15 अगस्त 2026 को भारत अपनी स्वतंत्रता के 79 वर्ष पूर्ण कर रहा है। यह केवल कैलेंडर की एक तिथि नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक यात्रा की 79वीं वर्षगाँठ है जिसके लिए अनगिनत ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना वर्तमान, अपना सुख, अपना परिवार और कभी-कभी अपना जीवन तक राष्ट्र के भविष्य के नाम कर दिया था।
15 अगस्त 1947 को जब पराधीनता की लंबी रात्रि के बाद भारत ने स्वतंत्र आकाश में पहली साँस ली होगी, तब शायद किसी ने कल्पना भी न की होगी कि आने वाले 79 वर्षों में यह देश अभावों, अकालों, युद्धों, राजनीतिक उथल-पुथल, सामाजिक विषमताओं और अनेक संकटों को पार करता हुआ विज्ञान, तकनीक, कृषि, अंतरिक्ष, उद्योग, लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था की अनेक ऊँचाइयों तक पहुँचेगा। लेकिन हर स्वतंत्रता दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं होना चाहिए। यह आत्मपरीक्षण का भी दिन है।
हमें अपने आप से पूछना होगा—इन 79 वर्षों में हमने क्या पाया? हमने क्या खोया? कौन-से सपने पूरे हुए? कौन-से सपने अधूरे हैं? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या वह लोकतंत्र, जिसके लिए हमारे संविधान-निर्माताओं ने इतनी आशा और विश्वास के साथ व्यवस्था निर्मित की थी, आज भी उतना ही जीवंत, उदार, न्यायपूर्ण और जनोन्मुख है?
किसी राष्ट्र की प्रगति केवल उसकी अर्थव्यवस्था के आकार से नहीं मापी जाती। उसका वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होता है कि उसके सबसे कमजोर नागरिक का जीवन कितना सुरक्षित, सम्मानपूर्ण और आशापूर्ण है।
स्वतंत्रता हमें विरासत में नहीं मिली थी
भारत की स्वतंत्रता किसी शासक की कृपा से प्राप्त उपहार नहीं थी। उसके पीछे एक दीर्घ संघर्ष था—कहीं सत्याग्रह था, कहीं असहयोग, कहीं स्वदेशी, कहीं क्रांतिकारी प्रतिरोध, कहीं किसान और मजदूर आंदोलनों का स्वर, कहीं जेलों की अंधेरी कोठरियाँ और कहीं फाँसी के तख्ते पर मुस्कराते हुए युवा।
महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, डॉ. भीमराव अम्बेडकर, मौलाना आज़ाद, सुभाषचन्द्र बोस, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद, अशफाक उल्ला खाँ, रामप्रसाद बिस्मिल और असंख्य अन्य नाम हमारे इतिहास में अंकित हैं; पर स्वतंत्रता की वास्तविक गाथा केवल प्रसिद्ध नेताओं की गाथा नहीं है। इसके पीछे वह सामान्य भारतीय भी था जिसने विदेशी वस्त्र छोड़े, जेल गया, लाठियाँ खाईं, करों का विरोध किया, आंदोलनकारियों को आश्रय दिया और अपने छोटे-से जीवन में स्वतंत्र भारत का सपना सँजोए रखा। इसलिए आज़ादी के 79 वर्षों का लेखा-जोखा करते समय सबसे पहले उस पीढ़ी के प्रति कृतज्ञ होना हमारा नैतिक दायित्व है। उन्होंने हमें केवल स्वतंत्र भारत नहीं दिया; उन्होंने हमें अपने भाग्य का निर्माता बनने का अधिकार दिया।
स्वतंत्रता के साथ मिला लोकतंत्र और संविधान
स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि इतनी विशाल विविधता वाले देश को किस प्रकार एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में संगठित किया जाए।
भाषाएँ अनेक थीं, धर्म अनेक थे, जातीय-सांस्कृतिक पहचानें अनेक थीं, रियासतें अलग-अलग थीं और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ अत्यंत विषम थीं। फिर भी भारत ने लोकतंत्र को चुना। यह निर्णय अपने आप में आधुनिक भारत की सबसे महान उपलब्धियों में से एक था।
