48 मिनट का मंच और सत्य निकेतन का मलबा: दिल्ली विश्वविद्यालय के आईने में व्यवस्थागत विफलता का सच

वैचारिक और शैक्षणिक परिप्रेक्ष्य

शिक्षा किसी भी राष्ट्र के निर्माण का आधारशिला होती है, और विश्वविद्यालय केवल अकादमिक ज्ञान के केंद्र नहीं, बल्कि स्वतंत्र चिंतन, वैचारिक परिपक्वता और भविष्य के नेतृत्व के प्रस्फुटन स्थल होते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में जब देश के शीर्ष कार्यकारी का आगमन होता है, तो वह केवल एक औपचारिक संबोधन नहीं होता, बल्कि एक संवाद का सर्वोच्च मंच बनता है। श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) के उस ऐतिहासिक मंच से 48 मिनट के संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था, डिजिटल इंडिया (UPI), स्टार्टअप इकोसिस्टम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और भू-राजनीतिक चुनौतियों जैसे व्यापक विषयों पर अपनी बात रखी। राष्ट्र के विकास पथ, तकनीकी प्रगति और वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती साख का यह ब्योरा नीतिगत दृष्टि से एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय विमर्श है।

तथापि, अकादमिक और वैचारिक दृष्टि से यह विमर्श तब अधूरा और विरोधाभासी प्रतीत होने लगता है जब भाषण की विषय-सूची से उस प्रांगण की तात्कालिक, बुनियादी और मानवीय समस्याएं पूरी तरह नदारद रहती हैं, जहां वह खड़े होकर बोल रहे थे। “नाराज़ फूफा”, “दिमागी नक्सल” और “होम्योपैथी की गोली” जैसे राजनीतिक और प्रतीकात्मक कटाक्षों के बीच देश के केंद्रीय विश्वविद्यालय के परिसर की वास्तविक धरातलीय सच्चाइयों—विशेषकर छात्र आवास के संकट—को स्थान न मिलना इस बात का द्योतक है कि नीति-निर्माताओं और धरातल की अकादमिक वास्तविकताओं के बीच एक गहरी खाई बन चुकी है। एक शैक्षणिक संस्थान में वैचारिक बहसों का स्वागत है, किंतु बौद्धिक विमर्श और छात्र जीवन की भौतिक सुरक्षा के बीच संतुलन का अभाव व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर गंभीर वैचारिक प्रश्न खड़े करता है।

सामाजिक और जनहित आयाम

दिल्ली विश्वविद्यालय में देश के कोने-कोने—पूर्वोत्तर के दूरदराज के जिलों से लेकर दक्षिण के तटों और ग्रामीण भारत के अछूते कोनों—से लाखों छात्र अपने माता-पिता के सपनों को पंख देने आते हैं। इन छात्रों के लिए विश्वविद्यालय केवल डिग्री प्राप्त करने का जरिया नहीं, बल्कि सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility) का एकमात्र साधन है। परंतु इन छात्रों के सामाजिक जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि विश्वविद्यालय प्रशासन उन्हें औपचारिक रूप से सुरक्षित और पर्याप्त हॉस्टल आवास उपलब्ध कराने में लंबे समय से विफल रहा है।

इस व्यवस्थागत विफलता का प्रत्यक्ष परिणाम सत्य निकेतन, कमला नगर और विजय नगर जैसे इलाकों में पनपने वाला अनियंत्रित और अनियोजित प्राइवेट पीजी (Paying Guest) तथा छात्र आवास बाजार है। सत्य निकेतन लंबे समय से डीयू के साउथ कैंपस के छात्रों के लिए अनौपचारिक आवास का प्रमुख केंद्र रहा है, जहां अत्यधिक महंगे किराए पर छोटे-छोटे कमरों में छात्र रहने को विवश होते हैं। इन आवासों में न तो अग्नि सुरक्षा (Fire Safety) के मानक पूरे होते हैं, न ही ढांचागत मजबूती (Structural Integrity) की कोई वैधानिक जांच होती है। जब एसआरसीसी के मंच से 48 मिनट के भाषण के ठीक अगले दिन सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत भरभराकर गिर जाती है और छात्र मलबे में दब जाते हैं, तो यह केवल एक आकस्मिक दुर्घटना नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनहीनता और जनहित की घोर उपेक्षा का जीवंत दस्तावेज बन जाती है। जिस समाज और देश के भविष्य को सुरक्षित छत मुहैया कराना राज्य की नैतिक जिम्मेदारी है, वह यदि असुरक्षित मलबे के ढेर पर जीवन जीने को मजबूर हो, तो यह हमारी सामाजिक व्यवस्था की सामूहिक असफलता है।

