….पण्डित प्रदीप शुक्ल
“स्कूल का भोजन दया नहीं, संविधान, मानव पूंजी और राष्ट्र के भविष्य में निवेश है”
हरदोई, उत्तर प्रदेश से सामने आया एक वायरल वीडियो—जिसमें सरकारी स्कूल के बच्चों को दोपहर के भोजन में कथित रूप से केवल सूखे चावल परोसे जाते दिखाई दे रहे हैं—सिर्फ एक स्कूल की रसोई की तस्वीर नहीं है। यह उस पूरे शासन-तंत्र के सामने रखा गया आईना है जिसमें विकास के बड़े-बड़े दावे तो बहुत हैं, लेकिन बच्चे की थाली में पोषण की बुनियादी शर्त अब भी कई जगह अधूरी दिखाई देती है।
इस वीडियो की स्थानीय प्रशासन द्वारा स्वतंत्र जांच और तथ्यात्मक पुष्टि आवश्यक है। लेकिन मान भी लिया जाए कि यह एक स्थानीय स्तर की गंभीर लापरवाही है, तब भी सवाल खत्म नहीं होता। उलटे यहीं से सबसे बड़ा सवाल शुरू होता है—”क्या किसी बच्चे की थाली को महज एक सरकारी योजना की प्रविष्टि समझा जा सकता है, या वह संविधान की उस प्रतिबद्धता का हिस्सा है जिसके केंद्र में गरिमा, समानता, शिक्षा और जीवन का अधिकार है?”
उत्तर स्पष्ट है। स्कूल का मध्याह्न भोजन कोई सरकारी कृपा नहीं है। यह भारत के खाद्य-सुरक्षा और बाल-अधिकार ढाँचे का हिस्सा है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 की धारा 5 के तहत छह से चौदह वर्ष की आयु या कक्षा VIII तक के बच्चों को सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों में प्रत्येक स्कूल दिवस एक निःशुल्क मध्याह्न भोजन का अधिकार दिया गया है, जिसे निर्धारित पोषण मानकों को पूरा करना है।
और प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण—PM POSHAN—के मौजूदा पोषण मानक और भी स्पष्ट हैं। प्राथमिक कक्षाओं के बच्चे के लिए भोजन में 450 किलो कैलोरी और 12 ग्राम प्रोटीन का लक्ष्य है; इसके लिए 100 ग्राम खाद्यान्न, 20 ग्राम दाल, 50 ग्राम सब्जी और 5 ग्राम तेल/वसा निर्धारित हैं। उच्च प्राथमिक में यह मानक 700 किलो कैलोरी और 20 ग्राम प्रोटीन तक जाता है।
इसलिए थाली में चावल होना पर्याप्त नहीं है। चावल भोजन का नाम है; पोषण भोजन का उद्देश्य। अगर बच्चे को चावल मिल गया, लेकिन दाल, सब्जी, तेल और आवश्यक पोषक तत्व गायब हैं, तो योजना की आत्मा पूरी नहीं हुई।
‘2.71 रुपये’ का सच क्या है?