रियासतों का एकीकरण, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की स्थापना, संविधान का निर्माण और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना—इन सबने भारत की गणतांत्रिक यात्रा की नींव रखी।
26 जनवरी 1950 को लागू हुआ संविधान केवल शासन चलाने का दस्तावेज नहीं था; वह भारतीय नागरिक और राज्य के बीच एक नैतिक-सांवैधानिक अनुबंध था। उसकी प्रस्तावना में न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को लोकतांत्रिक भारत के मूल आदर्शों के रूप में प्रतिष्ठित किया गया।
यहाँ एक तथ्यात्मक संशोधन आवश्यक है। संविधान को “विश्व का सर्वश्रेष्ठ संविधान” कहना वस्तुनिष्ठ तथ्य नहीं, एक मूल्यांकन है। अधिक उचित यह कहना होगा कि भारतीय संविधान विश्व के सबसे विस्तृत, व्यापक और सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा रखने वाले संविधानों में से एक है। और इसकी सबसे बड़ी शक्ति केवल इसके शब्दों में नहीं, बल्कि इस बात में है कि यह नागरिक को राज्य के सामने अधिकार-संपन्न व्यक्ति के रूप में स्थापित करता है।
हमारे मौलिक अधिकार : लोकतंत्र की आत्मा
भारतीय संविधान के भाग III में प्रमुख मौलिक अधिकारों में समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14–18), स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19–22), शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23–24), धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25–28), सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अधिकार (अनुच्छेद 29–30) और संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32) शामिल हैं।
शिक्षा का अधिकार अब अलग से अनुच्छेद 21A में 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित है। इसे संविधान में 86वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया था।
इसी प्रकार, संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं है। 44वें संविधान संशोधन के बाद इसे संविधान के अनुच्छेद 300A के अंतर्गत संवैधानिक अधिकार के रूप में रखा गया है।
और एक महत्वपूर्ण बात—मौलिक अधिकारों को ऐसा निरपेक्ष अधिकार मानना भी ठीक नहीं कि उन्हें किसी परिस्थिति में सीमित नहीं किया जा सकता। संविधान स्वयं अनेक अधिकारों पर युक्तिसंगत प्रतिबंधों की व्यवस्था करता है। फिर भी इन अधिकारों का मूल उद्देश्य स्पष्ट है—राज्य शक्तिशाली हो सकता है, लेकिन नागरिक अधिकार-विहीन नहीं।
‘जीने का अधिकार’ केवल साँस लेने का अधिकार नहीं
अनुच्छेद 21 भारतीय संविधान की सबसे जीवंत धाराओं में से एक बन चुका है। सर्वोच्च न्यायालय ने समय के साथ इसके अर्थ को व्यापक किया है। जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने का अधिकार नहीं, बल्कि गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार है। न्यायालय ने इसके दायरे में स्वास्थ्य, स्वच्छ एवं सुरक्षित वातावरण, पर्याप्त पोषण, आवास और मानवीय गरिमा जैसे पहलुओं को भी जोड़ा है। यही वह बिंदु है जहाँ संविधान हमारे सामने सबसे कठिन प्रश्न रखता है।
क्या केवल जीवित रहना पर्याप्त है? क्या जीवन तब पूर्ण कहा जा सकता है जब किसी बच्चे के पास गुणवत्तापूर्ण शिक्षा न हो? जब गरीब परिवार बीमारी के सामने आर्थिक रूप से टूट जाए? जब किसी परिवार के पास सुरक्षित आवास न हो? जब रोजगार का अवसर अस्थिर हो? जब स्वच्छ जल और स्वच्छ वातावरण सहज रूप से उपलब्ध न हो? जब महिला अपने घर से लेकर सार्वजनिक स्थान तक स्वयं को सुरक्षित न महसूस करे?
