…….पण्डित प्रदीप शुक्ल
भारतीय राजनीतिक विमर्श में पिछले कुछ वर्षों में शब्दावलियों का एक नया शस्त्रागार तैयार किया गया है। कभी जंगल से उपजे उग्रवाद को ‘नक्सल’ कहा गया, तो कभी विश्वविद्यालयों, सेमिनारों और बौद्धिक बहसों को निशाना बनाते हुए ‘अर्बन नक्सल’ का जुमला उछाला गया। इसके बाद ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’, ‘खान मार्केट गैंग’ और ‘आंदोलनजीवी’ जैसी राजनीतिक प्रजातियों की खोज की गई। अब इस शृंखला में एक कदम और आगे बढ़कर सत्ता के गलियारों से “दिमागी नक्सल” जैसी अति-यथार्थवादी और व्यंग्यात्मक शब्दावली को सार्वजनिक जीवन में उछाल दिया गया है।
यदि इस नए वैचारिक आविष्कार को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाए, तो सुरक्षा एजेंसियों और प्रशासनिक तंत्र का काम बेहद सरल हो जाना चाहिए। अब आधुनिक हथियारों, बारूद के ठिकानों या गुप्त ट्रेनिंग कैंपों की तलाश करने की आवश्यकता ही क्या है? संदिग्ध व्यक्ति को कुर्सी पर बैठाकर केवल बुनियादी संवैधानिक और सामाजिक सवाल पूछने चाहिए—बेरोजगारी पर क्या सोचते हैं? रुपये की गिरावट और मुद्रास्फीति पर क्या राय है? पेपर लीक और शिक्षा की बदहाली पर क्या स्थिति है? और यदि वह सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े कर दे, तो राज्य की सुरक्षा के लिहाज से उसका ‘केस’ स्वतः तैयार माना जा सकता है।
संवैधानिक, विधिक और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जिसमें सरकार के कार्यों की आलोचना, असहमति जताना और तीखे सवाल पूछना शामिल है। एक परिपक्व और जीवंत लोकतंत्र (Vibrant Democracy) में विपक्ष और जागरूक नागरिकता ही व्यवस्था को आईना दिखाने का काम करते हैं।
- तथ्य और आंकड़े: यदि वैधानिक और आर्थिक मोर्चे पर देखें, तो देश में बेरोजगारी के आंकड़े और श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) युवाओं की चिंता को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।
- जब नागरिक प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income), मुद्रास्फीति दर, और शिक्षा तथा स्वास्थ्य पर होने वाले सार्वजनिक खर्च (GDP का प्रतिशत) पर सवाल पूछते हैं, तो वे किसी ‘विदेशी एजेंडे’ का पालन नहीं कर रहे होते, बल्कि वे संविधान प्रदत्त अपने विधिक और लोकतांत्रिक अधिकारों का निर्वहन कर रहे होते हैं।
- सवाल पूछने की इस स्वाभाविक प्रवृत्ति को ‘नक्सलवाद’ या ‘अराजकता’ की संज्ञा देना संविधान की मूल भावना और लोकतांत्रिक चेतना का सीधा अवमूल्यन है।
शैक्षणिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य: शिक्षा की दशा और दिशा
एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य स्वतंत्र सोच, तार्किक विश्लेषण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temper) का विकास करना होता है। यदि शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों में यह सिखाया जाने लगे कि “सवाल पूछना अपराध है” या “हर सरकारी निर्णय को बिना सोचे-समझे अंतिम सत्य मान लेना ही राष्ट्रभक्ति है”, तो यह शिक्षा के मूल उद्देश्यों की हत्या के समान है।
- वर्तमान समय में देश के सरकारी स्कूलों और विश्वविद्यालयों की दशा किसी से छिपी नहीं है। बुनियादी सुविधाओं, योग्य शिक्षकों के अभाव और लचर बुनियादी ढांचे के कारण आज छात्र और युवा सड़कों पर उतरने को विवश हैं।
- हाल ही में राजस्थान के सरकारी स्कूलों में वीडियोग्राफ़ी और बाहरी प्रवेश पर रोक लगाने वाले प्रशासनिक फरमान हों या देश के विभिन्न हिस्सों में छात्राओं और युवाओं द्वारा अपने अधिकारों के लिए किए जा रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शन—यह इस बात का प्रमाण है कि सिस्टम अपनी असफलताओं को छिपाने के लिए पहरे कड़े कर रहा है।
- शिक्षा को वैचारिक नियंत्रण का साधन बनाने की यह प्रवृत्ति समाज के भविष्य को बौद्धिक रूप से पंगु बना देगी।
मानवीय भावनाएं, जनहित और राष्ट्रहित
राष्ट्रहित का असली अर्थ भवनों, एक्सप्रेसवे या आंकड़ों की बाजीगरी नहीं, बल्कि उस अंतिम व्यक्ति का कल्याण है जो शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के लिए संघर्ष कर रहा है। जब एक नागरिक पूछता है कि “अमृतकाल का लाभ किसके गिलास में है?” या “पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में आम आदमी की थाली में क्या बदला है?”, तो यह केवल एक प्रश्न नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं की वह पुकार है जो व्यवस्था से जवाबदेही मांगती है।
- दिमाग की यह ‘बदतमीजी’ ही मानव सभ्यता के विकास की मूल प्रेरक शक्ति रही है। यदि मनुष्य ने सदियों पहले सवाल पूछना बंद कर दिया होता, तो न वैज्ञानिक क्रांतियां होतीं और न ही लोकतांत्रिक अधिकारों का विस्तार होता।
- वैचारिक असहमति को अपराध मान लेना और हर आलोचना को राष्ट्रविरोधी करार देना एक निरंकुश मानसिकता का परिचायक है, जो दीर्घकाल में राष्ट्रहित के विपरीत है।
लोकतंत्र कोई ऐसी मूक व्यवस्था नहीं है जहां शासक बोलें और जनता केवल ताली बजाए। असली राष्ट्रनिर्माण संवाद, पारदर्शिता और आलोचनात्मक चिंतन से संभव है, दमन या जुमलेबाजी से नहीं। यदि नागरिकों के सोचने और सवाल पूछने के अधिकार पर ही पहरा लगा दिया जाए, तो वह लोकतंत्र केवल नाममात्र का रह जाएगा। समय की मांग है कि सत्ता तंत्र असहमति के स्वरों का सम्मान करे और शिक्षा, स्वास्थ्य तथा रोजगार जैसे वास्तविक जनहित के मुद्दों पर अपनी प्रशासनिक जवाबदेही तय करे।
“जो व्यवस्था सवालों के आईने से डरकर नागरिकों के दिमाग पर पहरे बिठाने लगे, वह लोकतंत्र को चलाने का नहीं, बल्कि उसे अपनी मुट्ठी में कैद करने का असफल प्रयास कर रही होती है।”

