जंतर-मंतर : लोकतंत्र की राजधानी में लाठी, सवाल और संविधान की कसौटी

जंतर-मंतर केवल दिल्ली का एक भूगोल नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र की उस परंपरा का प्रतीक है जिसमें सत्ता से असहमति रखने वाला नागरिक संसद के दरवाजे तक अपनी आवाज पहुंचाने का अधिकार रखता है। किसान, छात्र, कर्मचारी, महिलाएं, श्रमिक, सामाजिक संगठन—हर वर्ग ने यहां अपनी बात देश के सामने रखी है। इसलिए 20 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़े छात्रों और प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई का प्रश्न केवल दिल्ली पुलिस बनाम प्रदर्शनकारी का प्रश्न नहीं है। यह उससे कहीं बड़ा प्रश्न है—”भारत के लोकतंत्र में असहमति की सीमा कौन तय करेगा, राज्य की शक्ति की सीमा कौन तय करेगा और उस सीमा के पार जाने पर जवाबदेही किसकी होगी?”

18 अगस्त 2026 को सर्वोच्च न्यायालय की प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इस पूरे प्रकरण में स्वतंत्र जांच की आवश्यकता को गंभीरता से लेते हुए उच्चस्तरीय समिति गठित करने की दिशा में कदम बढ़ाया। समिति में सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश, पूर्व उच्च न्यायालय मुख्य न्यायाधीश और वरिष्ठ सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी को शामिल किए जाने पर सहमति बनी। न्यायालय ने पुलिस कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों तथा पुलिसकर्मियों से जुड़े आरोप-प्रत्यारोप, महिलाओं के साथ कथित यौन उत्पीड़न, साइबर बुलिंग और सोशल मीडिया के माध्यम से कमजोर वर्गों को निशाना बनाने जैसे पहलुओं की पड़ताल को भी व्यापक जांच के दायरे में रखा है।

यहां एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्यात्मक सावधानी आवश्यक है। “सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है कि 20 जुलाई को पुलिस ने निश्चित रूप से “अत्याचार” किया था।” न्यायालय ने आरोपों को गंभीरता से लेते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता मानी है। इससे पहले 28 जुलाई को न्यायालय ने भी कहा था कि प्रथम दृष्टया आरोप स्वतंत्र जांच का मामला बनाते हैं और उसने CCTV, ड्रोन फुटेज, बॉडी-कैमरा रिकॉर्डिंग तथा वायरलेस संचार जैसे साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया था।

यही लोकतंत्र और न्याय की खूबसूरती है—”आरोप को न तो सत्ता का सत्य माना जाए, न विपक्ष का प्रचार; प्रमाण आने तक उसे आरोप ही माना जाए।” लेकिन इतना भी उतना ही सत्य है कि अब यह मामला केवल राजनीतिक बयानबाजी का नहीं रहा। न्यायपालिका ने इसे संस्थागत जांच के योग्य माना है।

सवाल यह नहीं कि लाठी चली या नहीं; सवाल यह है कि राज्य ने कितनी शक्ति, किस परिस्थिति में और किस उद्देश्य से इस्तेमाल की

केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने 18 अगस्त को दिल्ली पुलिस का बचाव करते हुए कहा कि प्रदर्शन के दौरान किसी की मृत्यु नहीं हुई, किसी की हड्डी नहीं टूटी और कोई गंभीर चोट नहीं लगी। उन्होंने पुलिस के संयम की प्रशंसा की और आरोप लगाया कि बड़े आंदोलन में कुछ “अपराधी” तत्व भी शामिल हो गए थे।

दूसरी ओर दिल्ली पुलिस ने सर्वोच्च न्यायालय में कहा कि करीब 30,000 लोग जंतर-मंतर के आसपास मौजूद थे और प्रदर्शन का एक हिस्सा बैरिकेड तोड़कर संसद की ओर बढ़ा; पुलिस का दावा है कि इसके बाद स्थिति शांतिपूर्ण नहीं रही और उसने “maximum restraint” तथा “minimum required force” का इस्तेमाल किया। पुलिस ने यह भी कहा कि करीब 240 पुलिसकर्मी घायल हुए। यानी तस्वीर के दो पक्ष हैं।