संविधान हमें इन प्रश्नों से बचने नहीं देता। वह हमें बार-बार याद दिलाता है कि लोकतंत्र का अंतिम लक्ष्य सत्ता का परिवर्तन नहीं, मनुष्य के जीवन का सम्मान है।
तो इन 79 वर्षों में हमने क्या पाया?
भूख से खाद्य-सुरक्षा तक
स्वतंत्रता के समय भारत एक गंभीर खाद्य संकट से जूझता था। आज वही देश खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता के साथ विश्व के बड़े कृषि उत्पादक देशों में खड़ा है। हरित क्रांति ने भारतीय कृषि की दिशा बदल दी। सिंचाई, उर्वरक, उच्च उपज वाले बीज, कृषि अनुसंधान और सार्वजनिक वितरण व्यवस्था ने देश को खाद्य-सुरक्षा की ओर बढ़ाया। आज सरकार की खाद्य-सुरक्षा व्यवस्था के अंतर्गत लगभग 81.35 करोड़ लोगों की अधिकतम लक्षित कवरेज है और लगभग 80.48 करोड़ लाभार्थी निःशुल्क खाद्यान्न व्यवस्था के अंतर्गत चिन्हित हैं। लेकिन यहाँ भी एक गहरी विडंबना है।
एक तरफ यह उपलब्धि है कि राज्य आज करोड़ों लोगों को खाद्यान्न उपलब्ध करा सकने में सक्षम है; दूसरी तरफ यह तथ्य हमें बेचैन भी करता है कि इतनी विशाल आबादी के लिए खाद्य-सुरक्षा का सार्वजनिक सहारा अभी आवश्यक है। इसलिए 80 करोड़ का आँकड़ा केवल गरीबी का प्रमाण नहीं है—क्योंकि NFSA कवरेज एक कानूनी लक्षित व्यवस्था है और सभी लाभार्थी समान आर्थिक स्थिति में नहीं होते—लेकिन यह हमें सामाजिक सुरक्षा की निरंतर आवश्यकता का एहसास अवश्य कराता है।
गरीबी घटी है, मगर गरीबी का प्रश्न समाप्त नहीं हुआ
भारत ने गरीबी कम करने के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। नीति आयोग के अनुसार 2015-16 से 2019-21 के बीच बहुआयामी गरीबी 24.8 प्रतिशत से घटकर 14.96 प्रतिशत हुई और 2022-23 के लिए इसके लगभग 11.28 प्रतिशत रहने का अनुमान दिया गया। नीति आयोग के आकलन के अनुसार 2013-14 से 2022-23 के बीच 24.8 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए। विश्व बैंक के नवीनतम उपलब्ध आँकड़ों में 2022 में प्रतिदिन 3 डॉलर (2021 PPP) की अंतरराष्ट्रीय रेखा पर भारत की गरीबी दर 5.3 प्रतिशत दर्ज है।
ये आँकड़े उपलब्धि की कहानी कहते हैं; लेकिन इनके साथ यह प्रश्न भी खड़ा होता है कि क्या आर्थिक प्रगति का लाभ हर वर्ग तक समान गति से पहुँचा है? यही वह जगह है जहाँ लोकतंत्र को केवल विकास की दर से आगे देखना होगा।
निरक्षरता से शिक्षा के विस्तार तक
1951 में भारत की साक्षरता दर लगभग 18 प्रतिशत थी। आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। PLFS 2023-24 के अनुसार 7 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग में देश की साक्षरता दर 80.9 प्रतिशत पहुँच चुकी है। यह परिवर्तन असाधारण है।
गाँवों तक विद्यालय पहुँचे, विश्वविद्यालयों का विस्तार हुआ, तकनीकी शिक्षा बढ़ी, IIT, IIM, AIIMS और अनेक उच्च शिक्षा संस्थान स्थापित हुए, डिजिटल शिक्षा का विस्तार हुआ। लड़कियों की शिक्षा में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई। लेकिन हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि कितने बच्चे विद्यालय पहुँचे; हमें यह भी पूछना चाहिए कि विद्यालय से निकलने वाला बच्चा वास्तव में कितना सक्षम, वैज्ञानिक दृष्टि वाला, नैतिक और स्वतंत्र चिंतन करने वाला नागरिक बन रहा है?
