जंतर-मंतर : जब ‘चुप रहो’ वाली राजनीति से टकराई भारत की युवा पीढ़ी

लोकतंत्र में जन-आंदोलन कोई असामान्य अवांछित घटना नहीं, बल्कि उसकी जीवंतता का प्रमाण होते हैं। भारतीय संविधान हर नागरिक को अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता है, यद्यपि उस पर सार्वजनिक व्यवस्था के हित में उचित सीमाएँ भी लागू होती हैं। इसलिए जब किसी परीक्षा-व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं, जब लाखों युवाओं का भविष्य संदेह के घेरे में आ जाता है, और जब वे जवाबदेही की माँग को लेकर जंतर-मंतर जैसे सार्वजनिक स्थल पर उतरते हैं, तब यह केवल एक समूह का आक्रोश नहीं रहता; वह लोकतंत्र की अंतरात्मा की आवाज़ बन जाता है। संसद ने फरवरी 2024 में सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों को रोकने के लिए अधिनियम भी पारित किया था, परंतु परीक्षा-प्रणाली की बार-बार होने वाली विफलताएँ यह दिखाती हैं कि केवल विधिक प्रावधान पर्याप्त नहीं; ईमानदार क्रियान्वयन, पारदर्शी संस्थाएँ और राजनीतिक इच्छाशक्ति भी अनिवार्य हैं।

जंतर-मंतर पर उभरा हालिया छात्र-आंदोलन इसी व्यापक संकट की उपज है। Reuters के अनुसार, मई 2026 में राष्ट्रीय मेडिकल प्रवेश परीक्षा के पेपर लीक ने लगभग 20 लाख छात्रों को प्रभावित किया, और इसके बाद युवाओं का असंतोष एक बड़े सड़क-आंदोलन में बदल गया। यह आंदोलन केवल एक परीक्षा के विरुद्ध नहीं था; यह उस पूरी व्यवस्था के विरुद्ध था जो प्रतिभा, परिश्रम और अनुशासन को बार-बार अविश्वास में बदल देती है। Reuters ने यह भी दर्ज किया कि यही असंतोष अंततः शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक पहुँचा और सरकार को परीक्षा सुधार, कार्रवाई तथा कुछ मामलों में मुआवज़े जैसी रियायतों पर मजबूर होना पड़ा।

इस आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह रही कि यह किसी पारंपरिक पार्टी-प्रायोजन से नहीं, बल्कि युवा असंतोष की स्वायत्त ऊर्जा से जन्मा। Reuters के अनुसार, इसे व्यंग्य और प्रतीकात्मक राजनीति ने गति दी; एक न्यायिक टिप्पणी, जिसे बेरोज़गार युवाओं ने अपमानजनक माना, इस भावनात्मक विस्फोट की प्रारंभिक चिंगारी बनी। उसी से “Cockroach Janta Party” जैसे व्यंग्यात्मक नाम का जन्म हुआ, जो शीघ्र ही इंटरनेट से निकलकर सड़क पर आ गया। यह इस बात का संकेत है कि Gen Z केवल सोशल मीडिया की पीढ़ी नहीं है; वह प्रतीकों को राजनीतिक भाषा में बदलना जानती है। वह अपमान को अपील में, और उपहास को प्रतिरोध में बदल सकती है।

यही इस आंदोलन की ऐतिहासिक भिन्नता है। भारत में छात्र और किसान आंदोलनों की लंबी परंपरा रही है—जेपी आंदोलन, रेल कर्मचारियों का संघर्ष, मजदूर आंदोलनों की विरासत, किसानों के ऐतिहासिक धरने—सबने सत्ता को यह बताया कि लोकतंत्र को केवल चुनाव से नहीं, सतत उत्तरदायित्व से जिंदा रखा जाता है। लेकिन जंतर-मंतर का नया उभार इसलिए विशेष है कि उसने यह दिखा दिया कि आज का युवा केवल रोजगार नहीं, अपमान-मुक्त जीवन चाहता है; केवल डिग्री नहीं, विश्वसनीय परीक्षा-प्रणाली चाहता है; केवल विकास की घोषणाएँ नहीं, सम्मानजनक भविष्य चाहता है। यह माँग कोई भावुकता नहीं, बल्कि संवैधानिक नागरिकता का स्वाभाविक आग्रह है।

इस संदर्भ में सरकार की भूमिका को भी ईमानदारी से परखना होगा। राज्य का पहला कर्तव्य है कि वह परीक्षाओं को निष्पक्ष, सुरक्षित और भरोसेमंद बनाए; उसका दूसरा कर्तव्य है कि जब भरोसा टूटे तो वह नागरिकों के सामने उत्तरदेह हो। लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) अधिनियम, 2024 इसी दिशा में एक विधिक प्रयास था, लेकिन बार-बार सामने आ रहे लीक और रद्दीकरण यह दिखाते हैं कि कानून का होना और कानून का असरदार होना दो अलग बातें हैं। यदि कानून केवल दंड का औजार रह जाए और परीक्षा-प्रशासन की संस्कृति न बदले, तो युवा पीढ़ी के अविश्वास को और गहरा करता है।