  • एक पक्ष कहता है—पुलिस ने कानून-व्यवस्था बचाने के लिए आवश्यक बल प्रयोग किया।
  • दूसरा पक्ष कहता है—निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर disproportionate force इस्तेमाल हुआ।

और इसी बीच एक तीसरा तथ्य भी मौजूद है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दो सरकारी अस्पतालों के RTI जवाबों के अनुसार “कम से कम 10 प्रदर्शनकारियों का उपचार pellet, shot अथवा projectile injuries के लिए हुआ—Lady Hardinge में नौ और Safdarjung में एक।”

इसके अलावा एक आधिकारिक पुलिस रिकॉर्ड पर आधारित रिपोर्ट के अनुसार Rapid Action Force ने 20 जुलाई को एक स्थान पर non-lethal munitions, जिसमें plastic pellets की दो rounds भी शामिल थीं, दागीं। तो अब सवाल “गोली चली या नहीं?” का नहीं रह गया। सवाल है—

  • किसने आदेश दिया?
  • किस परिस्थिति में दिया?
  • किस प्रकार का ammunition इस्तेमाल हुआ?
  • क्या उसका इस्तेमाल स्वीकृत protocol के अनुसार था?
  • क्या उसके इस्तेमाल से पहले और बाद की medical assessment हुई?
  • क्या कम घातक विकल्प पर्याप्त थे?

और सबसे महत्वपूर्ण—”क्या जिस भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बल प्रयोग किया गया, उसमें प्रत्येक व्यक्ति को समान खतरा मानना वैधानिक और नैतिक रूप से उचित था?”

इन प्रश्नों का उत्तर वीडियो, medical records, wireless logs, body-camera footage, command chain और forensic evidence से मिलेगा—राजनीतिक भाषणों से नहीं।

“कोई मरा नहीं” लोकतांत्रिक कसौटी नहीं हो सकती

किरण रिजिजू का यह तर्क कि “किसी की मौत नहीं हुई”, इसलिए पुलिस की कार्रवाई की प्रशंसा होनी चाहिए, लोकतांत्रिक दृष्टि से गहरे विचार की मांग करता है।

  • क्या राज्य की सफलता का मानक यह होना चाहिए कि प्रदर्शनकारी मरा या नहीं?
  • क्या किसी नागरिक की हड्डी टूटने के बाद ही बल प्रयोग “अत्याचार” कहलाएगा?
  • क्या आंख की रोशनी चली जाए, शरीर में pellets धंस जाएं, मानसिक आघात हो या महिला के साथ कथित यौन हिंसा का आरोप हो, तो तब तक राज्य का व्यवहार उचित माना जाएगा जब तक मृत्यु न हो?

“लोकतांत्रिक राज्य की कसौटी “कितने लोग मरे” नहीं, बल्कि “कितनी शक्ति उचित और आवश्यक थी” है।” सुप्रीम कोर्ट ने 27-28 जुलाई की सुनवाई में इसी दिशा में महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी कि केवल आंदोलन होना लाठीचार्ज का पर्याप्त आधार नहीं है और शांतिपूर्ण, वैध प्रदर्शन संवैधानिक संरक्षण में है। न्यायालय ने संतुलित दृष्टिकोण और पुलिस-प्रदर्शनकारियों दोनों के लिए self-discipline की आवश्यकता पर जोर दिया था। इसका अर्थ यह भी है कि नागरिकों का अधिकार पूर्ण नहीं है।

यदि प्रदर्शनकारी हिंसा करते हैं, पुलिस पर हमला करते हैं, सार्वजनिक संपत्ति नष्ट करते हैं या प्रतिबंधित क्षेत्र में जबरन घुसने की कोशिश करते हैं, तो राज्य को कानून लागू करने का अधिकार है। लेकिन “कानून लागू करने और प्रतिशोध लेने के बीच एक संवैधानिक रेखा होती है।” राज्य का बल “necessary” हो सकता है; वह “vindictive” नहीं हो सकता।

संविधान : असहमति अपराध नहीं

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है और अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण और निरस्त्र सभा करने का अधिकार देता है। ये अधिकार पूर्ण नहीं हैं; सार्वजनिक व्यवस्था आदि के हित में अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के तहत युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने Himat Lal K. Shah से लेकर बाद के फैसलों में यह सिद्धांत स्वीकार किया है कि राज्य सार्वजनिक सभाओं के समय, स्थान और व्यवस्था को विनियमित कर सकता है, लेकिन प्रतिबंध युक्तियुक्त होने चाहिए। इसलिए संसद की ओर मार्च करने का अधिकार और संसद के परिसर में प्रवेश का अधिकार एक ही चीज नहीं हैं।