** साक्षरता और शिक्षा में अंतर है।
- किसी नाम को पढ़ लेना साक्षरता है;
- किसी सूचना की सत्यता परख सकना शिक्षा है।
- डिग्री प्राप्त करना शिक्षा का एक रूप है;
- सही और गलत के बीच विवेक कर पाना उसकी आत्मा है।
भारत की अगली छलाँग यहीं से तय होगी।
महिलाएँ : घर की चौखट से सार्वजनिक जीवन तक
स्वतंत्रता के बाद भारतीय महिला ने शिक्षा, प्रशासन, विज्ञान, राजनीति, सेना, खेल, चिकित्सा, उद्योग और अंतरिक्ष तक में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। आज यह परिवर्तन केवल प्रतीकात्मक नहीं है। PLFS 2023-24 के अनुसार 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की महिलाओं की श्रमबल भागीदारी दर 41.7 प्रतिशत थी, जो 2017-18 के 23.3 प्रतिशत से काफी अधिक है।
लोकतांत्रिक भागीदारी में भी महिलाओं की शक्ति बढ़ी है। 2024 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं का मतदान प्रतिशत 65.78 प्रतिशत रहा, जो पुरुषों के 65.55 प्रतिशत से थोड़ा अधिक था।
यह भारतीय लोकतंत्र की एक अत्यंत महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन महिला की वास्तविक स्वतंत्रता तब पूर्ण होगी जब शिक्षा और रोजगार के साथ उसे सुरक्षा, समान वेतन, सम्मान, न्याय और निर्णय लेने की बराबर स्वतंत्रता भी मिलेगी।
विज्ञान, तकनीक और नई अर्थव्यवस्था
भारत ने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में असाधारण यात्रा तय की है। परमाणु ऊर्जा से लेकर अंतरिक्ष कार्यक्रम तक, हरित क्रांति से लेकर सूचना-प्रौद्योगिकी तक और चंद्रयान से लेकर डिजिटल भुगतान तक—भारत ने विश्व-पटल पर अपनी विशिष्ट क्षमता सिद्ध की है।
मोबाइल और इंटरनेट ने समाज की संरचना ही बदल दी है। TRAI के अनुसार मार्च 2026 तक भारत में कुल इंटरनेट ग्राहकों की संख्या लगभग 109.28 करोड़ और ब्रॉडबैंड ग्राहकों की संख्या लगभग 106.59 करोड़ थी।
यह केवल तकनीकी आँकड़ा नहीं है; यह उस सामाजिक परिवर्तन का संकेत है जिसमें वह भारत, जहाँ कभी सूचना कुछ लोगों की संपत्ति थी, आज एक ऐसा देश बन चुका है जहाँ करोड़ों लोग हाथ में रखे उपकरण से ज्ञान, बैंकिंग, व्यापार और दुनिया से संवाद कर सकते हैं।
बिजली की पहुँच भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। विश्व बैंक के अनुसार 2023 में भारत की लगभग 99.5 प्रतिशत आबादी को बिजली तक पहुँच थी।
अर्थव्यवस्था : अभावग्रस्त गणराज्य से वैश्विक शक्ति तक
स्वतंत्रता के समय भारत की अर्थव्यवस्था अत्यंत कमजोर थी। आज भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में है। नवीनतम सरकारी आँकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की वास्तविक GDP वृद्धि 7.7 प्रतिशत आंकी गई है और वर्तमान कीमतों पर GDP लगभग ₹346.36 लाख करोड़ रहने का अनुमान है। लेकिन यहाँ भी सावधानी आवश्यक है।
GDP बढ़ना और नागरिक का जीवन बेहतर होना एक ही बात नहीं है। GDP हमें अर्थव्यवस्था का आकार बताता है; वह यह नहीं बताता कि खेतिहर मजदूर की आय कैसी है, किसी छोटे दुकानदार की क्रय-शक्ति कैसी है, किसी बेरोजगार युवा की चिंता कितनी गहरी है या किसी गरीब परिवार के लिए निजी अस्पताल का बिल कितना भयावह है। इसलिए आर्थिक विकास का अगला चरण समावेशी विकास होना चाहिए।
लेकिन हमने क्या खोया?
