“जेनरेशन अल्फ़ा का उभरता प्रतिरोध केवल स्कूल की समस्याओं के विरुद्ध नहीं, उस शासन-व्यवस्था के विरुद्ध लोकतांत्रिक चेतावनी है जो बच्चों को भविष्य तो कहती है, लेकिन वर्तमान में उनके अधिकारों की गारंटी नहीं दे पाती”
एक समय था जब बच्चे स्कूल से घर लौटते हुए अपनी कॉपियों, किताबों, बारिश, खेल और छुट्टी की बातें करते थे। अब देश के कई हिस्सों से ऐसी तस्वीरें आ रही हैं जिनमें वही बच्चे हाथों में तिरंगा लिये जिलाधिकारी कार्यालय तक मार्च कर रहे हैं, स्कूल में पानी, शौचालय, सड़क, बस किराया, सुरक्षित भवन, शिक्षक, छात्रवृत्ति और किताबों की मांग कर रहे हैं। यह दृश्य सामान्य नहीं है। यह लोकतंत्र के लिए गर्व का क्षण भी हो सकता है और शासन के लिए गहरी शर्म का भी।
उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में स्कूली बच्चों का लगभग पांच किलोमीटर पैदल मार्च कर पक्की सड़क की मांग करना इसी बदलते भारत का ताजा संकेत है। बच्चों ने तिरंगा उठाया और उस सड़क की मांग की जिस पर चलकर वे रोज स्कूल जाते हैं लेकिन इस दृश्य को केवल “बच्चों का प्रदर्शन” कह देना इस घटना के अर्थ को छोटा कर देना होगा।
“जब किसी देश के बच्चे स्कूल पहुँचने के लिए सड़क मांगने स्वयं सड़क पर उतरें, तो समस्या सड़क की नहीं रहती—समस्या शासन की प्राथमिकताओं की हो जाती है।” यही वह क्षण है जहाँ ‘जेनरेशन अल्फ़ा’ भारतीय लोकतंत्र के सामने एक नया प्रश्न बनकर खड़ी है।
जेनरेशन अल्फ़ा का पहला सवाल—हमारा भविष्य इतना असुरक्षित क्यों है?
“जेनरेशन अल्फ़ा” की सीमाएँ सर्वमान्य नहीं हैं; विभिन्न अध्ययनों में इसके जन्म-वर्ष अलग-अलग माने जाते हैं। सामान्यतः 2010 के आसपास जन्म लेने वाली नई पीढ़ी को इसका हिस्सा माना जाता है। यह वह पीढ़ी है जिसने इंटरनेट, स्मार्टफोन, डिजिटल माध्यमों और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अपने सामाजिक परिवेश का स्वाभाविक हिस्सा पाया है। भारत में इस पीढ़ी की संख्या करोड़ों नहीं, बल्कि सैकड़ों मिलियन में है; एक हालिया जनसांख्यिकीय अनुमान 2029 तक भारत में इसकी आबादी 41.7 करोड़ से अधिक बताता है।
इसका अर्थ केवल इतना नहीं कि भारत युवा रहेगा। इसका अर्थ यह है कि आज की सरकारी नीतियां अगले दो दशकों के भारत का सामाजिक चरित्र तय कर रही हैं।
यह पीढ़ी तकनीक की भाषा जानती है। सूचना को तुरंत खोज सकती है। वीडियो बना सकती है। स्थानीय समस्या को राष्ट्रीय विमर्श में ला सकती है। किसी प्रशासनिक कार्यालय तक पहुंचने से पहले ही अपने मोबाइल से दुनिया तक अपनी बात पहुंचा सकती है।
जिन बच्चों को पिछली पीढ़ियां “चुप रहो, बड़े बोल रहे हैं” कहकर चुप करा देती थीं, वे बच्चे अब पूछ रहे हैं—“हमारे बारे में फैसला हमसे बिना पूछे क्यों?”