  • प्रदर्शनकारियों को अपनी बात कहने का अधिकार है।
  • राज्य को संसद की सुरक्षा सुनिश्चित करने का अधिकार है।

लेकिन दोनों अधिकारों के बीच टकराव होने पर राज्य का उत्तर proportionate response होना चाहिए। यही संवैधानिक शासन की परीक्षा है।

  • यदि कुछ लोग बैरिकेड तोड़ते हैं तो क्या पूरी भीड़ को संभावित अपराधी मान लिया जाए?
  • यदि भीड़ में कुछ आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग मौजूद थे, तो क्या शांतिपूर्ण छात्रों के साथ भी समान बल प्रयोग वैध हो जाता है?
  • यदि कुछ प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर हमला किया, तो क्या उसका उत्तर ऐसी सामूहिक कार्रवाई हो सकती है जिसका असर निर्दोष लोगों पर भी पड़े?

इनका उत्तर कानून और तथ्य तय करेंगे।

“आंदोलन में अपराधी घुस आए थे” : आरोप सही हो तो भी सामूहिक दंड नहीं हो सकता

दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि 20 जुलाई के प्रदर्शन में बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे और उसके अनुसार कुछ “history-sheeters” तथा आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग भी शामिल थे। पुलिस ने लगभग 2,873 व्यक्तियों की जांच और व्यापक पुलिस कार्रवाई का संदर्भ दिया है।

यह जांच का विषय है और यदि वास्तव में अपराधी तत्व आंदोलन में घुसे थे तो पुलिस को उन्हें चिन्हित कर कानून के अनुसार गिरफ्तार करने का अधिकार है।

लेकिन लोकतांत्रिक सिद्धांत सरल है—”व्यक्ति का अपराध उसके पड़ोसी का अपराध नहीं बन जाता।” यदि भीड़ में 100 अपराधी हैं और 10,000 शांतिपूर्ण नागरिक हैं तो राज्य की चुनौती यही है कि वह दोनों के बीच फर्क करे।तकनीक, intelligence और पुलिस प्रशिक्षण का उद्देश्य यही होना चाहिए।

वरना राज्य की सबसे आसान रणनीति होगी—“भीड़ थी, इसलिए सब संदिग्ध थे।” लेकिन गणतंत्र में संदेह के आधार पर सामूहिक दंड लोकतंत्र को भीड़तंत्र के खिलाफ नहीं, स्वयं राज्य के खिलाफ खड़ा कर देता है।

महिलाओं से जुड़ी शिकायतें : राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी और कठोर हो जाती है

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रस्तावित समिति के दायरे में महिला प्रदर्शनकारियों के कथित यौन उत्पीड़न की शिकायतों को शामिल करना विशेष रूप से गंभीर विषय है।

किसी भी सार्वजनिक आंदोलन में महिला की गरिमा की रक्षा केवल पुलिस का प्रशासनिक दायित्व नहीं; यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के मूल्यों से जुड़ा विषय है।

यदि किसी महिला के साथ पुलिसकर्मी अथवा किसी अन्य व्यक्ति ने अपराध किया है तो उसकी जांच बिना किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह के होनी चाहिए। लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है।

“सिर्फ इसलिए कि आरोप पुलिस पर है, हर पुलिसकर्मी दोषी नहीं हो जाता।” और सिर्फ इसलिए कि आरोप प्रदर्शनकारी पक्ष से आया है, उसे खारिज भी नहीं किया जा सकता। यही स्वतंत्र जांच का महत्व है। ऐसे आरोपों की जांच में महिला जांच अधिकारियों, सुरक्षित बयान प्रक्रिया, medical evidence, digital evidence और victim/witness protection की व्यवस्था होनी चाहिए।

सोशल मीडिया और साइबर बुलिंग : नई पीढ़ी का नया दमन?

