…..प्रदीप कुमार नायक
नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर ल्हेंडे खोला यानी नदी में ग्लेशियर झील फट गई। कुछ ही मिनटों में चट्टान, बर्फ, मिट्टी और पानी का सैलाब भोटेकोशी और फिर त्रिशूली नदी में आ गया।
रसुवा जिले का टिमुरे बाजार, स्याफ्रुबेसी हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट, कई सस्पेंशन ब्रिज – सब बह गए।
भारत और चीन की मदद लेने से साफ इनकार कर रहा है नेपाल, सोशल मीडिया पर इस हेडलाइन के साथ जो वीडियो वायरल हो रहा है उसके पीछे की कहानी हेडलाइन से कहीं ज्यादा बड़ी और पेचीदा है। यह सिर्फ एक बाढ़ की खबर नहीं है, बल्कि हिमालय की बदलती जलवायु, छोटे देश की संप्रभुता की चिंता और दो बड़े पड़ोसियों के बीच फंसे नेपाल की कूटनीति का पूरा अध्याय है।
बीते मंगलवार की सुबह तिब्बत और नेपाल की सीमा पर जो हुआ उसने सबको हिला दिया। ल्हेंडे खोला के ऊपर ग्लेशियर झील अचानक फट गई और कुछ ही मिनटों में बर्फ, पत्थर, मिट्टी और पानी का एक पहाड़ भोटेकोशी नदी में बदल गया। यह सैलाब नीचे आते आते त्रिशूली नदी में मिला और रसुवा, नुवाकोट, धादिंग जिलों को चीरता हुआ निकल गया। रसुवा का टिमुरे बाजार जो नेपाल-चीन व्यापार का सबसे बड़ा नाका है, पूरी तरह बह गया। स्याफ्रुबेसी हाइड्रोपावर, कई सस्पेंशन ब्रिज और दो दर्जन से ज्यादा पक्के पुल टूट गए। नेपाल पुलिस के अनुसार अब तक पाँच सौ अड़तीस से ज्यादा शव निकाले जा चुके हैं और दो हजार से ज्यादा लोग लापता हैं। लापता लोगों में तीन सौ बीस भारतीय हैं जो तीर्थयात्रा और व्यापार के लिए उस इलाके में गए थे। इसके अलावा चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, मलेशिया और यूक्रेन के नागरिक भी शामिल हैं।
बाढ़ के बारह घंटे के भीतर ही दुनिया भर से मदद के प्रस्ताव काठमांडू पहुंचने लगे। भारत ने सबसे पहले विदेश मंत्रालय के जरिए एनडीआरएफ की तीन टीमें, खोजी कुत्ते, एयरफोर्स के हेलीकॉप्टर और सी-एक सौ तीस विमान में बेली ब्रिज भेजने की पेशकश की। चीन ने युन्नान प्रांत से ड्रोन और रेस्क्यू टीम भेजने को कहा। अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका और बांग्लादेश ने भी अपनी टीमें भेजने की औपचारिक अनुमति मांगी। लेकिन नेपाल के विदेश मंत्रालय ने सभी को एक ही जवाब दिया, हमें अभी विदेशी रेस्क्यू टीम की जरूरत नहीं है। हमारी नेपाली सेना और सशस्त्र पुलिस बल खुद सर्च ऑपरेशन संभाल लेगी।
इस इनकार के पीछे गुस्सा या अहंकार नहीं, बल्कि दो हजार पंद्रह का कड़वा अनुभव है। दो हजार पंद्रह के भूकंप में चौंतीस देशों की चार हजार से ज्यादा रेस्क्यू कर्मी बिना किसी समन्वय के काठमांडू एयरपोर्ट पर उतर गए थे। रनवे जाम हो गया, राहत सामग्री महीनों तक एयरपोर्ट पर पड़ी रही, अलग अलग देशों की टीमों के बीच कमांड को लेकर टकराव हुआ। उसी के बाद नेपाल ने अपनी आपदा प्रबंधन नीति में साफ लिख दिया कि विदेशी टीम तभी आएगी जब नेपाल सरकार खुद विशेष रूप से मांगेगी। दूसरी बड़ी वजह भू-राजनीति है। नेपाल भारत और चीन के बीच बसा है। अगर वह भारत की टीम को हाँ और चीन को ना कहता तो बीजिंग में दूसरा संदेश जाता और अगर चीन को हाँ कहता तो नई दिल्ली में। इसलिए बालेन शाह सरकार ने दोनों को ही मना करके एक संतुलन साधने की कोशिश की। बालेन शाह खुद काठमांडू के मेयर से प्रधानमंत्री बने हैं और उनकी पूरी राजनीति आत्मनिर्भर नेपाल के नारे पर टिकी है, ऐसे में विदेशी बूटों को अपनी जमीन पर उतरते दिखाना उनकी छवि के खिलाफ होता।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। नेपाल ने मदद को पूरी तरह ठुकराया नहीं है। विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने रॉयटर्स और निक्केई एशिया को दिए इंटरव्यू में कहा कि हमें आम खोज और बचाव के लिए नहीं, बल्कि विशेष तकनीकी मदद की जरूरत है। हमारे पास टनल में फंसे लोगों को निकालने की तकनीक नहीं है, हमारे पास टूटे पुलों की जगह तुरंत बेली ब्रिज लगाने की क्षमता नहीं है, हमारे पास इतनी बड़ी संख्या में शवों की डीएनए से पहचान करने और उन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखने की लैब नहीं है। इन चीजों के लिए हमने भारत और चीन दोनों से मदद मांगी है। भारत से बेली ब्रिज और फॉरेंसिक टीम और चीन से कम्युनिकेशन इक्विपमेंट मांगा गया है।
और कल सुबह की सबसे नई खबर यह है कि नेपाल ने अपना शुरुआती फैसला पलट दिया है। एक अंतर-मंत्रालय समन्वय समिति की बैठक के बाद भारत, चीन, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया की विशेष टीमों को आने की अनुमति दे दी गई है। यह टीमें आम सर्च नहीं करेंगी बल्कि सिर्फ टनल रेस्क्यू, डीएनए टेस्ट और ब्रिज निर्माण में नेपाल की सेना की मदद करेंगी।
इसलिए रील में जो ब्रेकिंग न्यूज लिखा है वह आधा सच है। नेपाल ने भारत का अपमान नहीं किया है, उसने अपने तरीके से आपदा प्रबंधन करने का अधिकार जताया है। भारत ने भी दो हजार चार में सुनामी के बाद विदेशी मदद लेने से इनकार किया था। आज तीन सौ बीस भारतीय लापता हैं, इसलिए भारत की चिंता जायज है और अंततः भारतीय टीम तकनीकी मदद के नाम पर ही सही, नेपाल पहुंच ही रही है।