इस बहस में एक तथ्यात्मक सुधार भी उतना ही जरूरी है जितना सरकार की जवाबदेही। अक्सर यह कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार स्कूल के एक बच्चे के भोजन पर केवल ₹2.71 खर्च करती है। यह पूरी तस्वीर नहीं है। केंद्र सरकार के अप्रैल 2025 के आधिकारिक विवरण के अनुसार प्राथमिक स्तर पर PM POSHAN की ‘Material Cost’ ₹6.78 प्रति बच्चे प्रति दिन है। गैर-पूर्वोत्तर राज्यों में 60:40 साझेदारी के अनुसार इसका 60 प्रतिशत केंद्र और 40 प्रतिशत राज्य का हिस्सा होता है—अर्थात लगभग ₹4.07 केंद्र और ₹2.71 राज्य। इसके अतिरिक्त खाद्यान्न की लागत और परिवहन आदि में केंद्र का अलग योगदान है; केंद्र के अनुसार सभी घटकों को मिलाकर प्राथमिक स्तर पर प्रति भोजन लागत लगभग ₹12.13 बैठती है।
इसलिए बहस को यह कहकर नहीं चलाया जा सकता कि “सरकार बच्चे को केवल ₹2.71 में खाना खिलाती है।” लेकिन इस तथ्य-संशोधन से मूल प्रश्न समाप्त भी नहीं होता।क्योंकि ₹2.71 राज्य का न्यूनतम सामग्री-हिस्सा है, और राज्यों को न्यूनतम अनिवार्य हिस्से से अधिक खर्च करने की स्वतंत्रता है। केंद्र स्वयं कहता है कि राज्य अपने संसाधनों से इससे अधिक योगदान कर सकते हैं ताकि भोजन की पोषण गुणवत्ता बढ़ाई जा सके।
यहीं असली राजनीतिक प्रश्न है—”क्या उत्तर प्रदेश अपने बच्चों को केवल न्यूनतम वैधानिक मानक तक सीमित रखेगा, या पोषण को मानव-पूंजी निर्माण की प्राथमिकता बनाकर उस न्यूनतम से आगे जाएगा?” किसी गरीब राज्य की वित्तीय सीमाएं वास्तविक हो सकती हैं, लेकिन बच्चों का भविष्य भी वास्तविक है।
दुनिया बदल रही है, हमारी सोच भी बदलनी होगी
विश्व खाद्य कार्यक्रम की 2024 की रिपोर्ट इस बहस को एक नए ढाँचे में रखती है। 2020 से 2024 के बीच दुनिया में स्कूल भोजन पर सार्वजनिक निवेश 43 अरब डॉलर से बढ़कर 84 अरब डॉलर हो गया और इसका 99 प्रतिशत वित्तपोषण राष्ट्रीय बजटों से आया। आज लगभग 46.6 करोड़ बच्चे किसी न किसी राष्ट्रीय स्कूल-मील कार्यक्रम से लाभान्वित हो रहे हैं।
क्यों? क्योंकि दुनिया के नीति-निर्माताओं ने यह समझ लिया है कि स्कूल का भोजन केवल भूख मिटाने की योजना नहीं है। यह शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, सामाजिक सुरक्षा और भविष्य की उत्पादकता से जुड़ा निवेश है।
WFP के अनुसार स्कूल भोजन में लगाया गया प्रत्येक एक डॉलर विभिन्न परिस्थितियों में लगभग 7 से 35 डॉलर तक का आर्थिक लाभ उत्पन्न कर सकता है। इससे बच्चों की उपस्थिति, एकाग्रता और सीखने के परिणाम सुधरते हैं तथा स्थानीय कृषि और रोजगार को भी सहारा मिल सकता है। यानी दुनिया की भाषा में स्कूल भोजन अब charity नहीं, human-capital investment है। भारत को भी यही भाषा सीखनी होगी।
भूखा बच्चा गणित नहीं सीख सकता
शिक्षा नीति का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि हम किताब और भोजन को अलग-अलग विभागों की चीज समझते हैं। बच्चे का दिमाग भूख से अलग होकर काम नहीं करता।
भूख उसकी एकाग्रता को प्रभावित करती है। पोषण की कमी उसके शारीरिक विकास को प्रभावित करती है। आयरन, प्रोटीन, माइक्रोन्यूट्रिएंट्स और विविध आहार की कमी सीखने और स्वास्थ्य पर असर डालती है।