- यह केवल डिजिटल दक्षता नहीं है।
- यह नागरिक चेतना का नया रूप है।
बच्चों को सिर्फ भविष्य कहना बंद कीजिए
भारतीय राजनीति में बच्चों के लिए एक बहुत सुविधाजनक वाक्य है—“बच्चे देश का भविष्य हैं।” यह वाक्य सुनने में सुंदर है, लेकिन अक्सर राजनीतिक रूप से सुविधाजनक भी। क्योंकि यदि बच्चे भविष्य हैं तो उनकी वर्तमान जरूरतों की जिम्मेदारी से बचा जा सकता है लेकिन संविधान बच्चे को केवल भविष्य नहीं मानता। वह उसे आज का अधिकार-संपन्न नागरिक मानता है। अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। अनुच्छेद 21-A छह से चौदह वर्ष की आयु के बच्चों के लिए शिक्षा का मौलिक अधिकार सुनिश्चित करता है। राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 39(f), 45 और 47 बाल-विकास, प्रारंभिक देखभाल तथा पोषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति राज्य की जिम्मेदारी को रेखांकित करते हैं।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम केवल प्रवेश का अधिकार नहीं देता; वह विद्यालयी वातावरण, शिक्षक, आधारभूत सुविधाओं और बच्चे के सम्मान से जुड़े न्यूनतम मानकों का एक वैधानिक ढांचा भी बनाता है। अर्थात किसी बच्चे का प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि “क्या सरकार हमें पढ़ने देगी?”
उसका प्रश्न होना चाहिए—“जिस शिक्षा की गारंटी संविधान देता है, उसकी गुणवत्ता और गरिमा कहाँ है?” यही अंतर कल्याणकारी राज्य और अधिकार-आधारित राज्य के बीच है।
स्कूल की टूटी सड़क से संसद की राजनीति तक
हमीरपुर के बच्चों का मार्च किसी एक गांव की कहानी नहीं है। फतेहपुर में करीब 1,500 छात्रों ने स्वच्छ पानी, शौचालय, पंखे, फर्नीचर और अन्य बुनियादी सुविधाओं के लिए घंटों धरना दिया; रिपोर्ट के अनुसार प्रशासन को उनकी मांगों पर कार्रवाई का आश्वासन देना पड़ा। यह सवाल पूछना चाहिए कि जिन सुविधाओं को स्कूल की प्रशासनिक व्यवस्था बिना किसी आंदोलन के दे सकती थी, उन्हें पाने के लिए बच्चों को प्रदर्शन क्यों करना पड़ा?
- क्या शौचालय एक आंदोलन की उपलब्धि है?
- क्या पंखा एक राजनीतिक रियायत है?
- क्या पीने का पानी किसी सरकार की कृपा है?
- क्या स्कूल तक सड़क कोई चुनावी वादा होना चाहिए?
अगर उत्तर “नहीं” है, तो फिर बच्चों को आंदोलन क्यों करना पड़ रहा है? इसका उत्तर सरकारी स्कूलों के बजट, निगरानी, स्थानीय प्रशासन और राजनीतिक प्राथमिकताओं में छिपा है।
विदिशा के बच्चे और लोकतंत्र की एक बड़ी विडंबना
मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के ककरौआ गांव के बच्चों की तस्वीर तो और भी भयावह है। वे बेतवा नदी पर बने चेक-डैम के कंक्रीट के खंभों से जोखिम भरा रास्ता पार करके स्कूल पहुंचते रहे। मामले पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार से कार्रवाई की विस्तृत योजना मांगी।
सोचिए।
एक तरफ हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर, डिजिटल इंडिया और अंतरिक्ष की बात कर रहे हैं।
दूसरी तरफ एक बच्चा स्कूल जाने के लिए नदी के ऊपर कंक्रीट के खंभों पर संतुलन बनाकर चल रहा है।
“यही भारत का वास्तविक विकास-अंतर है—एक भारत भविष्य की तकनीक बना रहा है और दूसरा भारत स्कूल पहुँचने के लिए प्रकृति से जूझ रहा है।”
दोनों भारत एक ही संविधान के भीतर रहते हैं। दोनों पर एक ही सरकारों का शासन है; फिर यह असमानता कहाँ से पैदा होती है?
