…..पण्डित प्रदीप शुक्ल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति का एक स्थायी चरित्र रहा है—वह स्वयं को “प्रधानसेवक” कहें या “जनसेवक”, सत्ता के शीर्ष पर बैठे रहकर भी अपने व्यक्तित्व को एक असाधारण राजनीतिक परियोजना की तरह प्रस्तुत करते हैं। लेकिन समय के साथ यह परियोजना अब सेवा से अधिक ‘प्रदर्शन’, जवाबदेही से अधिक ‘छवि-निर्माण’, और संवाद से अधिक ‘रील-राजनीति’ में बदलती दिखाई देती है। हालिया दिनों में उनकी कई सोशल-मीडिया रील्स, खासकर युवा पीढ़ी को संबोधित करने वाले संदेश, यही संकेत देती हैं कि सत्ता अब संसद के गंभीर मंच से उतरकर डिजिटल मंच पर अपने लिए सहानुभूति और स्वीकृति का नया रूप तलाश रही है।
यह दृश्य अपने-आप में चिंताजनक है। प्रधानमंत्री जब युवाओं को संबोधित करते हैं, तब उनसे अपेक्षा यह होती है कि वे देश की सबसे बड़ी समस्याओं—परीक्षा-प्रणाली की विफलता, पेपर लीक, शिक्षा-व्यवस्था में भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, अवसरों की कमी और संस्थागत अविश्वास—पर देश को स्पष्ट दिशा दें। लेकिन यदि उस जगह बार-बार अपनी पीड़ा, अपनी छवि और अपने अपमान-बोध को केंद्र में रखा जाए, तो यह शासन की गंभीरता को कम नहीं, बल्कि उसकी संकीर्णता को उजागर करता है।
आज देश का युवा केवल भाषण नहीं सुनना चाहता; वह उत्तर चाहता है। वह यह जानना चाहता है कि उसकी परीक्षा क्यों लीक होती है, उसकी मेहनत का मूल्य क्यों छीना जाता है, उसकी तैयारी क्यों बार-बार अपमानित होती है, और उसकी डिग्री, उसकी नौकरी, उसका भविष्य किसके संरक्षण में लुटता है। ऐसे में यदि सत्ता गालियों, मीम्स, अपशब्दों या सोशल-मीडिया के शोर को मुद्दा बनाकर मूल प्रश्नों को पीछे धकेलने की कोशिश करती है, तो यह असली संकट से भागने जैसा है। मूल संकट भाषा का नहीं, शासन की जवाबदेही का है।
प्रधानमंत्री की हालिया डिजिटल शैली इस प्रवृत्ति को और गहरा करती है। लगातार रील्स, कैमरे के कोण, “हैलो फ्रेंड्स” जैसी अभिव्यक्तियाँ, और युवा पीढ़ी से जुड़ने की कोशिशें तब तक प्रभावी नहीं हो सकतीं, जब तक उनके पीछे वास्तविक संवेदना, वास्तविक सुनवाई और वास्तविक कार्रवाई न हो। युवा वर्ग अब इतना सरल नहीं कि केवल शैली से प्रभावित हो जाए। वह जानता है कि किस भाषा के पीछे नीति है और किस भाषा के पीछे केवल प्रबंधन। इस पीढ़ी ने असंतोष को भी डिजिटल रूप में संगठित करना सीख लिया है। वह सत्ता की भाषा को काटती, परखती और उसी की शैली में जवाब देती है।
यही वजह है कि प्रधानमंत्री के “मैं माफ़ करता हूं” जैसे वक्तव्य कई लोगों को राजसी आदेश की तरह लगे। लोकतंत्र में क्षमा कोई शासकीय विशेषाधिकार नहीं होती। वह नागरिकों की तरफ से उठी पीड़ा का उत्तर भी हो सकती है, पर किसी लोकतांत्रिक नेता के लिए पहला दायित्व माफ़ करना नहीं, जवाब देना है। जिस देश में लाखों छात्र पेपर-लीक और व्यवस्था की लापरवाही से अपमानित हों, वहाँ पीड़ित युवाओं को माफ़ करने का बयान संवेदना नहीं, बल्कि अति-आत्मविश्वास का संकेत बन जाता है। छात्र और उनके परिवार प्रधानमंत्री की दया नहीं, अपनी मेहनत के साथ न्याय चाहते हैं।
यह भी अत्यंत महत्वपूर्ण है कि इस बहस को केवल गालियों, शालीनता या असंसदीय भाषा तक सीमित कर देने की कोशिश की जा रही है। यह एक सुविधाजनक विकर्षण है। असल सवाल यह है कि जंतर-मंतर पर युवाओं का गुस्सा क्यों फूटा? क्यों प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता तार-तार हुई? क्यों बच्चे, अभिभावक और प्रशिक्षक इतने बड़े आंदोलन का हिस्सा बने? और सबसे अहम, क्यों सत्ता को इस पीढ़ी के सवालों का सीधा उत्तर देने से अधिक अपनी छवि की चिंता हो रही है?