UNICEF भारत स्पष्ट रूप से बताता है कि शुरुआती वर्षों में पोषण की कमी शारीरिक तथा मस्तिष्कीय विकास को प्रभावित कर सकती है और इसके प्रभाव सीखने और भविष्य की आर्थिक क्षमता तक जा सकते हैं। पहले 1,000 दिन—गर्भावस्था से लेकर बच्चे के दूसरे जन्मदिन तक—विशेष रूप से निर्णायक होते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि छठी कक्षा में मिलने वाला एक भोजन उन पहले 1,000 दिनों की सारी कमी की भरपाई कर सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह जरूर है कि स्कूल भोजन को भी बच्चे के विकास की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए। और भारत की तस्वीर आरामदेह नहीं है।
NFHS-5 के अनुसार भारत में पाँच वर्ष से कम आयु के 35.5 प्रतिशत बच्चे stunted, 19.3 प्रतिशत wasted और 32.1 प्रतिशत underweight पाए गए। उत्तर प्रदेश में stunting 39.7 प्रतिशत थी—राष्ट्रीय औसत से अधिक।
इसलिए “भारत में लगभग 40 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं” जैसी एकल संख्या से अधिक उपयोगी यह देखना है कि कुपोषण कई रूपों में मौजूद है—विकास रुकना, वजन कम होना, एनीमिया, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी और अपर्याप्त आहार। यही कारण है कि स्कूल की थाली को राजनीतिक प्राथमिकता बनाना जरूरी है।
संविधान बच्चे की थाली में भी दिखाई देना चाहिए
भारतीय संविधान में “स्कूल की थाली” नाम से कोई अलग मौलिक अधिकार नहीं लिखा है, लेकिन बच्चों के जीवन, गरिमा, शिक्षा, समानता और पोषण से जुड़े कई संवैधानिक प्रावधान मिलकर एक व्यापक संरक्षण-ढाँचा बनाते हैं।
अनुच्छेद 21 की न्यायिक व्याख्या में जीवन का अर्थ केवल जीवित रहना नहीं बल्कि गरिमापूर्ण जीवन है। सर्वोच्च न्यायालय ने पोषण और स्वास्थ्य को बच्चे के अधिकारों के मूल तत्वों से जोड़ा है तथा right to food को जीवन और गरिमा की संवैधानिक समझ के भीतर देखा है।
इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 21-A छह से चौदह वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा का मौलिक अधिकार देता है। नीति-निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 39(f), 45 और 47 बच्चों के विकास, प्रारंभिक बाल देखभाल और पोषण-सार्वजनिक स्वास्थ्य की दिशा में राज्य की जिम्मेदारी को रेखांकित करते हैं।
इसका संदेश स्पष्ट है—”विद्यालय में बच्चा केवल पढ़ने नहीं आता; वह राज्य की जिम्मेदारी के संरक्षण में आता है।” इसलिए उसकी थाली में लापरवाही केवल प्रशासनिक अव्यवस्था नहीं है। लगातार और व्यवस्थित रूप में ऐसी लापरवाही हो तो वह समानता, गरिमा, शिक्षा और खाद्य-सुरक्षा के मूल प्रश्नों को जन्म देती है।
सर्वोच्च न्यायालय ने ‘सूखा राशन’ नहीं, पका हुआ भोजन चाहा था
मध्याह्न भोजन के इतिहास में सर्वोच्च न्यायालय का 28 नवंबर 2001 का PUCL मामला एक निर्णायक मोड़ था। अदालत ने सरकारी और सहायता प्राप्त प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों को निर्धारित कैलोरी और प्रोटीन वाला पका हुआ मध्याह्न भोजन उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था। न्यायालय ने उन राज्यों को भी स्पष्ट दिशा दी थी जो सूखे राशन के आधार पर योजना चला रहे थे कि उन्हें पके हुए भोजन की ओर बढ़ना होगा। उस समय का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है—”राज्य बच्चे की भूख को कागज़ पर नहीं, थाली में संबोधित करे।”
आज यदि किसी विद्यालय में दाल और सब्जी के स्थान पर केवल चावल दिखाई देते हैं, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि योजना की निगरानी-व्यवस्था कहाँ है, स्थानीय समिति क्या कर रही है, विद्यालय प्रबंधन क्या देख रहा है, ब्लॉक स्तर पर सत्यापन किस प्रकार होता है और खाद्य-सामग्री विद्यालय तक पहुँचने के बाद उसकी वास्तविक मात्रा तथा गुणवत्ता की जांच कौन करता है।
