्रवर्ती और विजय कोच ने दोनों तरफ के लोगों की बात एक जगह जुटाई और कहा कि अब आवाज ऊपर तक जानी चाहिए। सबकी एक ही आवाज थी की “साहब, किसी तरह बॉर्डर खुलवा दीजिए। भारत-नेपाल का रिश्ता खराब नहीं होना चाहिए।”
फिर ये आवाज सिस्टम तक पहुंची। SSB के कमांडेंट से बात हुई। नेपाल की तरफ DM, SP और APF के अधिकारियों से संवाद हुआ। तर्क एक ही था की ये सीमा दुश्मनी की नहीं, रोटी-रिश्ते की है। लगातार प्रयास के बाद आखिरकार वो दिन आया जब ढाई साल बाद दिघलबैंक का दरवाजा खुला। उस दिन बॉर्डर पर भीड़ नहीं थी, राहत थी।
बॉर्डर खुलने के बाद भी स्थानीय लोगों की एक बड़ी मांग बाकी रह गई। यहां के लोग चाहते हैं कि नेपाल बॉर्डर झापा बाजार पर छोटी भन्सार और भारतीय बॉर्डर दिघलबैंक पर सीमा शुल्क कार्यालय खुले। इससे आवागमन और व्यापार दोनों को कानूनी मान्यता मिलेगी, और दलालों-भ्रष्टाचार का झंझट भी खत्म होगा।
इसी मांग को लेकर पत्रकार प्रदीप कुमार नायक , नेपाल के शिक्षक संतोष कुमार गणेश और दिघलबैंक के प्रतिष्ठित व्यापारी मनी शंकर चौधरी, नवल किशोर भगत के साथ अररिया के सांसद प्रदीप कुमार सिंह से भी मुलाकात की गई। सांसद ने आश्वासन तो दिया कि इस मुद्दे को ऊपर तक पहुंचाया जाएगा, लेकिन अब तक उस दिशा में ठोस और आयातित सफलता नहीं मिल पाई है। लोग आज भी इसी आस में हैं कि एक दिन उनकी इस जायज मांग पर भी मुहर लगेगी।
उस दिन के बाद बहुत कुछ बदला। आज भी जब झापा बाजार जाना होता है तो लोग नाम से बुलाते हैं। संतोष कुमार गणेश जैसे शिक्षक चाय और भोजन पर बैठाकर बच्चों के पलायन की बात करते हैं। सीमांचल की विकास की बात करते हैं। मनी शंकर चौधरी जैसे व्यापारी पूछते हैं “अगली मांग क्या रखी जाए”। नवल किशोर जैसे व्यापारी भी सीमा पर कस्टम ऑफिस खोलने की बात करते हैं। और सबसे बड़ी बात, शादी-ब्याह के कार्ड आने लगे। खबर के लिए बुलावा अलग होता है, पर घर की खुशी में बुलावा आने लगे तो समझिए आप “बाहरी” नहीं रहे। आप अपने हो गए हैं।
दिघलबैंक का ये किस्सा सिर्फ एक बॉर्डर खुलने की कहानी नहीं है। ये बताता है कि भारत और नेपाल का असली रिश्ता संधियों और भाषणों में नहीं बसता। वो दाल-चावल, साड़ी और दवा की पोटली में बसता है। वो सुरुंगा के होटल डी लाइट की उस बैठक में बसता है जहां खेम ओली जैसे लोग निःस्वार्थ भाव से मेजबानी कराते हैं। वो उस चाय की दुकान में बसता है जहां नेपाली ग्राहक और भारतीय दुकानदार एक ही बेंच पर बैठकर हंसते हैं।
स्थानीय नेता कभी इधर झुकते हैं कभी उधर, पर जमीन का सच यही है कि सीमा जोड़ने के लिए बनी है, तोड़ने के लिए नहीं। और जब पत्रकारिता इस सच के साथ खड़ी हो जाए, तो एक कलम भी बॉर्डर खुलवा सकती है। भले ही छोटी भन्सार और सीमा शुल्क कार्यालय का सपना अभी अधूरा हो, पर उम्मीद जिंदा है।
झापा से दिघलबैंक तक का ये रास्ता आज भी चलता है। और उस रास्ते पर चलते लोगों को आज भी याद है कि मुश्किल समय में कौन उनके साथ खड़ा था।

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