अगर खबर के बाद सड़क बनती है, तो शासन पहले कहाँ था?
विदिशा के इस मामले का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है। मीडिया रिपोर्ट सामने आने के बाद मामला अदालत तक पहुँचा और प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न संस्थागत रूप से उठा। यह इस बात का प्रमाण है कि जनहित पत्रकारिता अभी भी व्यवस्था को झकझोर सकती है। इसीलिए स्वतंत्र मीडिया केवल “खबर” नहीं है। वह लोकतंत्र की सार्वजनिक निगरानी व्यवस्था है।
- जब स्थानीय अधिकारी नहीं सुनते, तब पत्रकार सुनता है।
- जब विभाग फाइल दबा देता है, तब कैमरा उसे सामने लाता है।
- जब प्रशासन अपनी रिपोर्ट में सब कुछ सामान्य बताता है, तब जमीनी तस्वीर असली कहानी कहती है।
लेकिन यहां मीडिया की अपनी परीक्षा भी है। यदि समाचार संस्थान बच्चों की सड़क से अधिक नेताओं के बयान को महत्व देंगे, स्कूल की टूटी छत से अधिक चुनावी रणनीति को महत्व देंगे और पोषण से अधिक राजनीतिक नारे को महत्व देंगे, तो लोकतंत्र की प्राथमिकताएं भी विकृत होंगी।
जनहित पत्रकारिता का अर्थ यही है कि सत्ता के बड़े मंचों से नीचे उतरकर उस भारत को देखा जाए जहाँ नागरिकों की सबसे छोटी मांगें भी कभी-कभी सबसे बड़े संघर्ष बन जाती हैं।
छत गिरती है तो केवल भवन नहीं गिरता
राजस्थान के झालावाड़ के पिपलोदी में 25 जुलाई 2025 को सरकारी स्कूल की इमारत का हिस्सा गिरने से सात बच्चों की मौत हुई और दर्जनों घायल हुए। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी इस घटना पर स्वतः संज्ञान लिया था।
अब महाराष्ट्र के सोलापुर में स्कूल की छत का स्लैब गिरने से 13 छात्रों के घायल होने की खबर सामने आई है। दोनों घटनाओं के बीच समय का अंतर हो सकता है, राज्यों का अंतर हो सकता है, प्रशासनिक संरचनाओं का अंतर हो सकता है, लेकिन प्रश्न एक ही है—”क्या गरीब बच्चों के स्कूलों की सुरक्षा राज्य की सर्वोच्च प्राथमिकता है?”
क्योंकि जिस बच्चे के माता-पिता उसे स्कूल भेजते समय यह सोचें कि कहीं छत न गिर जाए, वह शिक्षा नहीं ले रहा—वह अपने जीवन को राज्य की दक्षता के भरोसे सौंप रहा है। विद्यालय भवन केवल ईंट, सीमेंट और लोहे का ढांचा नहीं। वह राज्य की ओर से बच्चे के प्रति एक मौन वादा है— “तुम यहां सुरक्षित हो।” उस छत का गिरना उस वादे का गिरना है।
भोजन में चावल है, पोषण कहाँ है?