यह विवाद केवल सड़कों तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया के माध्यम से प्रदर्शनकारियों, विशेषकर कमजोर वर्गों को निशाना बनाने और cyber bullying के आरोपों को भी जांच के दायरे में रखा है। यह आधुनिक लोकतंत्र का नया संकट है।

पहले राज्य प्रदर्शनकारी की तस्वीर अखबार से हटवा सकता था या लाठी से भीड़ को तितर-बितर कर सकता था। अब कैमरे हर जेब में हैं। लेकिन यही कैमरा surveillance का हथियार भी बन सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह मुद्दा भी उठा है कि दिल्ली पुलिस ने protest site पर facial-recognition technology का इस्तेमाल किया। पुलिस ने अदालत को बताया कि तकनीक का उद्देश्य criminal records वाले लोगों की पहचान करना था। दूसरी ओर याचिकाकर्ताओं ने व्यापक biometric surveillance और privacy concerns उठाए हैं। यह विषय आने वाले वर्षों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

  • क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल हर व्यक्ति संभावित अपराधी है जिसकी biometric identity राज्य दर्ज कर सकता है?
  • कितने समय तक?
  • किस कानूनी आधार पर?
  • डेटा किसके पास रहेगा?
  • क्या उसे private technology vendors को दिया जाता है?

इन प्रश्नों का उत्तर केवल पुलिस SOP से नहीं हो सकता। यह privacy, proportionality और constitutional rights का प्रश्न है।

जंतर-मंतर को बंद कर देना आसान समाधान नहीं

इस पूरे विवाद के बीच जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के लिए अनुपयुक्त घोषित करने की मांग भी सर्वोच्च न्यायालय के सामने आई है। याचिका में सुरक्षा, प्रवेश-निकास और emergency access जैसी समस्याओं का उल्लेख किया गया है और कोई वैकल्पिक स्थल निर्धारित करने की मांग की गई है। यह बहस भी गंभीर है।

  • राजधानी के नागरिकों को यातायात, अस्पताल, एंबुलेंस और दैनिक जीवन के अधिकार हैं।
  • प्रदर्शनकारियों को भी लोकतांत्रिक असहमति का अधिकार है।

दोनों अधिकारों के बीच स्थान का विवेकपूर्ण निर्धारण प्रशासन की जिम्मेदारी है। लेकिन “प्रदर्शन शहर में न हो” लोकतंत्र का समाधान नहीं। “सवाल प्रदर्शन को हटाने का नहीं, प्रदर्शन को व्यवस्थित, सुरक्षित और अधिकार-सम्मत बनाने का है।” असहमति के लिए ऐसी जगह चाहिए जहां नागरिक की आवाज भी सुनाई दे और शहर का जीवन भी बाधित न हो।

संसद : जहां सवालों का उत्तर होना चाहिए था

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे असहज राजनीतिक प्रश्न यही है कि जिस आंदोलन का टकराव संसद की ओर मार्च से जुड़ा था, उसके बाद संसद में सरकार को विपक्ष के प्रश्नों का सामना करना ही चाहिए था। राष्ट्रव्यापी महत्व के ऐसे मामले में गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस के राजनीतिक-प्रशासनिक उत्तरदायित्व पर सवाल उठना स्वाभाविक था।

यदि सरकार का पक्ष यह है कि पुलिस ने आवश्यक और न्यूनतम बल का इस्तेमाल किया, प्रदर्शनकारी बैरिकेड तोड़ रहे थे और कुछ आपराधिक तत्वों ने आंदोलन को हिंसक बनाया, तो यह पक्ष संसद में स्पष्ट रूप से रखा जाना चाहिए। “लोकतंत्र में सरकार से प्रश्न पूछे जाने पर उसका पहला संस्थागत उत्तर संसद होना चाहिए, टेलीविजन इंटरव्यू नहीं।”

किरण रिजिजू ने जिस विस्तार से दिल्ली पुलिस का बचाव किया, वही तर्क संसद में रखे जाते तो राजनीतिक बहस अधिक तथ्याधारित होती। लेकिन यहां एक और सावधानी जरूरी है। किसी मंत्री द्वारा पुलिस के पक्ष में प्रारंभिक बयान देना अपने आप में न्याय में हस्तक्षेप नहीं है। न्यायालय में मामला लंबित होने का अर्थ यह नहीं कि सरकार सार्वजनिक रूप से अपना factual position ही न रखे। समस्या तब पैदा होती है जब राजनीतिक निष्कर्ष जांच से पहले अंतिम सत्य की तरह प्रस्तुत किए जाएं। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह अदालत की जांच का सम्मान करे और अपने दावों को evidence-based बनाए।

“कांग्रेस के समय हजारों लोग मारे गए” : इतिहास का इस्तेमाल आज की जवाबदेही से बचने का रास्ता नहीं

किरण रिजिजू द्वारा कांग्रेस शासनकाल के आंदोलनों का हवाला देना राजनीतिक बहस का हिस्सा हो सकता है। लेकिन यहां पत्रकारिता का एक साधारण प्रश्न बहुत जरूरी है—”कौन-सी घटना? किस वर्ष? कितनी मौतें? किस आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार?”

