झारखंड का छात्र आंदोलन : जब लोकतंत्र ने लाठी से नहीं, संवाद से रास्ता खोजा

झारखंड के 24 दिनों लंबे छात्र आंदोलन ने केवल एक भर्ती परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल नहीं उठाया है; उसने भारतीय लोकतंत्र के सामने एक उससे भी बड़ा प्रश्न रख दिया है—”क्या आज की राजनीति में सत्ता जनता के असंतोष को सुनकर अपना निर्णय बदल सकती है, या हर आंदोलन को पहले राजनीतिक साजिश, कानून-व्यवस्था की समस्या और विपक्ष की चाल मानकर दबाने की कोशिश की जाएगी?”

17 अगस्त 2026 को झारखंड सरकार ने JSSC-CGL परीक्षा रद्द करने, निजी एजेंसी TSR Data Processing Pvt. Ltd. (TDPL) द्वारा कराई गई परीक्षाओं के परिणाम और उनसे जुड़ी भर्ती प्रक्रियाओं को निरस्त करने तथा 2014 से TDPL के माध्यम से कराई गई परीक्षाओं की CID जांच कराने का फैसला किया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने यह भी कहा कि अनियमितताओं की अलग जांच सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली समिति करेगी। उन्होंने माना कि परीक्षा संचालन की SOP सरकार के पास पहले से थी, लेकिन उसका पालन नहीं हुआ। शिकायतों के लिए पोर्टल बनाने और व्यापक सुधार की बात भी कही गई।

यह फैसला एक दिन में पैदा नहीं हुआ। इसके पीछे 24 दिनों का आंदोलन, भूख हड़ताल, लगातार बातचीत, छात्रों की शिकायतें और प्रशासनिक तंत्र पर बढ़ता सार्वजनिक दबाव था। इसलिए इसे केवल किसी एक नेता की राजनीतिक सफलता बताना उतना ही अधूरा होगा जितना आंदोलन को केवल विपक्षी राजनीति का उत्पाद मानना। लोकतंत्र में निर्णय का वास्तविक श्रेय उस सामूहिक नागरिक दबाव को जाता है जिसने सत्ता को सुनने के लिए विवश किया।” लेकिन इस पूरी कथा में राहुल गांधी की भूमिका का एक अलग महत्व जरूर है।

मध्य-अगस्त में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर आग्रह किया कि वे स्वयं आंदोलनकारी छात्रों से मिलें और उनकी शिकायतों को सीधे सुनें। उन्होंने शांतिपूर्ण विरोध को लोकतांत्रिक अधिकार बताते हुए सरकार से छात्रों के साथ खड़े होने की अपील की। इसके बाद मुख्यमंत्री ने जिस तेजी से निर्णायक कदम उठाया, उसने कम-से-कम इतना सिद्ध कर दिया कि “विपक्ष का एक प्रभावी रूप वह भी हो सकता है जिसमें वह अपनी ही सहयोगी सरकार से असहमति दर्ज कराए, उसे जनता के बीच जाकर सुनने के लिए कहे और समाधान के लिए दबाव बनाए।” यहीं से झारखंड का आंदोलन भारतीय राजनीति के लिए एक बड़ा वैचारिक पाठ बन जाता है।

राहुल गांधी की भूमिका : श्रेय से अधिक, राजनीति की दिशा का प्रश्न

“जो काम प्रधानमंत्री नहीं कर सके, वह नेता प्रतिपक्ष ने कर दिखाया”—यह वाक्य राजनीतिक रूप से आकर्षक है, लेकिन पत्रकारिता की कसौटी पर इसे थोड़ा अधिक संयम के साथ देखना होगा।

ऐसा कोई एक तुलनात्मक आधिकारिक आधार उपलब्ध नहीं है जिसके आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि प्रधानमंत्री ने इसी आंदोलन को लेकर कोई वैकल्पिक कदम लेने में असफलता दिखाई और राहुल गांधी ने वही काम कर दिखाया। लेकिन एक बात निर्विवाद है—”नेता प्रतिपक्ष की भूमिका केवल सत्ता की आलोचना करना नहीं, सत्ता को जवाबदेह बनाना भी है।”