यही वह प्रश्न है जिससे स्वतंत्रता दिवस का आत्ममंथन प्रारंभ होता है। हमने बहुत कुछ पाया है, पर इस यात्रा में कुछ मूल्य भी क्षीण हुए हैं। सबसे पहली चिंता है—सामाजिक विश्वास का क्षरण।
भारत की शक्ति उसकी विविधता में रही है। हमारे गाँवों और शहरों में विभिन्न आस्थाओं, भाषाओं, जातियों और समुदायों ने सदियों तक एक-दूसरे के साथ जीवन जिया है। आज भी करोड़ों भारतीयों के दैनिक जीवन में यह सहअस्तित्व जीवित है। लेकिन राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में बढ़ती कटुता हमें सावधान करती है।
धर्म यदि आस्था है तो वह मनुष्य को विनम्र बनाता है; यदि वही धर्म राजनीतिक हथियार बन जाए तो वह समाज को विभाजित कर सकता है। देशभक्ति यदि नागरिक कर्तव्य है तो वह सबको जोड़ती है; यदि वह दूसरों को देशद्रोही ठहराने का माध्यम बन जाए तो लोकतंत्र के लिए खतरनाक हो जाती है। असहमति लोकतंत्र की शत्रु नहीं है। असहमति को देशद्रोह मान लेना लोकतंत्र की कमजोरी है। भारत को सत्ता के पक्ष और विपक्ष से आगे बढ़कर नागरिकता की साझा चेतना की आवश्यकता है।
1975 की आपातस्थिति : लोकतंत्र के लिए अमिट चेतावनी
भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का एक सबसे गंभीर अध्याय 1975 की आपातस्थिति है। वह काल हमें यह याद दिलाता है कि लोकतांत्रिक संस्थाएँ केवल संविधान में लिख देने से सुरक्षित नहीं रहतीं। उन्हें सत्ता, विपक्ष, न्यायपालिका, मीडिया, नागरिक समाज और सबसे बढ़कर जनता की लोकतांत्रिक सजगता सुरक्षित रखती है।
भारत ने उस दौर से भी सीखा। संविधान में बाद के संशोधनों ने अनेक संस्थागत सुरक्षा उपायों को मजबूत किया। इसलिए आज आवश्यकता किसी एक दल या किसी एक युग को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि यह स्वीकार करने की है कि लोकतंत्र को हर पीढ़ी में फिर से अर्जित करना पड़ता है।
1962 : हार से मिली शक्ति
- 1962 का भारत-चीन युद्ध स्वतंत्र भारत के लिए एक गहरी सैन्य और राजनीतिक चुनौती था। लेकिन इतिहास की विशेषता यह है कि पराजय भी राष्ट्रों को पुनर्गठन का अवसर दे सकती है।
- भारत ने रक्षा क्षमता, सैन्य ढाँचे और रणनीतिक सोच को मजबूत किया और आगे चलकर 1971 में निर्णायक सैन्य विजय हासिल की।
- 18 मई 1974 का पोखरण परीक्षण और मई 1998 के परमाणु परीक्षण भारत की वैज्ञानिक एवं सामरिक क्षमता की घोषणा थे।
- 1975 में सिक्किम का भारत में विलय भी आधुनिक भारतीय संघ के निर्माण की महत्वपूर्ण घटना रहा।
- इतिहास केवल विजय की सूची नहीं है; वह यह भी बताता है कि राष्ट्र संकटों से कैसे सीखता है।
हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है?
