…..सी एम जैन
किसी लोकतंत्र की असली हालत जाननी हो तो संसद, सचिवालय या संविधान की किताब देखने की आवश्यकता नहीं है। किसी सरकारी कार्यालय के बाहर खड़े नागरिकों को देख लीजिए। वहाँ अक्सर एक विचित्र दृश्य दिखाई देता है—जिस व्यवस्था का मालिक नागरिक होना चाहिए, वही नागरिक किसी अधिकारी की एक झलक, एक हस्ताक्षर या एक स्वीकृति के लिए घंटों प्रतीक्षा कर रहा होता है। वह अपनी समस्या बताता है, निवेदन करता है, कभी सिफारिश खोजता है, कभी परिचय। और धीरे-धीरे यह सब इतना सामान्य लगने लगता है कि हम सबसे बड़ा प्रश्न पूछना ही छोड़ देते हैं—लोकतंत्र में आखिर मालिक कौन है?
हमारी सबसे बड़ी समस्या शायद केवल भ्रष्टाचार नहीं है। उससे भी बड़ी समस्या वह मानसिक परिवर्तन है जो वर्षों में चुपचाप हमारे भीतर बैठ गया। हमने उन लोगों को, जो जनता के संसाधनों से चलने वाली व्यवस्था के कर्मचारी हैं, “सर”, “साहब”, “हुजूर” और व्यवहार में कई बार “मालिक” का दर्जा देना शुरू कर दिया। भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं होती; वह सत्ता-संबंधों को भी आकार देती है। संबोधन बदलते हैं, तो सोच बदलती है। सोच बदलती है, तो समाज बदलता है। और जब समाज यह भूलने लगे कि सत्ता का स्रोत कहाँ है, तब लोकतंत्र की सबसे गहरी दरार दिखाई देने लगती है।
यहाँ स्पष्ट कर देना चाहिए कि सम्मान और अधीनता एक ही चीज नहीं हैं। किसी अधिकारी, कर्मचारी या सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति का सम्मान करना सभ्यता है। लेकिन अपने अधिकारों को भूल जाना, अपने प्रश्नों को दबा देना और स्वयं को उससे नीचे समझना लोकतांत्रिक चेतना का क्षरण है। सरकारी कर्मचारी छोटा हो या बड़ा, ईमानदार हो या भ्रष्ट, उसका वेतन जनता के धन से आता है। उसका पद सार्वजनिक है, निजी नहीं। उसका अधिकार नागरिकों पर शासन करने के लिए नहीं, नागरिकों की सेवा के लिए है। लोकतंत्र की मूल अवधारणा यही है, लेकिन व्यवहार में हम कई बार इसके ठीक उलट खड़े दिखाई देते हैं।
यहीं एक और गहरा विरोधाभास सामने आता है। जब कोई सरकारी अधिकारी बिना रिश्वत लिए, समय पर और नियमों के अनुसार अपना काम कर देता है, तो हम उसे “ईमानदार अधिकारी” कहकर सम्मानित करते हैं। फूल पहनाते हैं, मंचों पर बुलाते हैं, प्रशंसा करते हैं। सम्मान में कोई बुराई नहीं है, लेकिन प्रश्न यह है कि जिस काम के लिए किसी व्यक्ति को वेतन दिया जा रहा है, वह असाधारण उपलब्धि कब बन गया? “नौ दिन चले अढ़ाई कोस” जैसी कहावतें हम सुस्त व्यवस्था पर तो लागू करते हैं, लेकिन शायद ही कभी यह पूछते हैं कि ईमानदारी को पुरस्कार की श्रेणी में क्यों पहुँचा दिया गया।
यह प्रश्न किसी ईमानदार अधिकारी के खिलाफ नहीं है। बल्कि यह उस सामाजिक स्थिति पर प्रश्न है जहाँ भ्रष्टाचार इतना सामान्य हो गया है कि ईमानदारी असामान्य लगने लगी है। यदि कोई शिक्षक पढ़ाता है, डॉक्टर इलाज करता है या न्यायाधीश कानून के अनुसार निर्णय देता है, तो हम उसे उसके कर्तव्य का निर्वहन मानते हैं। फिर सरकारी कर्मचारी द्वारा अपना दायित्व निभाना किसी चमत्कार की तरह क्यों प्रस्तुत होने लगता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने व्यवस्था से अपेक्षाएँ इतनी कम कर दी हैं कि जो सामान्य होना चाहिए, वही असाधारण दिखाई देने लगा है?