नेता प्रतिपक्ष का पद संविधान में पृथक रूप से वर्णित संवैधानिक पद नहीं है, लेकिन 1977 के कानून के तहत इसे वैधानिक मान्यता प्राप्त है। इस पद का लोकतांत्रिक महत्व इसलिए है कि यह सरकार के सामने संस्थागत प्रतिपक्ष की आवाज रखता है।

इस दृष्टि से राहुल गांधी का यह हस्तक्षेप महत्वपूर्ण है कि उन्होंने झारखंड सरकार से यह नहीं कहा कि “सरकार गिराओ”, न यह कहा कि “छात्रों को राजनीतिक आंदोलन में बदलो”; उन्होंने मुख्यमंत्री से कहा—उनसे मिलिए, सुनिए और समाधान खोजिए।

यह अंतर मामूली नहीं है। भारत में विपक्ष की राजनीति प्रायः दो चरम सीमाओं के बीच फंसी रहती है—या तो वह हर सरकारी निर्णय को गलत बताती है, या फिर आंदोलन को अपने दल का राजनीतिक मंच बना देती है। झारखंड में कम-से-कम इस क्षण एक तीसरा रास्ता दिखाई दिया—”आंदोलन को सत्ता-विरोधी युद्ध बनाने के बजाय उसे नीतिगत सुधार का अवसर बनाना।” यही सकारात्मक राजनीति का मूल है।

मगर इस जीत के असली नायक छात्र हैं

यह याद रखना होगा कि मुख्यमंत्री का फैसला किसी एक पत्र से पैदा नहीं हुआ। झारखंड के छात्रों ने 24 दिनों तक आंदोलन किया। कुछ छात्र भूख हड़ताल पर बैठे। देवेंद्रनाथ महतो समेत आंदोलनकारियों ने परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए। इसी दबाव के बीच सरकार के साथ कई दौर की बातचीत हुई।

इस आंदोलन का मूल प्रश्न कोई वैचारिक या सांप्रदायिक मुद्दा नहीं था। वह था—”नौकरी की परीक्षा निष्पक्ष है या नहीं?” यही आज के भारत के युवा की सबसे बड़ी चिंता बनती जा रही है।

जब एक छात्र वर्षों तक पढ़ता है, परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा उसकी तैयारी पर खर्च करता है, वह परीक्षा के लिए उम्र की सीमा के भीतर अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष देता है और अंततः उसे यह पता चलता है कि परीक्षा-व्यवस्था ही संदिग्ध है, तो उसके सामने केवल एक परीक्षा का संकट नहीं होता।

उसके सामने विश्वास का संकट होता है। और जब परीक्षा का परिणाम ही संदिग्ध हो जाए, तो लोकतंत्र में अवसर की समानता का वादा खोखला होने लगता है।

मामला केवल JSSC-CGL का नहीं : 6.4 लाख अभ्यर्थी, 2,021 पद और वर्षों की अनिश्चितता

झारखंड जनरल ग्रेजुएट लेवल कंबाइंड कॉम्पिटिटिव एग्जामिनेशन-2023 के लिए लगभग 6.4 लाख उम्मीदवारों ने आवेदन किया था, जबकि भर्ती करीब 2,021 पदों के लिए थी। जनवरी-फरवरी 2024 की मूल परीक्षा पेपर लीक के आरोपों के बाद रद्द की गई और सितंबर 2024 में पुनर्परीक्षा कराई गई। यानी यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं थी; यह लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़ा मामला था।

झारखंड हाई कोर्ट के रिकॉर्ड में 2024 में दाखिल PIL में पेपर लीक का आरोप दर्ज हुआ था और अदालत ने राज्य के 2023 के विशेष कानून का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया था कि शिकायत के बाद उस कानून के तहत FIR और जांच की कार्रवाई क्यों नहीं की गई। अदालत ने उस समय परिणाम घोषित करने पर रोक लगाई थी ताकि कथित अनियमितताओं की जांच पूरी होने तक तीसरे पक्ष के अधिकार और संभावित नियुक्तियों से गंभीर पूर्वाग्रह न पैदा हो। लेकिन न्यायिक रिकॉर्ड की पूरी तस्वीर यह भी बताती है कि बाद की जांच में हर दावा सिद्ध नहीं हुआ था। 2025 के झारखंड हाई कोर्ट के एक आदेश में SIT के निष्कर्षों का उल्लेख है कि कई प्रश्न पिछले वर्षों के SSC-CGL प्रश्नों से दोहराए गए थे, लेकिन उपलब्ध सामग्री से केवल अनुमान के आधार पर पेपर लीक का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