शायद हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि हमने बड़े बाँध बनाए, महानगर खड़े किए, डिजिटल क्रांति की या GDP बढ़ाई। हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि विविधताओं से भरे इस विशाल देश ने सात से अधिक दशकों तक लोकतांत्रिक प्रक्रिया को जीवित रखा। सरकारें बदलीं। दल बदले। विचारधाराएँ बदलीं। केंद्र में अलग-अलग राजनीतिक शक्तियाँ आईं। राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारें बनीं। जनता ने सत्ता बदली और सत्ता को हटाया।
2024 के लोकसभा चुनाव में मतदान का राष्ट्रीय स्तर पर कुल प्रतिशत लगभग 66.10 प्रतिशत रहा। महिलाओं का मतदान पुरुषों से थोड़ा अधिक रहा। यह प्रमाण है कि भारतीय लोकतंत्र अभी जीवित है। लेकिन लोकतंत्र केवल चुनाव के दिन मतदान करने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है—
- प्रश्न पूछने का अधिकार,
- असहमति रखने की स्वतंत्रता,
- न्याय पाने का विश्वास,
- कानून के सामने समानता,
- अल्पसंख्यक की सुरक्षा,
- बहुमत की मर्यादा,
- मीडिया की स्वतंत्रता,
- संस्थाओं की स्वायत्तता
- और नागरिक का सम्मान।
स्वास्थ्य : प्रगति और चुनौती दोनों
जीवन की गुणवत्ता के सबसे महत्वपूर्ण संकेतकों में स्वास्थ्य है। विश्व बैंक के नवीनतम उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार भारत में जीवन प्रत्याशा 2024 में लगभग 72 वर्ष थी। यह स्वतंत्रता के आरंभिक दशकों की तुलना में बड़ी उपलब्धि है। लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने अभी भी गंभीर प्रश्न हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा के अनुसार 2021-22 में सरकार का कुल स्वास्थ्य व्यय GDP का लगभग 1.84 प्रतिशत था, जबकि परिवारों का जेब से होने वाला स्वास्थ्य खर्च कुल स्वास्थ्य व्यय का लगभग 39.4 प्रतिशत था।
अर्थात् हमने चिकित्सा सुविधाएँ बढ़ाई हैं, लेकिन गुणवत्तापूर्ण और सुलभ स्वास्थ्य सेवा की लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई। गरीब परिवार के लिए बीमारी आज भी केवल स्वास्थ्य का संकट नहीं, आर्थिक संकट भी बन सकती है। यहीं “जीने के अधिकार” का वास्तविक अर्थ सामने आता है।
हमारी सबसे बड़ी चिंता : लोकतंत्र का सामाजिक चरित्र
आज प्रश्न केवल इतना नहीं है कि संविधान सुरक्षित है या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या संवैधानिक संस्कृति हमारे व्यवहार में सुरक्षित है?
- यदि हम संविधान की प्रस्तावना पढ़ते हैं, लेकिन जातीय घृणा में विश्वास करते हैं—तो हमने संविधान को समझा नहीं।
- यदि हम स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहराते हैं, लेकिन दूसरे नागरिक के अधिकार का सम्मान नहीं करते—तो हमने स्वतंत्रता की आत्मा को समझा नहीं।
- यदि हम न्याय की बात करते हैं, लेकिन न्याय को केवल अपने पक्ष के लिए चाहते हैं—तो हमने न्याय का अर्थ नहीं समझा।
- यदि हम राष्ट्र की एकता चाहते हैं, लेकिन अपने ही देशवासियों को धर्म, जाति, भाषा या विचार के आधार पर बाँटते हैं—तो हम राष्ट्र की जड़ों को ही कमजोर कर रहे हैं।
भारत केवल भूगोल नहीं है। भारत नागरिकों का साझा विश्वास है। और इस विश्वास को यदि कुछ खोखला करता है तो वह केवल बाहरी चुनौती नहीं, बल्कि भीतर की अविश्वास, नफरत, भ्रष्टाचार, हिंसा और असहिष्णुता भी है।
तो आखिर देश ने क्या खोया और क्या पाया?