शिक्षा की त्रासदी केवल टूटी इमारतों तक सीमित नहीं है। मध्याह्न भोजन के नाम पर सूखे चावल, नमक के साथ रोटी या अपर्याप्त भोजन की तस्वीरें समय-समय पर सामने आती रही हैं।
जब स्कूल आने वाला गरीब बच्चा ऐसी थाली पाता है जिसमें पेट भरने की क्षमता भी संदिग्ध हो और पोषण का सवाल उससे भी बड़ा हो, तब यह केवल खाद्य-वितरण की कमी नहीं रहती। यह सामाजिक न्याय की परीक्षा बन जाती है।
प्रधानमंत्री पोषण योजना के तहत भोजन के पोषण मानक निर्धारित हैं। प्राथमिक स्तर पर निर्धारित भोजन में 450 किलो कैलोरी और 12 ग्राम प्रोटीन का लक्ष्य है। यानी राज्य से अपेक्षा यह नहीं कि वह बच्चे को किसी तरह कुछ खिला दे; अपेक्षा यह है कि वह पोषण-सम्मत भोजन उपलब्ध कराए।
बच्चे की थाली दान की थाली नहीं है। वह अधिकार की थाली है और किसी गरीब बच्चे को भोजन देते समय उसके चेहरे पर यह एहसास पैदा करना कि “तुम्हें यह मिल रहा है क्योंकि सरकार तुम पर कृपा कर रही है”—एक लोकतांत्रिक समाज के लिए इससे बड़ा अपमान क्या होगा?
दिव्यांग बच्चे जब आंदोलन करते हैं तो समाज को अपनी संवेदना पर शर्म आनी चाहिए
देहरादून के दृष्टिबाधित छात्रों का आंदोलन इस बहस को एक और गहराई देता है। उन्होंने छात्रवृत्ति, लैपटॉप, भोजन की गुणवत्ता, ब्रेल शिक्षकों, समय पर किताबें और कौशल-विषयों के लिए पर्याप्त शिक्षकों की मांग की। सप्ताह भर चले उनके विरोध के बाद अधिकारियों को कई मांगों को स्वीकार करने की दिशा में कदम उठाने पड़े। यह सामान्य मांगों की सूची नहीं है। यह उस विद्यार्थी की सूची है जिसे समाज पहले से ही जीवन की कई बाधाओं के बीच शिक्षा तक पहुंचने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
जिस बच्चे को देखने के लिए आंखों की जगह ब्रेल चाहिए, उसे ब्रेल शिक्षक भी न मिले;
जिसे डिजिटल दुनिया में सक्षम बनाने के लिए लैपटॉप चाहिए, उसे तकनीक से वंचित रखा जाए;
जिसे कौशल सीखना है, उसे शिक्षक न मिले—तो दोष बच्चे की अक्षमता में नहीं, व्यवस्था की अक्षमता में है। “विकलांगता बच्चे की नहीं, व्यवस्था की भी हो सकती है।”
एक सभ्य राज्य वह नहीं जो दिव्यांग बच्चों पर सहानुभूति व्यक्त करे। सभ्य राज्य वह है जो उन्हें ऐसी व्यवस्था दे जिसमें सहानुभूति की जरूरत ही कम पड़े।
बच्चों की आवाज़ को “राजनीति” कहकर खारिज मत कीजिए
यह संभव है कि कुछ आंदोलनों को राजनीतिक समूह प्रभावित करें। यह भी संभव है कि सोशल मीडिया किसी स्थानीय समस्या को बढ़ाकर प्रस्तुत करे। इसलिए हर वायरल वीडियो को स्वतः अंतिम सत्य मानना पत्रकारिता नहीं है लेकिन दूसरी तरफ हर बच्चों के प्रदर्शन को “किसी के बहकावे” का परिणाम बता देना भी उतना ही खतरनाक है। एक लोकतांत्रिक सरकार को प्रश्न के स्रोत से ज्यादा प्रश्न की सच्चाई में रुचि होनी चाहिए।
- अगर बच्चे कह रहे हैं कि पानी नहीं है—तो पानी की जांच कराइए।
- अगर वे कह रहे हैं कि शौचालय खराब हैं—तो शौचालय देखिए।
- अगर वे सड़क मांग रहे हैं—तो सड़क की स्थिति देखिए।
