लोकतंत्र की धड़कन और संसद का शून्यता काल
संसद का मानसून सत्र अपनी निर्धारित नियति यानी 13 अगस्त को समाप्त होने की ओर अग्रसर है, किंतु यह संपूर्ण सत्र भारतीय संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में एक विडंबनापूर्ण और चिंताजनक अध्याय के रूप में दर्ज हो चुका है। तीन सप्ताह से अधिक की लंबी अवधि और जनता के करों से पोषित इस सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था में एक भी दिन ऐसा नहीं बीता, जब सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच वैचारिक एवं राजनीतिक गतिरोध के बादल न छाए हों। संसद, जो कि देश की सवा सौ करोड़ से अधिक जनता की आकांक्षाओं, समस्याओं और वैचारिक संवाद का सर्वोच्च मंदिर है, आज महज राजनीतिक अखाड़े और गतिरोध का केंद्र बनकर रह गई है।
यह स्थिति केवल दो राजनीतिक दलों की आपसी खींचतान भर नहीं है, बल्कि यह देश के संवैधानिक स्वास्थ्य, विधिक पारदर्शिता, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रहित पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।
राजनीतिक विमर्श: आरोपों की राजनीति और सत्तापक्ष की विचित्र रणनीतियां
मंगलवार को संसद परिसर में जो दृश्य उभरा, उसने भारतीय राजनीति की प्राथमिकताओं को जगजाहिर कर दिया। जब सत्तापक्ष (NDA) के सांसद स्वयं संसद परिसर में धरने पर बैठ जाएं और विपक्ष के नेता राहुल गांधी से झारखंड के घटनाक्रम पर जवाब मांगें, तो यह संसदीय परंपराओं के विपरीत एक अनोखा राजनीतिक पैंतरा प्रतीत होता है।
- विरोधाभासी रणनीतिक संदेश: एक ओर सत्तापक्ष यह दावा करता है कि कांग्रेस पार्टी और उसके नेता राजनीति में अप्रासंगिक हो चुके हैं, वहीं दूसरी ओर हर बड़े संकट के लिए उन्हीं को जिम्मेदार ठहराना इस दावे की पोल खोलता है। यदि झारखंड में झामुमो-कांग्रेस गठबंधन सरकार के नाते राहुल गांधी से जवाबदेही तय की जा सकती है, तो जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन और वहां उत्पन्न हुई प्रशासनिक अराजकता के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की सीधी नैतिक और राजनीतिक जिम्मेदारी से मुंह क्यों मोड़ा जा रहा है?
- समाधान बनाम राजनीतिक नूराकुश्ती: यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि सत्तापक्ष का उद्देश्य समस्याओं का रचनात्मक समाधान खोजना नहीं, बल्कि विमर्श के केंद्र को भटकाना है। जब सत्तारूढ़ दल के सांसदों को अपनी ही सरकार के मुखिया के बजाय विपक्षी नेता से न्याय और समाधान की उम्मीद नजर आने लगे, तो यह सत्ता के विकेंद्रीकरण और राजनीतिक इच्छाशक्ति के क्षरण का सूचक है।
संवैधानिक एवं विधिक आयाम: कार्यपालिका की जवाबदेही और संसद की संप्रभुता
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 75(3) स्पष्ट रूप से यह प्रावधानित करता है कि मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है। संसद का मूल कार्य केवल कानून पारित करना ही नहीं, बल्कि कार्यपालिका (सरकार) को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना भी है।
- गृह मंत्रालय की जवाबदेही का अभाव: दिल्ली में छात्र प्रदर्शनों के दौरान कथित पुलिसिया कार्रवाई, लाठीचार्ज और पैलेट गन के प्रयोग जैसे गंभीर विधिक और मानवाधिकार से जुड़े मुद्दों पर देश गृह मंत्रालय से सीधे स्पष्टीकरण की मांग कर रहा है। संसद में केवल एक सामान्य और रस्मी चर्चा करा देना या गृह मंत्री द्वारा पारंपरिक भाषण दे देना संवैधानिक जवाबदेही की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। जब तक यह स्पष्ट नहीं होता कि बल प्रयोग का विधिक आदेश किसने दिया, तब तक कानून के शासन (Rule of Law) की अवहेलना बनी रहती है।