यह तथ्य महत्वपूर्ण है। क्योंकि “आरोप, जांच और सिद्ध अपराध—तीनों एक ही चीज नहीं होते।” इसीलिए वर्तमान जांच को राजनीतिक निष्कर्ष तक पहुंचाने के बजाय प्रमाण, दस्तावेज और उत्तरदायित्व तक पहुंचना होगा।

सरकार का सबसे महत्वपूर्ण स्वीकार : “SOP था, पालन नहीं हुआ”

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का यह कहना कि सरकार के पास परीक्षा संचालन की SOP मौजूद थी लेकिन उसका पालन नहीं हुआ, इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर वाक्य है। क्योंकि अगर SOP थी और फिर भी उसका पालन नहीं हुआ, तो प्रश्न केवल “पेपर किसने लीक किया?” नहीं रह जाता। प्रश्न यह हो जाता है—”SOP लागू करवाने की जिम्मेदारी किसकी थी?”

  • किस अधिकारी ने निगरानी की?
  • किस स्तर पर निजी एजेंसी को काम मिला?
  • उसकी पात्रता क्या थी?
  • उसकी तकनीकी क्षमता का परीक्षण किसने किया?
  • डेटा की सुरक्षा कैसे हुई?
  • प्रश्नपत्र के निर्माण, मुद्रण, भंडारण, परिवहन और वितरण के दौरान कौन-कौन से सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू थे?
  • OMR की coding, scanning और evaluation में कौन-सी audit trail थी?
  • किस अधिकारी ने verification sign किया?
  • किस स्तर पर शिकायतों को नजरअंदाज किया गया?
  • और अगर नियम मौजूद थे तो नियम तोड़ने वालों पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

“भ्रष्टाचार केवल वह नहीं है जहाँ पैसा पकड़ा जाए; व्यवस्था की ऐसी लापरवाही भी भ्रष्ट प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा हो सकती है जो अनियमितता को संभव बनाती है।”

झारखंड के 2023 के कानून की असली परीक्षा अब है

झारखंड ने 2023 में “Jharkhand Competitive Examination (Measures for Control and Prevention of Unfair Means in Recruitment) Act” लागू किया था। इस कानून में paper leak और unfair means से जुड़े अपराधों के लिए कठोर प्रावधान हैं; अपराधों को cognizable, non-bailable और non-compoundable बनाया गया है तथा विशेष जांच और अदालत की व्यवस्था भी है। अर्थात कानून की कमी को अकेले बहाना नहीं बनाया जा सकता।

अब सवाल है—”कानून था, SOP थी, फिर व्यवस्था विफल क्यों हुई?” यही वर्तमान सरकार के लिए सबसे बड़ी परीक्षा है। क्योंकि हर परीक्षा घोटाले के बाद नई समिति बनाना समाधान नहीं है।

  • हर बार परीक्षा रद्द कर देना भी समाधान नहीं है।
  • हर बार नई परीक्षा कराना भी समाधान नहीं है।

समाधान तब होगा जब—”परीक्षा से पहले व्यवस्था सुरक्षित होगी, परीक्षा के दौरान निगरानी विश्वसनीय होगी और परीक्षा के बाद परिणाम की auditability सुनिश्चित होगी।”

“परीक्षा माफिया” सिर्फ अपराध नहीं, समान अवसर के खिलाफ युद्ध है

परीक्षा घोटाले को अक्सर केवल भ्रष्टाचार कहा जाता है। यह उससे भी बड़ा अपराध है। यह संविधान के ‘अनुच्छेद 14’ और ‘अनुच्छेद 16’ के उस वादे को चोट पहुंचाता है जिसमें समानता और सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर का सिद्धांत निहित है। अगर किसी परीक्षा में पैसे, संपर्क, राजनीतिक पहुंच या तकनीकी धांधली से किसी उम्मीदवार को अनुचित लाभ मिलता है, तो वह सिर्फ एक ईमानदार उम्मीदवार से एक सीट नहीं छीनता।