- अगर छत जर्जर है—तो इंजीनियरिंग ऑडिट कराइए।
- अगर भोजन खराब है—तो नमूना जांचिए।
- और अगर छात्रवृत्ति नहीं मिली—तो सूची सार्वजनिक कीजिए।
“बच्चे किस विचारधारा से प्रभावित हैं, यह बाद का प्रश्न है; उनकी शिकायत सच है या नहीं, यह पहला प्रश्न है।”
यह पीढ़ी केवल मोबाइल नहीं उठाती, सवाल भी उठाती है
जेनरेशन अल्फ़ा को लेकर एक रूढ़ छवि है—ये स्क्रीन में डूबी पीढ़ी है, ध्यान कम है, वास्तविक दुनिया से दूरी ज्यादा है लेकिन हालिया घटनाएं एक दूसरी तस्वीर दिखा रही हैं।
ये बच्चे डिजिटल युग के हैं, इसलिए वे जानकारी को तेजी से जोड़ सकते हैं। वे देखते हैं कि कहीं कोई सड़क बनी, किसी राज्य में छात्रवृत्ति बढ़ी, किसी विद्यालय में सुविधाएं बेहतर हुईं, किसी अदालत ने किसी प्रशासन को जवाब देने को कहा—तो वे अपने इलाके की स्थिति की तुलना भी करने लगते हैं, इसलिए आने वाले वर्षों में नागरिक अपेक्षा का स्तर बढ़ेगा।
सरकारें यदि यह समझती हैं कि पुरानी तरह से आश्वासन देकर, उद्घाटन कराकर और कुछ घोषणाएं करके काम चलता रहेगा, तो शायद वे उस पीढ़ी की मानसिकता को ठीक से नहीं पढ़ रही हैं।
यह पीढ़ी पूछेगी— “जब यह हो सकता है, तो हमारे यहां क्यों नहीं?” और यही प्रश्न लोकतंत्र का सबसे शक्तिशाली इंजन है।
इसे आंदोलन नहीं, नागरिक शिक्षा समझिए
विडंबना यह है कि हम बच्चों को नागरिक शास्त्र की किताब में लोकतंत्र पढ़ाते हैं—अधिकार, कर्तव्य, समानता, न्याय, संविधान, स्थानीय शासन, जनभागीदारी।
फिर जब वही बच्चा अपने गांव की सड़क के लिए आवेदन करता है, सुनवाई न होने पर सामूहिक रूप से आवाज उठाता है, जिला प्रशासन तक जाता है और मीडिया को बुलाता है, तो हम उसे “उपद्रवी” कहने लगते हैं। किताब में पढ़ाया गया लोकतंत्र अगर जिंदगी में इस्तेमाल करना अपराध बन जाए, तो समस्या बच्चे में नहीं है।
हाँ, बच्चों के आंदोलनों में सुरक्षा, अभिभावकीय मार्गदर्शन और कानून का सम्मान आवश्यक है। हिंसा या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान की अनुमति लोकतंत्र नहीं देता। लेकिन शांतिपूर्ण सामूहिक अभिव्यक्ति, शिकायत और प्रशासन से जवाब मांगना लोकतांत्रिक नागरिकता के विरुद्ध नहीं है।
संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय भी बच्चों को उन मामलों में अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार देता है जो उन्हें प्रभावित करते हैं, उनकी उम्र और परिपक्वता के अनुरूप उनकी बात को महत्व दिए जाने की अपेक्षा करता है, इसलिए बच्चे की आवाज़ को सुनना केवल राजनीतिक शिष्टाचार नहीं— “बाल-अधिकारों की संस्कृति है।”
शिक्षा पर खर्च सिर्फ बजट नहीं, सभ्यता की परीक्षा है
हालिया UNESCO SDG 4 Scorecard के अनुसार भारत शिक्षा पर अपनी GDP का लगभग 4.1 प्रतिशत खर्च करता है, लेकिन कुल सरकारी खर्च में शिक्षा की हिस्सेदारी 14.2 प्रतिशत तक गिर गई है, जो 2015 के 15.7 प्रतिशत से कम है और UNESCO के 15 प्रतिशत के संदर्भ-बेंचमार्क से नीचे है।