यदि कोई मंत्री हजारों मौतों का दावा करता है तो उसके सामने तथ्य रखे जाने चाहिए। न तो कांग्रेस के शासनकाल की गलतियां छिपाई जानी चाहिए और न आज की सरकार की जवाबदेही उनसे कम की जानी चाहिए। लोकतंत्र में एक सरकार की गलती का बचाव दूसरी सरकार की पुरानी गलती से नहीं किया जा सकता। “उन्होंने भी किया था” किसी भी शासन की संवैधानिक ढाल नहीं हो सकती।

आज 2026 है। आज की पुलिस आज जवाबदेह है। आज की सरकार आज जिम्मेदार है। कल की सरकार की गलतियां इतिहास की जवाबदेही हैं; वे आज के नागरिक के अधिकारों की कीमत तय नहीं कर सकतीं।

अगर पुलिस घायल हुई तो उसकी भी जांच होनी चाहिए

यहां निष्पक्षता का तकाजा है कि हम केवल घायल छात्रों की बात करके रुकें नहीं। पुलिस का दावा है कि बड़ी संख्या में उसके personnel घायल हुए और प्रदर्शन में हिंसा भी हुई। पुलिस कर्मियों के परिवारों ने भी सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपनी पीड़ा और injury का उल्लेख करते हुए कहा है कि उनकी मानवीय स्थिति को नजरअंदाज किया जा रहा है। यदि किसी प्रदर्शनकारी ने पुलिसकर्मी पर हमला किया है, तो उसके खिलाफ कानूनन कार्रवाई होनी चाहिए।

  • पुलिसकर्मी भी नागरिक है।
  • उसका जीवन भी अनुच्छेद 21 के संरक्षण में है।
  • राज्य पुलिस को भीड़ के हाथों हिंसा के लिए असुरक्षित छोड़ नहीं सकता।

लेकिन इसी से दूसरा सिद्धांत भी निकलता है—”पुलिस को नागरिक के खिलाफ अधिक शक्ति इसलिए नहीं मिल जाती क्योंकि वह वर्दी में है; बल्कि वर्दी उसे अधिक जिम्मेदार बनाती है।” जनता की सुरक्षा के लिए मिली शक्ति का उपयोग अधिक अनुशासन के साथ होना चाहिए, कम के साथ नहीं।

असली कसौटी : command responsibility

अब जांच समिति के सामने केवल यह सवाल नहीं होना चाहिए कि किस पुलिसकर्मी ने किस प्रदर्शनकारी को डंडा मारा। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न होना चाहिए—

  • “आदेश किस स्तर से आया?”
  • किस commander ने बल प्रयोग की अनुमति दी?
  • क्या written order था?
  • क्या कोई graduated response protocol अपनाया गया?
  • क्या पहले चेतावनी दी गई?
  • क्या exit route दिया गया?
  • क्या ambulance और medical teams तैयार थीं?
  • क्या female protesters के लिए महिला पुलिस पर्याप्त थी?
  • क्या plainclothes personnel की तैनाती का विधिक आधार था?
  • क्या body-camera footage उपलब्ध है?
  • क्या wireless communication record intact है?
  • और यदि force protocol का उल्लंघन हुआ तो supervisory accountability कहाँ तक जाती है?