वह राज्य के प्रति उसके विश्वास को भी तोड़ता है। और जब बार-बार ऐसा होता है तो युवाओं में एक खतरनाक धारणा जन्म लेती है—”मेहनत से नहीं, जुगाड़ से नौकरी मिलती है।”

यह धारणा किसी भी लोकतांत्रिक गणराज्य के लिए अत्यंत खतरनाक है। क्योंकि लोकतंत्र की स्थिरता केवल चुनाव से नहीं आती। वह इस विश्वास से आती है कि व्यवस्था निष्पक्ष है।

लेकिन परीक्षा रद्द करने के बाद दूसरा न्याय भी जरूरी है

यहीं हेमंत सोरेन सरकार के सामने सबसे कठिन चुनौती शुरू होती है। JSSC-CGL और TDPL से जुड़ी भर्ती प्रक्रियाओं को रद्द करने के फैसले से लगभग “2,000 ऐसे उम्मीदवारों के भविष्य पर संकट पैदा हुआ है जिन्हें परीक्षा के आधार पर सरकारी नौकरी मिल चुकी थी।” उन्होंने भी विरोध शुरू कर दिया है और कहा है कि कथित अनियमितताओं की कीमत उन उम्मीदवारों से न वसूली जाए जो स्वयं किसी गड़बड़ी में शामिल नहीं थे।

यह आवाज भी उतनी ही वैध है। एक गलत व्यवस्था से न्याय मांगने वाले छात्रों को न्याय मिलना चाहिए। लेकिन यदि किसी परीक्षा को कानूनी तौर पर पूरी तरह दूषित पाया जाए, तो नियुक्तियों का भविष्य भी उसी निष्कर्ष पर निर्भर करेगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने 2025 में एक भर्ती मामले में कहा कि जहाँ पूरी चयन प्रक्रिया गंभीर और व्यापक अवैधानिकताओं से दूषित हो और संपूर्ण प्रक्रिया को निरस्त करना आवश्यक हो, वहाँ ऐसे उम्मीदवार जो स्वयं व्यक्तिगत रूप से दोषी सिद्ध न हों, उनकी नियुक्तियाँ भी समाप्त की जा सकती हैं; साथ ही अदालत ने प्राकृतिक न्याय और प्रत्येक मामले के तथ्यों को महत्व दिया।

इसलिए झारखंड सरकार को दो परस्पर विरोधी अधिकारों के बीच संतुलन करना होगा—”ईमानदार अभ्यर्थियों का न्याय और निर्दोष चयनित उम्मीदवारों के अधिकार।” सरकार के लिए सबसे गलत रास्ता होगा कि वह एक वर्ग को न्याय देने के लिए दूसरे वर्ग को स्वतः दोषी मान ले।

  • जांच हो।
  • दोष तय हो।
  • प्रक्रियात्मक न्याय मिले।

और जहाँ संभव हो, निर्दोष उम्मीदवारों के हितों की रक्षा के लिए वैकल्पिक कानूनी व्यवस्था बनाई जाए।

CBI बनाम CID : असली प्रश्न एजेंसी का नहीं, विश्वसनीयता का है

छात्रों की एक प्रमुख मांग CBI जांच रही है। सरकार ने CID/SIT की जांच का रास्ता चुना है और 2014 से TDPL से जुड़ी परीक्षाओं की जांच का आदेश दिया है। छात्रों ने इस पर आंदोलन जारी रखने की बात कही है।

यहाँ राजनीतिक दलों के लिए भी सावधानी जरूरी है। किसी जांच की विश्वसनीयता केवल इसलिए तय नहीं होती कि वह CBI कर रही है या राज्य पुलिस। CBI भी कोई जादुई संस्था नहीं है और CID भी हर मामले में अविश्वसनीय नहीं।

असली प्रश्न है— “क्या जांच स्वतंत्र होगी?”

  • क्या जांचकर्ता प्रशासनिक दबाव से मुक्त होंगे?
  • क्या digital evidence सुरक्षित रहेगा?
  • क्या call records, financial trails, vendor contracts और tender documents की जांच होगी?
  • क्या आरोपियों और अधिकारियों की भूमिका अलग-अलग तय की जाएगी?
  • क्या रिपोर्ट सार्वजनिक होगी?
  • क्या दोषियों के खिलाफ मुकदमा चलेगा?

