…..पण्डित प्रदीप शुक्ल
किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी संसद की भव्यता से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों की असहमति को सुनने की क्षमता से मापी जाती है। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का अधिकार नहीं देता; वह नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध, प्रश्न पूछने और सरकार से जवाब मांगने का संवैधानिक अधिकार भी देता है। जब यही अधिकार संदेह, अविश्वास या टकराव के घेरे में आ जाए, तब यह केवल एक आंदोलन का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की संवेदनशीलता का प्रश्न बन जाता है।
राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) में कथित अनियमितताओं को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक द्वारा किया गया लंबा अनिश्चितकालीन उपवास इसी व्यापक लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है। समाचार एजेंसी पीटीआई सहित विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, शनिवार तड़के उन्हें जंतर-मंतर से हटाकर सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, जबकि उनके अनशन का इक्कीसवाँ दिन शुरू हो चुका था। इसी क्रम में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दिपके को हिरासत में लिए जाने तथा उनके साथ दुर्व्यवहार के आरोप भी सामने आए हैं। वहीं कुछ सोशल मीडिया पोस्टों में प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस की कठोर कार्रवाई के दावे किए गए हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि संबंधित एजेंसियों द्वारा होना अभी शेष है, किंतु यदि इनमें तथ्य हैं, तो यह स्थिति लोकतांत्रिक मूल्यों के संदर्भ में गंभीर चिंता का विषय है।
प्रश्न यह नहीं है कि आंदोलन का नेतृत्व कौन कर रहा है। प्रश्न यह है कि यदि देश का एक नागरिक, वह भी अहिंसक और संवैधानिक तरीके से, शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठता है, तो लोकतांत्रिक राज्य की पहली प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए? संवाद, संवेदना और समाधान—या प्रशासनिक बल?
भारत का संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा करने और अपनी बात रखने का अधिकार देता है। इन अधिकारों पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, किंतु किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की नैतिक शक्ति इस बात में निहित होती है कि वह विरोध को शत्रुता में नहीं बदलती। असहमति लोकतंत्र का ऑक्सीजन है; यदि उसी को नियंत्रित करने की प्रवृत्ति विकसित होने लगे, तो लोकतंत्र का श्वसन तंत्र कमजोर होने लगता है।
इस पूरे प्रकरण का सबसे संवेदनशील पक्ष यह है कि इसका केंद्र शिक्षा है। शिक्षा किसी भी राष्ट्र के भविष्य की आधारशिला होती है। यदि परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं, यदि लाखों विद्यार्थियों और उनके परिवारों में अविश्वास पैदा होता है, तो सरकार का दायित्व केवल यह कहना नहीं रह जाता कि व्यवस्था ठीक है। उसे पारदर्शी जांच, उत्तरदायित्व और विश्वास बहाली के ठोस उपाय भी प्रस्तुत करने पड़ते हैं।
नीट केवल एक परीक्षा नहीं है; यह लाखों युवाओं के जीवन, उनके सपनों और उनके परिवारों की वर्षों की मेहनत का प्रश्न है। ऐसी स्थिति में यदि कोई आंदोलन व्यापक जनसमर्थन प्राप्त करता है, तो उसे केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानना पर्याप्त नहीं होगा। उसे सामाजिक मनोविज्ञान और लोकतांत्रिक संवाद के संदर्भ में भी समझना होगा।
सोनम वांगचुक का सार्वजनिक जीवन इस बात का उदाहरण रहा है कि उन्होंने पर्यावरण, हिमालय, जलवायु परिवर्तन, स्थानीय समुदायों और शिक्षा जैसे विषयों पर लगातार आवाज़ उठाई है। कोई भी व्यक्ति उनके विचारों से सहमत या असहमत हो सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक समाज में किसी विचार से असहमति का उत्तर संवाद होना चाहिए, दमन नहीं।
इसी प्रकार यदि अभिजीत दिपके या अन्य प्रदर्शनकारियों द्वारा लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होना लोकतांत्रिक राज्य की जिम्मेदारी है। और यदि आरोप असत्य हैं, तो सरकार को भी तथ्यों के साथ पारदर्शी ढंग से स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। लोकतंत्र में सत्य का निर्धारण प्रचार से नहीं, तथ्यों और संस्थागत विश्वसनीयता से होता है।
आज भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ लोकतंत्र की गुणवत्ता केवल चुनावी बहुमत से नहीं आँकी जाएगी। उसकी परीक्षा इस बात से होगी कि सरकार अपने आलोचकों के साथ कैसा व्यवहार करती है; वह छात्रों की बेचैनी को कैसे सुनती है; और क्या वह नागरिक आंदोलनों को सुरक्षा की चुनौती मानती है या लोकतांत्रिक चेतना का स्वाभाविक विस्तार।
सरकारों को यह स्मरण रखना चाहिए कि इतिहास में अनेक जनांदोलनों को प्रारंभ में उपेक्षित, उपहासित या नियंत्रित करने का प्रयास किया गया, किंतु अंततः वही आंदोलन नीति परिवर्तन का आधार बने। लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि वह विरोध को समय रहते सुन ले, क्योंकि जो आवाज़ संवाद में नहीं सुनी जाती, वह अंततः व्यापक जनाक्रोश में बदल सकती है।
यह समय टकराव का नहीं, विश्वास निर्माण का है। सरकार यदि वास्तव में शिक्षा सुधार, पारदर्शिता और युवाओं के भविष्य के प्रति गंभीर है, तो उसे आंदोलनों को प्रतिद्वंद्वी नहीं, जनभावना का दर्पण मानना चाहिए। वहीं आंदोलनकारियों की भी जिम्मेदारी है कि वे शांतिपूर्ण और संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करें। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब सत्ता संयम रखे और विरोध भी मर्यादा बनाए रखे।
आज आवश्यकता इस बात की है कि परीक्षा प्रणाली पर उठे सभी प्रश्नों की निष्पक्ष जांच हो, आंदोलनकारियों के साथ हुए व्यवहार पर भी पारदर्शिता आए, और सरकार तथा नागरिक समाज के बीच संवाद की एक नई शुरुआत हो। क्योंकि किसी भी राष्ट्र का भविष्य पुलिस बैरिकेड से नहीं, बल्कि विश्वास के पुल से सुरक्षित होता है।
“लोकतंत्र की असली पहचान यह नहीं कि सत्ता कितनी शक्तिशाली है; बल्कि यह है कि वह सबसे कमजोर और सबसे असहमत नागरिक की आवाज़ को कितनी गरिमा से सुनती है।”