क्योंकि लोकतंत्र में केवल “एक सिपाही ने गलती की” कहकर मामला समाप्त करना आसान है। “व्यवस्था का दायित्व यह पता लगाना है कि उस सिपाही को उस परिस्थिति में गलती करने का अवसर किसने दिया।”

कमेटियां तभी प्रभावी हैं जब वे रिपोर्ट से आगे बढ़ें

भारत में आयोग और समितियां नई बात नहीं। कई बार जांच बैठती है, रिपोर्ट आती है, फाइल बंद होती है और जनता भूल जाती है। इस आशंका को पूरी तरह निराधार भी नहीं कहा जा सकता।इसलिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित उच्चस्तरीय समिति का महत्व उसके सदस्यों से अधिक उसके terms of reference और follow-up mechanism में होगा। समिति को केवल यह पता नहीं लगाना चाहिए कि किस दिन क्या हुआ। उसे यह भी देखना चाहिए कि—

  • क्या police protocol पर्याप्त था?
  • क्या protocol का पालन हुआ?
  • क्या force proportional था?
  • क्या कोई criminal offence बनता है?
  • क्या disciplinary action बनता है?
  • क्या victim compensation आवश्यक है?
  • क्या surveillance और facial recognition के लिए स्पष्ट legal framework चाहिए?
  • क्या protest policing के लिए nationwide guidelines आवश्यक हैं?

और उसकी रिपोर्ट पर अदालत समयबद्ध आदेश दे सके—इसके लिए स्पष्ट monitoring व्यवस्था होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही कहा है कि समिति से प्राप्त जानकारी के आधार पर वह आगे आवश्यक निर्देश दे सकता है। इसलिए इस बार उम्मीद केवल रिपोर्ट की नहीं, रिपोर्ट पर कार्रवाई की होनी चाहिए।

भारत को “National Protest Policing Protocol” की जरूरत है

जंतर-मंतर की घटना एक राष्ट्रीय बहस का अवसर दे रही है। भारत को एक ऐसा राष्ट्रीय protocol चाहिए जिसमें स्पष्ट हो—

  • शांतिपूर्ण प्रदर्शन में पुलिस की भूमिका क्या होगी;
  • भीड़ नियंत्रण में बल प्रयोग की graduated hierarchy क्या होगी;
  • कब पानी की बौछार, barricading, warning, negotiation, non-lethal devices या arrest का इस्तेमाल हो सकता है;
  • pellet weapons के इस्तेमाल की सीमा क्या होगी;
  • किन परिस्थितियों में projectile-based ammunition की अनुमति होगी;
  • महिलाओं और बच्चों के लिए क्या विशेष safeguards होंगे;
  • plainclothes officers की पहचान और accountability कैसे सुनिश्चित होगी;
  • body cameras और CCTV कितने समय सुरक्षित रखे जाएंगे;
  • facial recognition के उपयोग की legal threshold क्या होगी;
  • और हर बड़ी पुलिस कार्रवाई के बाद independent review किस प्रकार होगा।

सर्वोच्च न्यायालय पहले ही nationwide protocol की संभावना पर विचार कर चुका है। यह सिर्फ जंतर-मंतर के लिए नहीं होना चाहिए। यह दिल्ली, पटना, रांची, लखनऊ, कोलकाता, मुंबई—हर शहर के लिए समान लोकतांत्रिक मानक होना चाहिए।

सरकार का डर और नागरिक का डर

राज्य का एक वास्तविक भय है—बड़ी भीड़ में हिंसा फैल सकती है। नागरिक का भी वास्तविक भय है—भीड़ में कहीं राज्य की शक्ति अनियंत्रित न हो जाए। दोनों भय वास्तविक हैं।

लोकतंत्र का उत्तर किसी एक भय को चुनना नहीं, बल्कि दोनों को नियंत्रित करने वाली संस्थाएं बनाना है। “Police must be strong enough to protect public order, but restrained enough to protect liberty.” और प्रदर्शनकारी इतने अनुशासित हों कि उनका अधिकार किसी दूसरे नागरिक के अधिकार को कुचलने का माध्यम न बने। यहां “self-discipline” शब्द सर्वोच्च न्यायालय ने भी महत्वपूर्ण माना है। यही लोकतांत्रिक परिपक्वता है।

छात्र आंदोलन को केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न मानना ऐतिहासिक भूल होगी

जंतर-मंतर के छात्र केवल दिल्ली पुलिस के खिलाफ नहीं निकले थे। उनका मूल आक्रोश परीक्षा व्यवस्था, पेपर लीक और युवा भविष्य के संकट से जुड़ा था।