अगर इन प्रश्नों का उत्तर हाँ है, तो CID भी प्रभावी हो सकती है; लेकिन यदि जनता को लगे कि सरकार अपनी ही व्यवस्था की जांच स्वयं कर रही है, तो अविश्वास बना रहेगा। यही कारण है कि सरकार को स्वतंत्र पर्यवेक्षण, समयबद्ध जांच और सार्वजनिक प्रगति रिपोर्ट पर विचार करना चाहिए।

शांतिपूर्ण आंदोलन : लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी जीवन-रेखा

राहुल गांधी ने अपने पत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन को लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण और निरस्त्र सभा करने का अधिकार देता है। हालांकि ये अधिकार पूर्ण नहीं हैं और अनुच्छेद 19(2) तथा 19(3) के तहत उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट किया है कि शांतिपूर्ण सभा और अभिव्यक्ति लोकतांत्रिक अधिकार हैं, लेकिन उनकी सीमाएँ सार्वजनिक व्यवस्था और कानून के अनुरूप निर्धारित की जा सकती हैं। इसलिए सरकार का कर्तव्य है कि आंदोलन और हिंसा में अंतर करे।

  • हर प्रदर्शनकारी अपराधी नहीं।
  • हर नारा देशद्रोह नहीं।
  • हर असहमति सरकार गिराने की साजिश नहीं।

और दूसरी ओर—हर आंदोलनकारी होने मात्र से किसी व्यक्ति को कानून से ऊपर होने का अधिकार भी नहीं मिल जाता। लोकतंत्र की खूबसूरती इसी संतुलन में है।

“राज्य की ताकत लाठी में नहीं, इस क्षमता में दिखाई देती है कि वह असहमति को सुने और कानून की मर्यादा के भीतर समाधान निकाले।”

झारखंड में एक असाधारण राजनीतिक संभावना : सहयोगी सरकार से सवाल

राहुल गांधी की भूमिका की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक विशेषता शायद यही है कि झारखंड में कांग्रेस, JMM के साथ सत्ता-साझेदार है। ऐसे में विपक्ष के राष्ट्रीय नेता का अपने गठबंधन सहयोगी मुख्यमंत्री को यह कहना कि छात्रों से स्वयं मिलिए, उनकी समस्या सुनिए और समाधान कीजिए, भारतीय गठबंधन राजनीति के भीतर जवाबदेही का एक नया मॉडल प्रस्तुत करता है।

गठबंधन का अर्थ सरकार की हर गलती पर मौन रहना नहीं हो सकता। साझेदारी का अर्थ आलोचना का अधिकार समाप्त होना नहीं हो सकता। और सत्ता में शामिल दल यदि अपने सहयोगी दल की सरकार से भी जनता की शिकायत पर सवाल पूछते हैं, तो लोकतंत्र मजबूत होता है। यही “positive politics” का अर्थ है।

“सकारात्मक राजनीति वह नहीं जो हर बात में सरकार की प्रशंसा करे; सकारात्मक राजनीति वह है जो जनता के पक्ष में सत्ता से असहमति दर्ज कराए।”

भाजपा के लिए भी यह अवसर है—लेकिन दोहरे मापदंडों के बिना

इस आंदोलन में भाजपा और उसके सहयोगी राजनीतिक संगठनों ने झारखंड सरकार को घेरा। यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है; लेकिन यहीं राजनीति की सबसे कठिन परीक्षा शुरू होती है। यदि किसी दल को छात्र आंदोलन वास्तव में छात्र हित का प्रश्न लगता है, तो उसे यह सिद्ध करना होगा कि उसका समर्थन सत्ता के आधार पर नहीं बदलता।

  • “जो अधिकार दिल्ली के छात्रों के लिए सही है, वही रांची के छात्रों के लिए भी सही होना चाहिए।”
  • जो लाठी दिल्ली में गलत है, वह रांची में भी गलत है।
  • जो पेपर लीक बिहार, उत्तर प्रदेश या दिल्ली में अपराध है, वही झारखंड में भी अपराध है।
  • जो छात्र देश की राजधानी में प्रदर्शन करे और उसके अधिकारों की बात की जाए, उसी छात्र की आवाज राज्य की राजधानी में उठे तो उसके पीछे राजनीतिक दल की जाति या सरकार की पार्टी क्यों देखी जाए?