- संघीय ढांचा और स्थानीय जांच की आड़: राम मंदिर के लिए आए चंदे में कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के मामलों में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा एसआईटी (SIT) गठन का हवाला देकर संसद में चर्चा से बचना संवैधानिक रूप से एक कमजोर तर्क है। जब राष्ट्रव्यापी आस्था, जनभावनाओं और धार्मिक न्यास से जुड़े वित्तीय प्रबंधन पर गंभीर सवाल उठते हैं, तो राष्ट्रीय मंच पर इस पर विधायी संज्ञान और पारदर्शिता अनिवार्य हो जाती है। संघीय ढांचे के नाम पर राष्ट्रीय महत्व के वित्तीय और विधिकप्रश्नों को टालना कार्यपालिका की जवाबदेही से बचने का एक छलावा मात्र है।
लोकतांत्रिक मूल्य और संसदीय शिष्टाचार का पतन
लोकतंत्र केवल बहुमत के बल पर शासन करने का नाम नहीं है, बल्कि यह अल्पमत और विपक्ष के वैध स्वरों के समादर तथा स्वस्थ संवाद की जीवंत प्रक्रिया है।
“संसद संवाद और सहमति का केंद्र है, न कि सत्ता के अहंकार और विपक्ष के दमन का यंत्र।”
- संसदीय कार्यमंत्री की शर्तें और तानाशाही रवैया: सरकार की ओर से यह शर्त रखना कि चर्चा तभी होगी जब विपक्ष सदन में कोई टोका-टोकी न करे और शांतिपूर्वक गृह मंत्री का भाषण सुने, भारतीय लोकतंत्र की बहुलतावादी मूल भावना के विरुद्ध है। यह एक ऐसे ‘निर्देशित लोकतंत्र’ की रूपरेखा खींचता है जहाँ विपक्ष को भी सत्तापक्ष की इच्छाओं के अनुरूप कठपुतली की तरह संचालित करने का प्रयास किया जाता है।
- शीर्ष नेतृत्व की सदन से दूरी: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का संसद के पटल पर सीधे और तीखे सवालों का सामना करने से बचना इस बात का द्योतक है कि कार्यपालिका विधायी नियंत्रण से परे स्वतंत्र रूप से कार्य करना चाहती है। जब देश के सर्वोच्च नेता वैश्विक मंचों पर लोकतंत्र की जननी होने का दावा करते हैं, तो उन्हें अपने ही देश की संसद में कठिन प्रश्नों का सामना करने से लोकतांत्रिक परिपक्वता का परिचय देना चाहिए।
राष्ट्रहित और जनहित: हाशिए पर खड़ी जनता की समस्याएं
इन राजनीतिक बहसों और हंगामों के बीच सबसे बड़ा नुकसान राष्ट्रहित और जनहित का हो रहा है।
- युवाओं और छात्रों का भविष्य दांव पर: दिल्ली से लेकर झारखंड तक छात्र अपने भविष्य, निष्पक्ष परीक्षाओं और रोजगार के लिए सड़कों पर संघर्ष कर रहे हैं। पुलिसिया कार्रवाई और दमन के शिकार ये छात्र देश का भविष्य हैं। इनकी वाजिब मांगों को राजनीतिक फुटबॉल बना देना राष्ट्रहित के बिल्कुल विपरीत है।
- जनता के धन की बर्बादी: संसद सत्र का एक-एक दिन देश के करोड़ों-अरबों रुपये के करदाताओं के धन से संचालित होता है। यदि पूरा सत्र बिना किसी सार्थक विधायी कार्य, बिना जनहित के विधेयकों पर गंभीर चर्चा और बिना राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान के हंगामे की भेंट चढ़ जाता है, तो यह लोकतंत्र के साथ सीधा विश्वासघात है।
- विश्वास का संकट: जब राम मंदिर जैसे सांस्कृतिक एवं आस्था के केंद्रों से जुड़े वित्तीय प्रबंधन पर भी पारदर्शिता के बजाय राजनीतिक नफा-नुकसान देखा जाने लगे, तो समाज में नैतिक मूल्यों का क्षरण होता है। जनता का तंत्र से विश्वास उठने लगता है, जो कि आंतरिक सुरक्षा और सामाजिक समरसता के लिए दीर्घकाल में घातक सिद्ध हो सकता है।
आत्ममंथन की आवश्यकता
संसद के इस मानसून सत्र की विफलता किसी एक दल की हार या जीत का विषय नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण भारतीय लोकतंत्र के लिए एक गंभीर आत्ममंथन का अवसर है। सत्ता और विपक्ष दोनों को यह समझना होगा कि संसद नारेबाजी का मंच नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की प्रयोगशाला है।
यदि सरकार को अपनी नीतियों पर गर्व है और वह जनहित के प्रति समर्पित होने का दावा करती है, तो उसे विपक्ष के तीखे से तीखे सवालों से भागने के बजाय संसद के पटल पर खुलकर तार्किक और तथ्यात्मक जवाब देना चाहिए। इसी में संविधान की गरिमा, लोकतंत्र की जीवंतता, विधिक पारदर्शिता और सर्वोच्च राष्ट्रहित निहित है।

