…प्रदीप कुमार नायक
आजकल हर टीवी चैनल, अखबार और मोबाइल की स्क्रीन पर एक ही सवाल तैर रहा है,क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इंसानों के लिए सबसे बड़ा खतरा बनने वाला है। कहा जा रहा है सावधान, किलर AI आने वाला है। आम आदमी के लिए ये एक सनसनी भरी खबर लग सकती है, लेकिन जो लोग तकनीक और दुनिया की राजनीति को करीब से देख रहे हैं उनके लिए ये चेतावनी अब सिर्फ सनसनी नहीं है, ये हकीकत बनकर दरवाजे पर खड़ी है।
कुछ साल पहले तक हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को एक मददगार के तौर पर देखते थे, जो हमारा मौसम बताएगा, गाना चलाएगा या सर्च करने में मदद करेगा। लेकिन पिछले दो साल में जिस रफ्तार से इस तकनीक ने छलांग लगाई है उसने दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिकों तक को डरा दिया है। दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों के मालिकों ने खुद एक खुले पत्र पर दस्तखत करके कहा है कि AI से इंसानियत के खत्म होने का खतरा उतना ही बड़ा है जितना परमाणु बम से है। ये बात हवा में नहीं कही गई है। इसके पीछे ठोस कारण हैं।
असल में किलर AI का मतलब वो रोबोट नहीं है जो फिल्मों की तरह बंदूक लेकर गली में घूमेगा। किलर AI का सबसे खतरनाक रूप वो है जो दिखता ही नहीं। वो एक छोटा सा ड्रोन हो सकता है जो खुद तय कर ले कि उसे किसे मारना है। इंसान सिर्फ उसे कमांड देगा और वो अपना निशाना खुद ढूंढ लेगा। दुनिया के कई युद्ध क्षेत्रों में ऐसे हथियारों का इस्तेमाल शुरू भी हो चुका है। जहाँ मशीन खुद तय कर दे कि कौन दुश्मन है और कौन नहीं, वहाँ इंसानियत का कानून खत्म हो जाता है। संयुक्त राष्ट्र पिछले तीन साल से इसे रोकने के लिए कानून बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन बड़े देश मानने को तैयार नहीं हैं क्योंकि हर कोई इस हथियारों की दौड़ में आगे निकलना चाहता है।
दूसरा खतरा जो सीधे हमारे घर तक आ गया है वो है रोजगार का। मधुबनी जैसे जिले में भी अब दुकान का हिसाब, छात्र का प्रोजेक्ट, वकील की अर्जी और कई अखबारों की खबरें AI से लिखी जा रही हैं। AI थकता नहीं है, छुट्टी नहीं मांगता और दस हजार का काम दस सेकंड में कर देता है। ऐसे में उन लाखों युवाओं का क्या होगा जो सिर्फ टाइपिंग और सामान्य अकाउंट के भरोसे रोजगार ढूंढ रहे हैं। ये खतरा गोली से नहीं मारेगा, लेकिन भूख और बेरोजगारी से जरूर मार सकता है।
तीसरा और सबसे बड़ा खतरा जो बिहार के आने वाले चुनाव में हम सब देखेंगे वो है झूठ का। आज किसी भी नेता का चेहरा, आवाज लगाकर फर्जी वीडियो बनाया जा सकता है। एक ऐसा वीडियो जो देखने पर बिल्कुल असली लगे। पिछले लोकसभा चुनाव में ऐसे सैकड़ों वीडियो वायरल हुए। सोचिए अगर मतदान से एक दिन पहले किसी बड़े नेता का ऐसा फर्जी वीडियो आ जाए जिसमें वो चुनाव का बहिष्कार करने को कह रहा हो तो क्या होगा। AI झूठ को इतना असली बना देगा कि सच को साबित करना मुश्किल हो जाएगा।
अब सवाल है कि क्या हमें AI से डरकर उसे बंद कर देना चाहिए। मेरा मानना है नहीं। मैंने चालीस साल की पत्रकारिता में टाइपराइटर से लेकर कंप्यूटर और अब स्मार्टफोन तक का सफर देखा है। हर नई मशीन आई तो यही लगा कि अब पत्रकार खत्म हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मशीन ने हमारा काम आसान किया, खत्म नहीं किया। AI भी एक औजार है। चाकू से रसोई में सब्जी भी कटती है और गलत हाथ में वही चाकू जान भी ले सकता है। दोष चाकू का नहीं, हाथ का है।
समस्या AI में नहीं, उसके बेलगाम इस्तेमाल में है। यूरोप ने इसीलिए दुनिया का पहला AI कानून बना दिया है। वहाँ हर कंपनी को बताना पड़ेगा कि उसका AI क्या कर सकता है और क्या नहीं। भारत में अभी तक इस पर कोई सख्त कानून नहीं है। सिर्फ एक सलाह है कि कंपनियां खुद ध्यान रखें। ये काफी नहीं है। भारत जैसे देश में जहाँ एक अफवाह पर दंगे हो जाते हैं, वहाँ AI से बने कंटेंट पर AI Generated का ठप्पा लगना अनिवार्य होना चाहिए और युद्ध में इंसान की मंजूरी के बिना मारने वाले हथियारों पर पूरी तरह रोक लगनी चाहिए।
अंत में एक बात जमीनी तौर पर कहूंगा। AI के पास अथाह जानकारी है, लेकिन उसके पास आंख नहीं है। वो राजनगर की उस सड़क को नहीं देख सकता जहाँ नाले का पानी बीच सड़क पर बह रहा है और लोग गिर रहे हैं। वो उस गुस्से को नहीं समझ सकता जो एक किसान को अपनी फसल का दाम न मिलने पर आता है। वो रिपोर्ट लिख सकता है, लेकिन जमीनी आवाज नहीं बन सकता। इसलिए AI पत्रकार की नौकरी नहीं ले सकता, लेकिन जो पत्रकार AI सीख लेगा वो बाकियों से आगे जरूर निकल जाएगा। AI से डरना नहीं है, उसे साधना है, ताकि कलम और तकनीक दोनों मिलकर जनता की आवाज बन सकें।