यही भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी बीमारी है—”हम सिद्धांतों को सरकार देखकर बदल लेते हैं।” सत्ता हमारी हो तो आंदोलन “अराजकता” हो जाता है। विरोधी की सत्ता हो तो वही आंदोलन “जनता की आवाज” बन जाता है। लोकतंत्र इस दोहरे चरित्र से कमजोर होता है।

राहुल गांधी का असली इम्तिहान अब शुरू हुआ है

इस पूरे प्रकरण में राहुल गांधी को राजनीतिक लाभ जरूर मिल सकता है। लेकिन असली परीक्षा वहीं से शुरू होती है।

  • क्या वह केवल कांग्रेस-शासित या गठबंधन-शासित राज्यों में छात्रों की आवाज उठाएंगे? या उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा और अन्य राज्यों में भी परीक्षा संबंधी अन्याय के मामलों पर समान रूप से खड़े होंगे?
  • क्या वे परीक्षा सुधार को केवल चुनावी मुद्दा बनाएंगे? या देशव्यापी National Examination Integrity Framework की मांग करेंगे?
  • क्या विपक्ष संसद में एक व्यापक परीक्षा-सुधार नीति रखेगा?
  • क्या वह outsourcing of examination services के लिए समान राष्ट्रीय मानक, third-party security audit, encrypted question-paper custody, blockchain-like audit trails, biometric chain-of-custody, OMR tamper detection, vendor blacklisting और समयबद्ध grievance redressal की मांग करेगा?

यही तय करेगा कि राहुल गांधी का हस्तक्षेप वास्तव में “सकारात्मक राजनीति” था या केवल एक सफल राजनीतिक क्षण।

हेमंत सोरेन की असली परीक्षा भी अब है

आज मुख्यमंत्री ने सही दिशा में कदम उठाया है। लेकिन निर्णय लेना और व्यवस्था बदलना दो अलग बातें हैं। 24 दिनों के आंदोलन के बाद परीक्षा रद्द करना जनता के दबाव का उत्तर है। अब सरकार को साबित करना होगा कि यह तात्कालिक राजनीतिक संकट प्रबंधन नहीं बल्कि संस्थागत सुधार की शुरुआत है।

  • यदि 2014 से TDPL से जुड़ी परीक्षाओं में अनियमितता की जांच का आदेश दिया गया है, तो उसका दायरा, समय सीमा और परिणाम सार्वजनिक होने चाहिए।
  • यदि SOP नहीं मानी गई, तो जिम्मेदार अधिकारी चिन्हित होने चाहिए।
  • यदि निजी एजेंसी की क्षमता या प्रक्रिया में दोष था, तो procurement और empanelment की समीक्षा होनी चाहिए।
  • यदि किसी ने धन लेकर परीक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया है, तो आर्थिक जांच भी होनी चाहिए।
  • और यदि किसी उम्मीदवार ने पैसा देकर लाभ लिया है, तो उसे केवल नौकरी खोने तक सीमित न रखा जाए—कानून के अनुसार आपराधिक दायित्व भी तय हो।

“परीक्षा माफिया के खिलाफ लड़ाई में केवल परीक्षा रद्द करने से न्याय नहीं होता; अपराध की जड़ तक पहुंचना जरूरी है।”

परीक्षा व्यवस्था को “लीक-प्रूफ” बनाने का समय

  • भारत में आज एक अजीब स्थिति है।
  • हम डिजिटल इंडिया की बात करते हैं।
  • Artificial Intelligence की बात करते हैं।
  • Digital governance की बात करते हैं।

लेकिन लाखों युवाओं की जिंदगी तय करने वाली परीक्षा की सुरक्षा कई बार इतनी कमजोर होती है कि कुछ लोगों की मिलीभगत पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा देती है। अब समय आ गया है कि परीक्षा को केवल शिक्षा विभाग की administrative activity न माना जाए। यह national public trust infrastructure है।