संवैधानिक और नीतिगत दायित्व

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत ‘जीवन के अधिकार’ (Right to Life) में केवल सांस लेना शामिल नहीं है, बल्कि गरिमापूर्ण, सुरक्षित और मानवीय जीवन जीने का अधिकार भी निहित है। इसके साथ ही, शिक्षा के अधिकार और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के तहत यह राज्य और उसकी संस्थाओं का संवैधानिक कर्तव्य है कि वे उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले युवाओं को ऐसा सुरक्षित परिवेश दें, जहां उनके जीवन और स्वास्थ्य को कोई आसन्न खतरा न हो।

जब देश का सर्वोच्च नेतृत्व या विश्वविद्यालय प्रशासन लाखों छात्रों को कैंपस के भीतर पर्याप्त हॉस्टल उपलब्ध कराने में असमर्थ रहता है और उन्हें अनियंत्रित निजी बाजार के भरोसे छोड़ देता है, तो यह संवैधानिक दायित्वों से विमुख होने का मामला बन जाता है। दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे केंद्रीय संस्थान, जिनका संचालन सीधे तौर पर केंद्र सरकार के अनुदान और नीतियों से होता है, के पास राष्ट्रव्यापी बजट और संसाधन मौजूद हैं। इसके बावजूद दशकों से हॉस्टल सीटों की संख्या और छात्रों की बढ़ती संख्या के बीच खाई चौड़ी होती जा रही है। बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण, पुरानी इमारतों के स्ट्रक्चरल ऑडिट और छात्र आवास के लिए नीतिगत बजट आवंटन को प्राथमिकता सूची में सबसे नीचे रखना यह दर्शाता है कि संवैधानिक प्राथमिकताओं का स्तर क्या है।

राष्ट्रहित और भविष्य की दिशा

राष्ट्रहित की परिभाषा केवल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दरों, डिजिटल लेनदेन के आंकड़ों या कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की विकास गाथाओं तक सीमित नहीं हो सकती। राष्ट्रहित का सबसे पहला और ठोस पैमाना देश के युवा नागरिकों की सुरक्षा, उनका मानसिक और शारीरिक कल्याण तथा उनकी बौद्धिक ऊर्जा का सुरक्षित संरक्षण है। जब एक मेधावी छात्र किसी जर्जर इमारत के मलबे के नीचे अपनी जान गंवा देता है या गंभीर रूप से घायल होता है, तो यह केवल एक परिवार की व्यक्तिगत क्षति नहीं, बल्कि राष्ट्र की बौद्धिक पूंजी का अपूरणीय नुकसान है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र रहे हैं। इस नाते इस संस्थान के कण-कण से उनका भावनात्मक और वैचारिक जुड़ाव स्वाभाविक है। एक पूर्व छात्र के रूप में देश की सर्वोच्च सत्ता पर आसीन होना डीयू के वर्तमान छात्रों के लिए एक बड़ी उम्मीद हो सकता है, बशर्ते इस अधिकार और पद का उपयोग उन बुनियादी समस्याओं के समाधान में किया जाए जो हर साल हजारों विद्यार्थियों को संकट में डालती हैं।

इस संपूर्ण घटनाक्रम से यह स्पष्ट सबक मिलता है कि डिजिटल भारत और आधुनिक तकनीक के विमर्श के साथ-साथ ईंट-गारे की बुनियादी सुरक्षा, हॉस्टल निर्माण, किफायती आवास और छात्रों के जीवन की संरक्षा को राष्ट्रीय नीति के केंद्र में लाना होगा। यदि किसी छात्र का सपना किसी अवैध रूप से संचालित जर्जर इमारत के मलबे में दफ्न हो जाता है, तो देश के तमाम तकनीकी और आर्थिक आंकड़े अपनी प्रासंगिकता खो देते हैं। राष्ट्रहित की मांग है कि प्रतीकात्मक और राजनीतिक जुमलों से ऊपर उठकर, विश्वविद्यालयों के भीतर और आसपास एक सुरक्षित, मानवीय और जवाबदेह ढांचागत नीति का युद्धस्तर पर निर्माण किया जाए।

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