इन आंकड़ों की व्याख्या करते समय यह भी याद रखना चाहिए कि GDP प्रतिशत और कुल सरकारी व्यय में हिस्सेदारी दो अलग सूचक हैं। फिर भी गिरती हुई सार्वजनिक प्राथमिकता का संकेत गंभीर है। शिक्षा वह क्षेत्र है जहाँ आज बचाया गया रुपया कल महंगी सामाजिक समस्या बनकर लौटता है।
- कम शिक्षक आज—कम कौशल कल।
- कम पोषण आज—कम उत्पादकता कल।
- जर्जर स्कूल आज—मानव पूंजी का क्षरण कल।
- अपर्याप्त छात्रवृत्ति आज—शिक्षा से बाहर होता बच्चा कल।
- इसलिए शिक्षा पर खर्च “कल्याण” नहीं है।
- यह राष्ट्र की उत्पादक क्षमता का निवेश है।
गरीब बच्चे हमेशा सबसे पहले क्यों वंचित होते हैं?
यह प्रश्न भी पूछा जाना चाहिए कि स्कूलों की जर्जर इमारतें, खराब सड़कें, अपर्याप्त परिवहन, पोषण की कमी और शिक्षक-संसाधनों का संकट अधिकांशतः किन बच्चों के हिस्से में आता है।
- उन बच्चों के, जिनके माता-पिता निजी स्कूल की फीस नहीं दे सकते।
- उन बच्चों के, जिनके पास स्कूल तक सुरक्षित परिवहन नहीं है।
- उन बच्चों के, जिनके घर में पढ़ने के लिए अलग कमरा नहीं।
- उन बच्चों के, जिनके लिए सरकारी स्कूल ही पूरी दुनिया है।
इसलिए सरकारी स्कूल का संकट केवल शिक्षा विभाग का संकट नहीं है। यह वर्गीय असमानता का प्रश्न है। समृद्ध परिवार अपने बच्चों को खराब सड़क से बचा सकता है।
- निजी वाहन से स्कूल भेज सकता है।
- महंगा भोजन दे सकता है।
- कोचिंग दे सकता है।
- खराब शिक्षक की भरपाई ट्यूशन से कर सकता है।
लेकिन गरीब परिवार नहीं। इसलिए सरकारी स्कूल की हर विफलता सबसे पहले गरीब बच्चे की संभावना पर हमला करती है।
भारत को यह तय करना होगा कि वह कैसी युवा शक्ति चाहता है
भारत लंबे समय तक दुनिया की युवा आबादी वाले प्रमुख देशों में रहेगा। यह जनसांख्यिकीय लाभांश अपने आप आर्थिक लाभांश नहीं बनता। युवा आबादी संख्या है।
शिक्षित, स्वस्थ, कुशल और आत्मविश्वासी युवा पूंजी हैं। यदि बच्चे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पर्याप्त पोषण, सुरक्षित विद्यालय, डिजिटल पहुंच, खेल, मानसिक स्वास्थ्य सहयोग और कौशल से वंचित रह गए तो भारत के पास एक बड़ी युवा आबादी जरूर होगी, लेकिन जरूरी नहीं कि वह बड़ी उत्पादक शक्ति बने। एक देश के सामने दो भविष्य हो सकते हैं।
एक—जहाँ आज के बच्चे कल के वैज्ञानिक, शिक्षक, उद्यमी, किसान, कलाकार, सैनिक, तकनीशियन और नागरिक बनें।
दूसरा—जहाँ शिक्षा में असमानता, बेरोजगारी, सामाजिक अविश्वास और अवसरों की कमी एक विशाल असंतुष्ट युवा आबादी तैयार करे।
जनसांख्यिकी दोनों की संभावना देती है। निर्णय राजनीति करेगी।
अब सरकारों को बच्चों से डरना नहीं, उनसे सीखना चाहिए
इन छोटे-छोटे आंदोलनों में एक बड़ी नैतिक शिक्षा छिपी है। बच्चे नेताओं की कुर्सी नहीं मांग रहे।
- वे मंत्री पद नहीं मांग रहे।
- वे टिकट नहीं मांग रहे।
- वे जातीय समीकरण नहीं पूछ रहे।
- वे मंदिर-मस्जिद की राजनीति नहीं कर रहे।
वे पूछ रहे हैं—
- सड़क कब बनेगी?