विडंबना यहीं समाप्त नहीं होती। अनेक सामाजिक कार्यक्रमों में किसी सरकारी अधिकारी को “विशेष अतिथि” बनाकर बुलाया जाता है। उसके मंच पर आने को प्रतिष्ठा माना जाता है। उसके आगमन पर गर्व व्यक्त किया जाता है। प्रश्न यह नहीं कि किसी अधिकारी को आमंत्रित करना गलत है। प्रश्न यह है कि उस गर्व का आधार क्या है? क्या हमें इस बात पर गर्व होना चाहिए कि एक सार्वजनिक कर्मचारी हमारे कार्यक्रम में आया, या इस बात पर कि लोकतंत्र ने ऐसी व्यवस्था बनाई है जिसमें कोई भी सार्वजनिक अधिकारी जनता के प्रति जवाबदेह है? यदि लोकतंत्र की चेतना मजबूत होती, तो सम्मान व्यक्ति के कार्य का होता, पद की शक्ति का नहीं।
यहीं लोकतंत्र का सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। संविधान जनता को सर्वोच्च मानता है, लेकिन व्यवहार में कई बार कुर्सी सर्वोच्च दिखाई देती है। नागरिक को अपनी समस्या सिद्ध करनी पड़ती है, अपने अधिकार का औचित्य बताना पड़ता है, और कई बार उस सेवा के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है जिसके लिए पूरी व्यवस्था बनाई गई थी। यदि मालिक को बार-बार अपनी ही हैसियत साबित करनी पड़े, तो प्रश्न केवल प्रशासन का नहीं, लोकतांत्रिक संस्कृति का हो जाता है।
इस पूरी स्थिति का सबसे खतरनाक प्रभाव अगली पीढ़ी पर पड़ता है। बच्चे लोकतंत्र को किताबों से कम और समाज को देखकर अधिक सीखते हैं। वे देखते हैं कि सरकारी कार्यालय में नागरिक घंटों खड़ा है और अधिकारी की एक नज़र के लिए प्रतीक्षा कर रहा है। वे देखते हैं कि किसी काम के लिए सिफारिश ढूँढ़ी जा रही है। वे देखते हैं कि पद के सामने व्यक्ति झुकता है, लेकिन सिद्धांत के सामने कम खड़ा होता है। धीरे-धीरे उनके मन में एक खतरनाक निष्कर्ष बनता है—सरकारी कुर्सी जनता से बड़ी है।
यदि यही मानसिकता आगे बढ़ती रही, तो लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट भ्रष्टाचार नहीं होगा, बल्कि नागरिक चेतना का क्षरण होगा। क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति उसके कानूनों में नहीं, बल्कि उन नागरिकों में होती है जो अपने अधिकार और अपनी भूमिका समझते हैं। जिस दिन नागरिक स्वयं को प्रजा समझने लगे, उसी दिन लोकतंत्र का ढाँचा भले खड़ा रहे, उसकी आत्मा कमजोर पड़ने लगती है।
इसलिए परिवर्तन की शुरुआत सरकारी दफ्तरों से पहले हमारे भीतर होनी चाहिए। हमें यह याद रखना होगा कि सम्मान और प्रश्न एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। हम किसी अधिकारी का सम्मान कर सकते हैं और उससे जवाबदेही भी मांग सकते हैं। हम किसी अच्छे कर्मचारी की सराहना कर सकते हैं और फिर भी यह मान सकते हैं कि ईमानदारी कोई अतिरिक्त उपकार नहीं, बल्कि उसका मूल कर्तव्य है। हमें “साहब” कहने से पहले यह याद रखना होगा कि सामने बैठा व्यक्ति सार्वजनिक पद पर है, लोकतंत्र का स्वामी नहीं।
कहावत है, “जैसी करनी वैसी भरनी।” लोकतंत्र में इसका अर्थ केवल शासन पर लागू नहीं होता, समाज पर भी लागू होता है। यदि हम अपने बच्चों को यह दिखाएंगे कि नागरिक का स्थान हमेशा कुर्सी से नीचे है, तो वे भी यही सीखेंगे। लेकिन यदि हम उन्हें यह सिखाएंगे कि सार्वजनिक पद सम्माननीय है, पर जनता से बड़ा नहीं, तो शायद वे लोकतंत्र को केवल मतदान की व्यवस्था नहीं, नागरिक गरिमा की व्यवस्था समझेंगे।
आखिरकार, यह बहस अधिकारियों की नहीं, नागरिकों की है। प्रश्न यह नहीं कि कुर्सी पर कौन बैठा है। प्रश्न यह है कि उसके सामने खड़ा व्यक्ति स्वयं को क्या समझता है। क्योंकि जिस दिन समाज इस प्रश्न का गलत उत्तर देने लगे, उसी दिन लोकतंत्र कागज़ पर तो जीवित रह सकता है, लेकिन नागरिकों के मन में नहीं। और यदि हमने आज यह स्पष्ट नहीं किया कि मालिक कौन है, तो कल हमारी अगली पीढ़ी भी उसी प्रश्न का गलत उत्तर देगी—और शायद उसे यह एहसास भी नहीं होगा कि गलती कहाँ हुई।