समाधान केवल ‘डांट’ नहीं, व्यवस्था है
किसी वायरल वीडियो के बाद प्रधानाध्यापक या रसोइया को निलंबित कर देना आसान है। लेकिन उससे प्रणाली नहीं सुधरती।
एक स्कूल में भोजन खराब मिला तो जिम्मेदार व्यक्ति पर कार्रवाई होनी चाहिए। मगर अगर समस्या कई स्कूलों में है, तो यह व्यक्तिगत अपराध नहीं रह जाता—यह शासन की डिजाइन की समस्या बन जाती है।
- हर विद्यालय में सार्वजनिक रूप से दैनिक मेन्यू प्रदर्शित होना चाहिए।
- कितने बच्चे उपस्थित हैं, कितने भोजन बने, कितनी दाल और सब्जी आई—इसका रिकॉर्ड पारदर्शी होना चाहिए।
- माता-पिता और स्कूल प्रबंधन समितियों की निगरानी वास्तविक होनी चाहिए।
- स्थानीय स्तर पर शिकायत का त्वरित निवारण होना चाहिए।
- खाद्य गुणवत्ता और पोषण मानकों का स्वतंत्र सामाजिक ऑडिट होना चाहिए।
- और जहाँ संभव हो, स्थानीय किसानों, महिला स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय उत्पादकों को आपूर्ति-श्रृंखला से जोड़ा जाना चाहिए।
यह केवल भ्रष्टाचार रोकने के लिए नहीं, बल्कि पोषण को स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ने के लिए भी आवश्यक है। WFP भी स्कूल भोजन को स्थानीय कृषि और रोजगार से जोड़ने वाली “home-grown school feeding” व्यवस्था को व्यापक विकास के अवसर के रूप में देखता है।
अंडे का प्रश्न धर्म का नहीं, पोषण का होना चाहिए
भारत जैसे विविध देश में स्कूल भोजन पर बहस केवल इस बात पर अटक जाना कि मेन्यू में अंडा हो या न हो, समस्या को बहुत छोटा कर देना है।
भारत में भोजन की आदतें क्षेत्र, समुदाय और संस्कृति के अनुसार भिन्न हैं। राज्य को संवेदनशीलता के साथ काम करना चाहिए। लेकिन बच्चों के भोजन की वैज्ञानिक गुणवत्ता किसी सांस्कृतिक बहस की बंधक नहीं बननी चाहिए।
अंडा उपलब्ध कराना किसी बच्चे को मजबूर करना नहीं है; विकल्प उपलब्ध कराना, स्थानीय भोजन-पद्धति के अनुसार दाल, दूध, दही, सोया, चना, पनीर, मूंगफली या अन्य प्रोटीन स्रोत देना भी संभव है।
मुद्दा यह है कि जिस पोषण को एक खाद्य पदार्थ से प्राप्त करना है, उसका विश्वसनीय विकल्प क्या है?
तेलंगाना के सरकारी विवरण में प्राथमिक स्तर के लिए ₹6.19 की cooking/material cost और कक्षा I-VIII के लिए सप्ताह में तीन अंडों की व्यवस्था दर्ज है; अंडे की लागत को cooking cost से अलग रखा गया है।
पश्चिम बंगाल में भी हाल में स्कूल भोजन में अंडे को फिर शामिल करने की प्रक्रिया शुरू हुई है।
यह दिखाता है कि पोषण नीति स्थिर नहीं होती; राज्य अपने संसाधनों, स्थानीय परिस्थितियों और राजनीतिक इच्छाशक्ति के अनुसार न्यूनतम केंद्रीय मानकों से ऊपर जा सकते हैं। उत्तर प्रदेश भी जा सकता है।
गाय और बच्चे को आमने-सामने खड़ा करना भी उचित नहीं
यहाँ इस बहस में एक मानवीय सावधानी जरूरी है। गाय के प्रति करुणा गलत नहीं है। पशु कल्याण किसी सभ्य समाज की पहचान है। संविधान का अनुच्छेद 51A(g) नागरिकों को जीवित प्राणियों के प्रति करुणा रखने का दायित्व देता है। अतः आवारा या परित्यक्त पशुओं की देखभाल को केवल “फिजूल खर्च” कहकर खारिज करना भी उचित नहीं होगा।
समस्या तब पैदा होती है जब पशु-कल्याण और बाल-पोषण को शून्य-योग संघर्ष की तरह प्रस्तुत किया जाए—मानो एक को पैसा देने के लिए दूसरे का हिस्सा काटना ही पड़े। असल नीति-प्रश्न यह है—”क्या राज्य दोनों के लिए पर्याप्त, पारदर्शी और परिणाम-आधारित व्यवस्था बना सकता है?”