इसीलिए यह आंदोलन केवल “एक मंत्री के इस्तीफे” की माँग नहीं था। यह उस बड़े प्रश्न का विस्फोट था कि क्या भारत की परीक्षा-व्यवस्था मेरिट का सम्मान करती है या फिर उसे बार-बार संदिग्ध बना देती है। Reuters के अनुसार, इस उभार के पीछे नौकरी की कमी, प्रवेश की कड़वी प्रतिस्पर्धा, और उस सामाजिक दबाव की भी बड़ी भूमिका है जिसमें एक डिग्री को सुरक्षित जीवन का अंतिम टिकट माना जाता है। जब देश की युवा आबादी के लिए रोजगार की राह संकरी होती जाती है, तब परीक्षा की एक-एक गलती केवल तकनीकी त्रुटि नहीं रहती; वह जीवन-योजना पर चोट बन जाती है।

यह भी उल्लेखनीय है कि संविधान ने नागरिकों को विरोध का अधिकार दिया है, पर वह अधिकार राज्य के डर से छोटा नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने हाल के जंतर-मंतर प्रसंग में नाबालिगों की रिहाई और वीडियो-साक्ष्य सुरक्षित रखने जैसे निर्देश दिए, जिससे यह स्पष्ट होता है कि लोकतंत्र में कानून-व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रता को एक-दूसरे का शत्रु नहीं, बल्कि संतुलित सह-उद्देश्य माना जाना चाहिए। शांतिपूर्ण विरोध को अपराध की तरह नहीं, लोकतांत्रिक संवाद की तरह संभाला जाना चाहिए। यदि कहीं हिंसा या अव्यवस्था है, तो उसका निवारण ज़रूरी है; परंतु यदि शांतिपूर्ण छात्र-आंदोलन को ही अवैध मान लिया जाए, तो संविधान का आशय ही उलट जाएगा।

वास्तविक संकट केवल परीक्षा-व्यवस्था का नहीं, नागरिक विश्वास का है। जब युवा यह अनुभव करते हैं कि उनकी मेहनत का मूल्यांकन निष्पक्षता से नहीं हो रहा, जब उन्हें लगता है कि उनके भविष्य की कुंजी किसी बंद कमरे में रखी है, तब उनका रोष स्वाभाविक है। और जब यह रोष संगठित होकर लोकतांत्रिक भाषा पाता है, तब वह राष्ट्र-विरोध नहीं, राष्ट्र-हित बन जाता है। राष्ट्रहित का अर्थ सत्ता की आलोचना का निषेध नहीं, बल्कि ऐसी आलोचना की रक्षा है जो व्यवस्था को बेहतर बनाए। जनहित का अर्थ भी यही है—उन लोगों की सुनवाई, जिनके कंधों पर इस देश का भविष्य टिका है।

आज भारत को एक ऐसे सार्वजनिक नैतिक ढाँचे की आवश्यकता है जिसमें परीक्षा-प्रणाली, भर्ती-प्रक्रिया और संस्थागत जवाबदेही पर भरोसा लौटे। युवा पीढ़ी को केवल “अनुशासन” का पाठ पढ़ाना पर्याप्त नहीं; राज्य को पहले अपने अनुशासन का प्रमाण देना होगा। अगर पेपर सुरक्षित नहीं हैं, प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है, और उत्तरदायित्व तय नहीं होता, तो युवाओं से मौन की अपेक्षा अन्याय होगी। जंतर-मंतर का यह छात्र-उभार इसी अन्याय के विरुद्ध एक सुसंस्कृत, लोकतांत्रिक और साहसिक हस्तक्षेप है।

इसलिए इस आंदोलन को किसी दल, किसी नारे, किसी उपहास या किसी तात्कालिक राजनीतिक गणित में सीमित करना भूल होगी। यह भारत के उस युवा मन का घोष है जो अब अपमान को सामान्य नहीं मानता, जो अपने भविष्य को सौदेबाज़ी की वस्तु नहीं समझता, और जो यह मानने से इंकार करता है कि उसकी मेहनत की नियति अनिश्चितता है। यही कारण है कि जंतर-मंतर आज केवल विरोध का स्थान नहीं, लोकतांत्रिक पुनर्जागरण का प्रतीक बन गया है।

और यदि राज्य इस संदेश को सुन ले, तो यह आंदोलन केवल एक मंत्री के इस्तीफे या एक परीक्षा की पुनर्समीक्षा तक सीमित नहीं रहेगा। यह उस बड़े लोकतांत्रिक सुधार की शुरुआत बन सकता है जिसमें भारत का युवा यह कह सके—हमने अपनी आवाज़ दी, और राज्य ने उसे सुना। यही विश्वास राष्ट्र को मजबूत करता है। यही भरोसा लोकतंत्र को जीवित रखता है। और यही जन-आंदोलन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि होती है।

Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!