- शिक्षक कब आएंगे?
- पानी कब मिलेगा?
- शौचालय कब ठीक होगा?
- स्कूल की छत कब सुरक्षित होगी?
- किताबें कब मिलेंगी?
- भोजन कब सम्मान से मिलेगा?
- छात्रवृत्ति कब आएगी?
इससे बड़ा एजेंडा किसी लोकतंत्र का क्या हो सकता है? और शायद इसी कारण जेनरेशन अल्फ़ा का यह उभरता प्रतिरोध भारतीय राजनीति के लिए एक चेतावनी भी है। आज ये बच्चे जिलाधिकारी के दरवाजे पर खड़े हैं। कल यही बच्चे मतदाता होंगे। परसों यही नीति बनाएंगे, और उसके बाद यही तय करेंगे कि उन्हें अपनी अगली पीढ़ी के लिए किस तरह का भारत बनाना है।
कालजयी सवाल
भारत के सामने आज केवल यह सवाल नहीं है कि जेनरेशन अल्फ़ा कितनी बड़ी होगी। बड़ा सवाल यह है कि “हम उस पीढ़ी के साथ क्या कर रहे हैं?”
- हम उन्हें स्क्रीन दे रहे हैं या शिक्षा?
- हम उन्हें डेटा दे रहे हैं या अवसर?
- हम उन्हें राष्ट्रवाद के नारे दे रहे हैं या सुरक्षित विद्यालय?
- हम उन्हें भविष्य के सपने दे रहे हैं या वर्तमान की बुनियादी सुविधाएं?
- हम उन्हें “देश का भविष्य” कहकर गौरवान्वित कर रहे हैं या उनके वर्तमान की जिम्मेदारी स्वीकार कर रहे हैं?
क्योंकि कोई भी राष्ट्र अपने बच्चों को भाषणों से महान नहीं बनाता।
उन्हें महान बनाती हैं—सुरक्षित स्कूल, अच्छे शिक्षक, पौष्टिक भोजन, निष्पक्ष अवसर, स्वतंत्र विचार, गरिमापूर्ण व्यवहार और वह शासन जो उनकी आवाज़ सुन सके; और यदि जेनरेशन अल्फ़ा आज सड़क पर उतर रही है, तो हमें उससे डरने की जरूरत नहीं।
हमें अपने आईने में देखने की जरूरत है। “क्योंकि बच्चे जब अपने अधिकार मांगने के लिए स्कूल की घंटी छोड़कर सड़क पर उतरते हैं, तो समझ लेना चाहिए—वे केवल व्यवस्था के खिलाफ खड़े नहीं हुए हैं; वे उस भारत का दरवाज़ा खटखटा रहे हैं जिसे हमने उनके नाम पर बनाने का वादा किया था।”
और इस युग की सबसे संवेदनशील सच्चाई शायद यही है—“जिस देश में बच्चे किताबें लेकर स्कूल जाने के बजाय अपने हक़ की तख्तियां लेकर सड़क पर उतरने लगें, वहाँ असफल केवल शिक्षा-व्यवस्था नहीं होती—वहाँ भविष्य की पीढ़ी वर्तमान सत्ता से अपना हिसाब मांगना शुरू कर देती है।”