  • हर राज्य को एक स्वतंत्र Examination Security Protocol चाहिए।
  • प्रश्नपत्र की chain of custody digital और auditable होनी चाहिए।
  • vendor selection सार्वजनिक और तकनीकी योग्यता आधारित होना चाहिए।
  • हर tender में security breach की स्थिति में कठोर financial और criminal liability होनी चाहिए।
  • OMR processing में end-to-end audit trail होना चाहिए।
  • सभी complaints की timestamped digital registry होनी चाहिए।
  • और परीक्षा रद्द होने की स्थिति में अभ्यर्थियों की उम्र, attempts और आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए स्पष्ट policy होनी चाहिए। वरना परीक्षा रद्द होती रहेगी और पीढ़ियाँ बूढ़ी होती रहेंगी।

यह केवल झारखंड के छात्रों की लड़ाई नहीं

झारखंड की सड़कों पर बैठे छात्र वास्तव में पूरे भारत के युवाओं की भाषा बोल रहे हैं। उनकी मांग नौकरी की है। लेकिन उससे पहले उनकी मांग निष्पक्ष अवसर की है।

  • वे सरकार से उपकार नहीं मांग रहे।
  • वे यह मांग रहे हैं कि—”जिस परीक्षा में हमें शामिल किया गया, वह ईमानदार हो।”

यह मांग संविधान के मूल वादे से जुड़ी है।

भारत का गणराज्य तभी अर्थपूर्ण है जब एक छोटे कस्बे का छात्र और एक बड़े शहर का छात्र समान परीक्षा हॉल में समान नियमों के तहत प्रतिस्पर्धा कर सकें। जहाँ प्रतिभा का निर्णय धन, जाति, राजनीतिक संपर्क, प्रश्नपत्र की चोरी या दलालों से नहीं, योग्यता से हो। यही समान अवसर का वास्तविक अर्थ है।

अंततः किसने जीता?

  • न कांग्रेस जीती।
  • न JMM।
  • न भाजपा।
  • न कोई राजनीतिक दल।

“जीता तो छात्र का लोकतांत्रिक अधिकार।” क्योंकि 24 दिनों तक सड़क पर बैठा एक छात्र अंततः सत्ता को बातचीत के लिए मजबूर कर सका। मुख्यमंत्री ने अपने निर्णय में छात्रों की मांग स्वीकार की। नेता प्रतिपक्ष ने अपनी ही गठबंधन-साझेदार सरकार को जनता से संवाद करने की सलाह दी। और सरकार ने विरोध को केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न मानने के बजाय नीति-सुधार का मुद्दा स्वीकार किया।

यह भारतीय लोकतंत्र के लिए खराब खबर नहीं है। बल्कि यह उस लोकतंत्र के लिए आशा की खबर है जो पिछले कुछ वर्षों से असहमति और सत्ता के संबंध को लेकर लगातार कठोर प्रश्नों से जूझ रहा है।

हाँ, कहानी अभी पूरी नहीं हुई। CBI जांच की मांग अभी बनी हुई है। सफल उम्मीदवारों का भविष्य अनिश्चित है। जांच की निष्पक्षता पर निगाह रहेगी। नई परीक्षा-व्यवस्था वास्तव में कितनी पारदर्शी बनेगी, यह भी देखना होगा। इसलिए आज का फैसला “जीत की अंतिम घोषणा नहीं, जवाबदेही की पहली किस्त” है।

  • झारखंड सरकार ने सही कदम उठाया है।
  • राहुल गांधी ने एक उपयोगी राजनीतिक हस्तक्षेप किया है।
  • छात्रों ने लोकतांत्रिक दबाव की ताकत दिखाई है।

अब तीनों की अगली परीक्षा है—”क्या यह आंदोलन एक रद्द परीक्षा पर समाप्त होगा, या भारत की परीक्षा व्यवस्था को ऐसा बना देगा कि आने वाली पीढ़ी को प्रश्नपत्र से पहले व्यवस्था की ईमानदारी पर भरोसा हो?” यही झारखंड आंदोलन का राष्ट्रीय अर्थ है।

“जब सत्ता लाठी छोड़कर छात्र से संवाद करती है, विपक्ष राजनीति छोड़कर जनता की आवाज बनता है और छात्र सड़क छोड़कर व्यवस्था-सुधार की मांग करता है—तभी लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं रहता, वह जनविश्वास बन जाता है।”

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