यदि किसी युवा ने वर्षों तक तैयारी की और फिर उसे पता चला कि परीक्षा की विश्वसनीयता ही संदिग्ध है, तो उसका लोकतांत्रिक विरोध राज्य के विरुद्ध अपराध नहीं—राज्य से जवाब मांगने की प्रक्रिया है। भारत की सबसे युवा पीढ़ी को यदि केवल डंडे से शांत किया जाएगा, तो समस्या खत्म नहीं होगी।

  • वह सोशल मीडिया पर जाएगी।
  • दूसरे शहरों में जाएगी।
  • अदालत जाएगी।
  • चुनाव में जाएगी।
  • और अंततः उसकी राजनीति बदल जाएगी।

युवाओं को शांत करने का स्थायी तरीका पुलिस नहीं है। “विश्वसनीय संस्थाएं हैं।”

इस पूरे प्रकरण में सत्ता और विपक्ष दोनों की परीक्षा

सत्ता के लिए संदेश स्पष्ट है—

  • हर प्रदर्शन विपक्ष की साजिश नहीं।
  • हर आलोचक राष्ट्र-विरोधी नहीं।
  • हर असहमति अराजकता नहीं।
  • और हर पुलिस कार्रवाई अपने आप सही नहीं।

विपक्ष के लिए भी संदेश उतना ही स्पष्ट है—

  • हर पुलिसकर्मी अत्याचारी नहीं।
  • हर प्रदर्शनकारी निर्दोष नहीं।
  • हर वायरल वीडियो पूर्ण सत्य नहीं।

और हर प्रशासनिक कार्रवाई को राजनीतिक हथियार बनाने से लोकतांत्रिक विमर्श मजबूत नहीं होता। इसलिए जंतर-मंतर का न्याय राजनीतिक जीत-हार से ऊपर होना चाहिए।

मीडिया के लिए भी यह अग्निपरीक्षा है

20 जुलाई के हजारों वीडियो सोशल मीडिया पर हैं। लेकिन वीडियो सत्य का एक हिस्सा हैं, पूरा सत्य नहीं। वीडियो में एक क्षण दिखाई देता है। पूरी timeline नहीं। किसने पहले क्या किया, यह हमेशा नहीं दिखता। इसलिए मीडिया का दायित्व है कि वायरल दृश्य को evidence समझे, verdict नहीं।

  • घायल प्रदर्शनकारियों की medical records जांचे।
  • घायल पुलिसकर्मियों की records देखे।
  • CCTV और body-cam footage मांगे।
  • wireless logs और command structure की जांच करे।
  • अदालत की filings पढ़े।
  • और सरकारी दावों की स्वतंत्र fact-checking करे।

आज पत्रकारिता को “कौन सही है?” से ज्यादा पूछना चाहिए— “सत्य की पुष्टि कैसे होगी?”

सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप : राहत भी, चेतावनी भी

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही छात्रों के संबंध में कई महत्वपूर्ण अंतरिम कदम उठा चुका है। 28 जुलाई को उसने विभिन्न राज्यों में गिरफ्तार/हिरासत में लिए गए 18 वर्ष से कम आयु के छात्रों की रिहाई का निर्देश दिया और राज्यों को छात्रों के खिलाफ coercive action से रोकते हुए मामले की आगे जांच जारी रखने की अनुमति दी। बाद में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गंभीर और जघन्य आपराधिक antecedents वाले लोगों के मामले अलग रहेंगे।

यह आदेश एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संतुलन दिखाता है—”छात्र होना अपराध नहीं; हिंसक अपराध करना भी अधिकार नहीं।”

दोनों बातें एक साथ सत्य हो सकती हैं। यही constitutional nuance इस मामले में सबसे अधिक आवश्यक है।

अब निर्णायक सवाल : क्या इस बार न्याय समय पर मिलेगा?

जनता की चिंता उचित है कि कहीं उच्चस्तरीय समिति भी केवल एक और फाइल न बन जाए। इसलिए अदालत और समिति को छह बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए—

  • समयसीमा।
  • साक्ष्यों का संरक्षण।
  • command responsibility।
  • victim और witness protection।
  • सार्वजनिक progress reports।
  • रिपोर्ट के बाद enforceable directions।

जिस मामले में हजारों छात्र, पुलिसकर्मी, महिलाएं और नागरिक प्रभावित हों, उसमें वर्षों तक चलने वाली जांच स्वयं एक अन्याय बन सकती है।