जब कोई सरकार शिक्षा व्यवस्था की विफलता पर गंभीरता दिखाने के बजाय उसे राजनीतिक संचार के संकट की तरह पेश करने लगती है, तब वह एक बड़े लोकतांत्रिक अपराध की ओर बढ़ती है—वह जनता के दुःख को नैरेटिव-मैनेजमेंट में बदल देती है। इस प्रक्रिया में असली मुद्दा खो जाता है। छात्र की पीड़ा “इंस्टाग्राम वॉर” में बदल जाती है, परीक्षा-व्यवस्था का संकट “सांस्कृतिक झटके” में बदल जाता है, और प्रशासनिक विफलता “गालियों की राजनीति” में।
यह रास्ता खतरनाक है। क्योंकि युवा पीढ़ी अब पुराने ढर्रे के डर से नहीं चलती। उसे पुलिस, अदालत, मुकदमे या सत्ता की नैतिक भाषा से उतना भय नहीं, जितना पहले की पीढ़ियों को था। उसने अधिकारों की भाषा सीखी है। वह मोबाइल से रिकॉर्ड करती है, सोशल मीडिया से जवाब देती है, और सार्वजनिक मंचों पर शासन को चुनौती देती है। यह वही पीढ़ी है जिसे वर्षों तक “मोबाइल में खोई”, “गैर-गंभीर” या “आलसी” कहा जाता रहा; लेकिन संकट के समय उसने दिखाया कि वह न केवल समझती है, बल्कि संगठित भी हो सकती है।
प्रधानमंत्री की समस्या यह है कि वे इस पीढ़ी को भी अपनी पुरानी राजनीतिक शैली से पढ़ना चाहते हैं। पर Gen Z का मनोविज्ञान अलग है। वह उपदेश नहीं, प्रमाण देखती है। वह प्रतीक नहीं, परिणाम चाहती है। वह माफी नहीं, सुधार चाहती है। वह कैमरे का कोण नहीं, व्यवस्था का कोण बदलना चाहती है। और जब सत्ता यह नहीं समझती, तब उसका डिजिटल आकर्षण भी व्यंग्य का विषय बन जाता है।
पेपर लीक के खिलाफ कड़ा कानून बनाना आवश्यक था, लेकिन कानून की सख़्ती मात्र पर्याप्त नहीं। यदि प्रणाली वही रही, यदि निगरानी वही ढीली रही, यदि जिम्मेदारी वही बिखरी रही, तो दंड का प्रावधान केवल पोस्टर बनकर रह जाएगा। असली प्रश्न यह है कि सरकार ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बनाती जिसमें परीक्षा लीक न हो, परिणाम समय पर आएँ, भर्ती पारदर्शी हो, और युवा को हर मोड़ पर न्याय के लिए सड़कों पर न उतरना पड़े। यदि यह न हो सके, तो फिर “माफ़ करता हूँ” जैसी मुद्रा और भी असंगत लगती है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि लोकतंत्र में करुणा ऊपर से नीचे नहीं, नीचे से ऊपर भी बहती है। सत्ता को अपने नागरिकों से करुणा प्राप्त करनी होती है, अपनी पीड़ा के लिए क्षमा नहीं। युवा अपनी जिंदगी, अपनी जमा-पूंजी, अपनी मेहनत और अपने सपनों को लेकर खड़ा है। उससे यह कहना कि “मैं तुम्हें माफ़ करता हूँ” एक असाधारण असंवेदनशीलता का परिचायक हो सकता है, खासकर तब जब उसके नुकसान का कोई वास्तविक हिसाब अभी तक नहीं दिया गया हो।
देश की राजनीति आज एक निर्णायक मोड़ पर है। एक ओर वह सत्ता है जो अपनी लोकप्रियता को रील, मंच और छवि के सहारे बनाए रखना चाहती है; दूसरी ओर वह पीढ़ी है जो सत्ता से “परफॉर्मेंस” मांग रही है। यह सिर्फ़ मोदी बनाम कुछ छात्र या मोदी बनाम सोशल मीडिया का टकराव नहीं है। यह उस राजनीतिक युग का टकराव है जिसमें नेता स्वयं को अवतार, पीड़ित या उद्धारक के रूप में प्रस्तुत करता है, और उसके सामने एक नई पीढ़ी खड़ी है जो पूछती है—”आपने मेरे लिए क्या किया?”
यही प्रश्न अब सबसे बड़ा है। क्योंकि जब तक सत्ता इस प्रश्न का सामना नहीं करती, तब तक उसकी सारी रील्स, सारे माफी-फरमान, सारे कैमरा-एंगल और सारे डिजिटल संवाद केवल शोर रहेंगे। और लोकतंत्र शोर से नहीं, जवाब से चलता है।
“युवा पीढ़ी को उपदेश नहीं, उत्तर चाहिए; और सत्ता को समझना होगा कि रील से छवि बन सकती है, विश्वास नहीं।”