उत्तर प्रदेश में कुछ योजनाओं में निराश्रित पशुओं की देखभाल के लिए परिवारों को ₹50 प्रति पशु प्रति दिन सहायता दिए जाने की वर्तमान व्यवस्था की रिपोर्टिंग हुई है। लेकिन इस आंकड़े की तुलना सीधे स्कूल भोजन की ₹2.71 राज्य हिस्सेदारी से करना वित्तीय रूप से उचित तुलना नहीं है, क्योंकि दोनों मदों का बजट ढाँचा, लाभार्थी, घटक और केंद्र-राज्य वित्तपोषण अलग हैं।
फिर भी इससे एक अधिक गंभीर नैतिक प्रश्न पैदा होता है—”जिस राज्य के पास राजनीतिक प्राथमिकताओं के अनुसार अतिरिक्त धन लगाने की क्षमता है, क्या उसी राज्य के पास बच्चों की थाली को न्यूनतम मानक से बेहतर बनाने की भी राजनीतिक इच्छा है?” यही असली सवाल है।
गाय की गरिमा भी, बच्चे की गरिमा भी
भारत का सभ्य समाज ऐसा होना चाहिए जहाँ गाय भूखी न रहे और बच्चा भी भूखा न रहे।
- जहाँ पशु के लिए आश्रय हो और बच्चे के लिए पोषण।
- जहाँ गोशाला हो तो उसकी पारदर्शिता भी हो और स्कूल रसोई हो तो उसकी गुणवत्ता भी।
- जहाँ धर्म का सम्मान हो, लेकिन धर्म के नाम पर विज्ञान को दरवाजे से बाहर न किया जाए।
- जहाँ आस्था को चोट पहुँचाए बिना पोषण का विज्ञान लागू किया जाए।
- और सबसे बढ़कर—जहाँ किसी गरीब बच्चे को उसकी गरीबी का स्वाद उसकी थाली में न चखना पड़े।
क्योंकि लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव में वोट देना नहीं। लोकतंत्र का अर्थ यह भी है कि राज्य अपने सबसे कमजोर नागरिक के साथ कैसा व्यवहार करता है।
असली ‘राष्ट्रवाद’ कहाँ है?
आज देशभक्ति को नारे, प्रतीक, झंडे और भावनात्मक भाषणों से मापने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। लेकिन किसी राष्ट्र का सबसे सच्चा राष्ट्रवाद उसके बच्चों के जीवन की गुणवत्ता में दिखाई देता है।
- जिस देश में बच्चा भूखा है, वहाँ उसकी शिक्षा अधूरी है।
- जिसकी शिक्षा अधूरी है, वहाँ उसकी रोजगार क्षमता कमजोर है।
- जिसकी रोजगार क्षमता कमजोर है, वहाँ अर्थव्यवस्था की उत्पादकता प्रभावित होगी।
और जब करोड़ों बच्चों की क्षमता पूरी तरह विकसित नहीं हो पाती, तो राष्ट्र की संभावित आर्थिक शक्ति भी अधूरी रह जाती है।
यही कारण है कि WFP स्कूल भोजन को स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और आर्थिक समृद्धि से जोड़कर देखता है। इस दृष्टि से स्कूल की थाली वास्तव में राष्ट्र की मानव-पूंजी की पहली प्रयोगशाला है।
सरकार को न्यूनतम से आगे जाना होगा
उत्तर प्रदेश विशाल जनसंख्या और विशाल सामाजिक असमानताओं वाला राज्य है। इसलिए यहाँ राष्ट्रीय न्यूनतम मानकों का पालन जरूरी है, लेकिन पर्याप्त नहीं। सरकार चाहे तो एक ऐसी उत्तर प्रदेश पोषण-सम्मत स्कूल भोजन नीति बना सकती है जिसमें:
प्राथमिक और उच्च प्राथमिक बच्चों के लिए स्थानीय खाद्य पदार्थों पर आधारित विविध मेन्यू हो; नियमित प्रोटीन स्रोत सुनिश्चित हो; अंडे के साथ स्वीकार्य स्थानीय विकल्प उपलब्ध हों; मौसमी फल जोड़े जाएँ; आयरन और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की आपूर्ति मजबूत हो; रसोई और पानी की स्वच्छता की स्वतंत्र जांच हो; और स्थानीय किसानों तथा महिला स्वयं सहायता समूहों को आपूर्ति तंत्र का हिस्सा बनाया जाए।
यह सब मुफ्त नहीं होगा। लेकिन सवाल यह नहीं है कि इसकी कीमत कितनी होगी। सवाल यह है कि इसे न करने की कीमत कितनी होगी?