  • न्याय में देरी केवल अदालत का प्रश्न नहीं।
  • यह नागरिक के विश्वास का प्रश्न है।

लोकतंत्र की राजधानी में जनता से डरना नहीं, जनता को सुनना चाहिए

  • दिल्ली देश की राजधानी है।
  • यह वह जगह है जहां संसद है।
  • राष्ट्रपति भवन है।
  • सर्वोच्च न्यायालय है।
  • केंद्रीय मंत्रालय हैं।
  • और लाखों नागरिकों की राजनीतिक आवाज भी यहीं पहुंचती है।

यदि राजधानी में प्रदर्शन का अर्थ यह हो जाए कि नागरिक केवल अनुमति लेकर तय सीमा में खड़े रहें और जैसे ही उनकी आवाज सत्ता की ओर बढ़े, राज्य का उत्तर शक्ति हो, तो लोकतंत्र का अर्थ सिकुड़ने लगेगा। लेकिन यदि प्रदर्शनकारी यह मान लें कि “हम संख्या में अधिक हैं इसलिए किसी भी barricade को तोड़ सकते हैं”, तो यह भी लोकतंत्र नहीं।

“लोकतंत्र वह मध्यभूमि है जहां अधिकार और मर्यादा एक साथ चलते हैं।” राज्य को विरोध सुनना होगा। विरोध करने वालों को कानून मानना होगा। और दोनों के बीच अगर टकराव हो तो संविधान सबसे ऊपर होगा।

जंतर-मंतर का फैसला दिल्ली पुलिस पर ही नहीं, भारतीय लोकतंत्र पर होगा

20 जुलाई की घटना का अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि पुलिस निश्चित रूप से दोषी है। यह कहना भी उतना ही जल्दबाजी होगा कि पुलिस को पहले ही क्लीन चिट मिल गई। क्योंकि एक तरफ दिल्ली पुलिस का दावा है कि उसने न्यूनतम आवश्यक बल प्रयोग किया और प्रदर्शन का एक हिस्सा हिंसक होकर बैरिकेड पार कर संसद की ओर बढ़ा; दूसरी तरफ medical records, RTI replies, सार्वजनिक वीडियो और अन्य दस्तावेज ऐसे प्रश्न उठा रहे हैं जिन्हें स्वतंत्र जांच से परखा जाना आवश्यक है। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय का स्वतंत्र समिति की ओर बढ़ना एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संकेत है। यह पुलिस के खिलाफ फैसला नहीं। यह प्रदर्शनकारियों के पक्ष में अंतिम फैसला भी नहीं। “यह सत्य की तलाश में राज्य और नागरिक—दोनों को जवाबदेह बनाने की प्रक्रिया है।”

सरकार को अदालत की जांच का स्वागत करना चाहिए। दिल्ली पुलिस को अपने सभी रिकॉर्ड बिना किसी संदेह के सुरक्षित और उपलब्ध कराने चाहिए। प्रदर्शनकारियों को भी पुलिसकर्मियों के खिलाफ वास्तविक हिंसा के आरोपों की जांच में सहयोग करना चाहिए।

मीडिया को पक्ष नहीं, प्रमाण के साथ खड़ा होना चाहिए। और न्यायपालिका को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि समिति की रिपोर्ट समय के अंधेरे में गुम न हो। क्योंकि अंततः सवाल किसी एक लाठी का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें एक नागरिक अपनी शिकायत लेकर सड़क पर उतरता है और उसके सामने राज्य की पूरी शक्ति खड़ी होती है।

  • राज्य के पास पुलिस है।
  • कानून है।
  • जेल है।
  • हथियार हैं।
  • सर्विलांस तकनीक है।

नागरिक के पास क्या है?

“उसके पास केवल संविधान है।” इसलिए लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा तब नहीं होती जब नागरिक सत्ता की प्रशंसा करता है। “लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है, जब नागरिक सत्ता से असहमति जताता है—और सत्ता तब भी संविधान के भीतर रहकर जवाब देती है।”

“लोकतंत्र में पुलिस की लाठी राज्य की ताकत हो सकती है, लेकिन संविधान उसकी सीमा है; और जिस दिन सत्ता नागरिक की आवाज को दबाने के लिए संविधान की सीमा लांघती है, उस दिन चोट केवल प्रदर्शनकारी को नहीं—गणराज्य के विश्वास को लगती है।”

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