एक कुपोषित बच्चे की खोई हुई सीखने की क्षमता, कमजोर स्वास्थ्य, कम उत्पादकता और कम आय—इनकी सामाजिक कीमत किसी बजट दस्तावेज में एक ही पंक्ति में दिखाई नहीं देती, लेकिन राष्ट्र दशकों तक उसकी कीमत चुकाता है। और इसके विपरीत, एक स्वस्थ बच्चा केवल अच्छा विद्यार्थी नहीं बनता; वह भविष्य का कुशल नागरिक, कामगार, वैज्ञानिक, शिक्षक, किसान, डॉक्टर, उद्यमी और मतदाता बन सकता है।
हरदोई का वीडियो हमें किस दिशा में देखना चाहिए?
इसलिए हरदोई की वायरल तस्वीर को केवल “एक और भ्रष्टाचार की खबर” बनाकर आगे बढ़ जाना आसान होगा। कठिन काम यह पूछना है कि—
- क्या विद्यालयों में PM POSHAN के निर्धारित 450 कैलोरी और 12 ग्राम प्रोटीन का वास्तव में पालन हो रहा है?
- क्या दाल और सब्जियों की निर्धारित मात्रा बच्चों की थाली तक पहुँच रही है?
- क्या सरकारी रिकॉर्ड वास्तविक भोजन से मेल खाते हैं?
- क्या स्कूल प्रबंधन समितियाँ केवल कागज पर हैं?
- क्या स्थानीय निरीक्षण नियमित है?
- क्या शिकायत करने वाले अभिभावक को दुश्मन समझा जाता है या सामाजिक निगरानी का हिस्सा?
और सबसे महत्वपूर्ण—”क्या हम स्कूल भोजन को शिक्षा विभाग की छोटी-सी योजना समझते हैं या उत्तर प्रदेश की मानव-पूंजी नीति का केंद्रीय स्तंभ?” यहीं से उत्तर प्रदेश के शासन की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है।
भविष्य की इमारत चंदे और नारों से नहीं, बच्चों की थाली से बनती है
- बड़े एक्सप्रेसवे जरूरी हैं।
- बड़े निवेश जरूरी हैं।
- औद्योगिक गलियारे जरूरी हैं।
- डिजिटल अर्थव्यवस्था जरूरी है।
- धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत भी महत्वपूर्ण है।
लेकिन इन सबका अंतिम लाभ कौन उठाएगा? वही बच्चा, जो आज सरकारी स्कूल की बेंच पर बैठा है। और अगर उसी बच्चे की थाली में पोषण अधूरा है, उसके मस्तिष्क को पर्याप्त पोषण नहीं मिलता, उसकी सीखने की क्षमता प्रभावित होती है और उसकी शिक्षा केवल उपस्थिति तक सीमित रह जाती है, तो विकास की सारी चमक के नीचे एक अदृश्य दरार बनी रहेगी।
राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी सोना, सड़क या इमारत नहीं—”उसका स्वस्थ, शिक्षित और सम्मानित नागरिक है।” इसलिए उत्तर प्रदेश को तय करना होगा कि वह स्कूल की रसोई को खर्च का मद मानता है या भविष्य का निवेश। क्योंकि स्कूल की थाली में दाल और सब्जी की कमी केवल रसोई की कमी नहीं होती; वह राज्य की प्राथमिकताओं की कमी का संकेत बन सकती है।
और अंततः यह बात किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि हर बच्चे के पक्ष में कही जानी चाहिए—“जिस देश में मंदिर की ऊँचाई पर गर्व हो और स्कूल की थाली की गहराई पर शर्म, वहाँ विकास के आँकड़े भले बढ़ जाएँ—राष्ट्र का भविष्य फिर भी भूखा रह जाता है।”