यदि इस प्रश्न का उत्तर कुछ पंक्तियों में देना हो तो शायद कहा जा सकता है—
- हमने भूख पर विजय की दिशा में बहुत कुछ पाया, पर पूर्ण पोषण अभी दूर है।
- हमने निरक्षरता को बहुत पीछे छोड़ा, पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा अभी अधूरी है।
- हमने अर्थव्यवस्था को विशाल बनाया, पर समान अवसर की चुनौती बनी हुई है।
- हमने तकनीकी शक्ति अर्जित की, पर तकनीक के साथ सत्य और विवेक की रक्षा का प्रश्न भी खड़ा हुआ है।
- हमने महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई, पर उनकी पूर्ण सुरक्षा और समानता अभी लक्ष्य है।
- हमने जीवन प्रत्याशा और स्वास्थ्य-संरचना में प्रगति की, पर सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था अभी अधूरी है।
- हमने विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को जीवित रखा, पर लोकतांत्रिक आचरण को निरंतर बचाए रखना अभी भी हमारा दायित्व है।
और शायद हमने कुछ सबसे अमूल्य चीजें भी खोई हैं—सार्वजनिक संवाद की शालीनता, असहमति का धैर्य, सामाजिक विश्वास और उस सहज भाईचारे की कुछ चमक, जो भारत की आत्मा का अभिन्न अंग रही है।
अगले 21 वर्ष : 2047 की ओर
15 अगस्त 2026 से 2047 तक केवल 21 वर्ष का अंतर है—और 2047 में स्वतंत्र भारत अपने 100 वर्ष पूरे करेगा। इसलिए 79वें स्वतंत्रता दिवस का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि हमने अब तक क्या किया। प्रश्न यह होना चाहिए— 2047 में हम कैसा भारत चाहते हैं?
- क्या ऐसा भारत जिसमें GDP बड़ा हो, पर नागरिक छोटा पड़ जाए?
- या ऐसा भारत जिसमें आर्थिक विकास के साथ सामाजिक न्याय भी हो?
- क्या ऐसा भारत जिसमें तकनीक अत्याधुनिक हो, पर विद्यालयों में विचार स्वतंत्र न हों?
- या ऐसा भारत जहाँ विज्ञान के साथ विवेक, तकनीक के साथ नैतिकता और विकास के साथ मानवीय गरिमा भी हो?
- क्या ऐसा भारत जहाँ बहुमत शक्तिशाली हो, या ऐसा भारत जहाँ बहुमत अपनी शक्ति का उपयोग अल्पमत के अधिकारों की रक्षा के लिए भी करे?
- क्या ऐसा भारत जिसमें चुनाव होते रहें, या ऐसा भारत जिसमें लोकतांत्रिक संस्कार भी जीवित रहें?
हमारा उत्तर स्पष्ट होना चाहिए। भारत को केवल विकसित राष्ट्र नहीं, विकसित लोकतंत्र भी बनना होगा।
स्वतंत्रता का अर्थ—जनता की गरिमा
79 वर्षों की यात्रा हमें यह सिखाती है कि राष्ट्र निर्माण किसी एक सरकार, एक दल, एक नेता या एक विचारधारा का कार्य नहीं है। यह करोड़ों नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है।
- एक शिक्षक जब ईमानदारी से पढ़ाता है, वह राष्ट्र बनाता है।
- एक किसान जब धरती से अन्न उगाता है, वह राष्ट्र बनाता है।
- एक सैनिक जब सीमा पर खड़ा रहता है, वह राष्ट्र की रक्षा करता है।
- एक वैज्ञानिक जब प्रयोगशाला में असफलताओं के बीच काम करता है, वह राष्ट्र को आगे ले जाता है।
- एक डॉक्टर जब गरीब रोगी का उपचार करता है, वह संविधान की मानवीय आत्मा को जीवित करता है।
- एक पत्रकार जब सत्ता से निर्भीक होकर प्रश्न पूछता है, वह लोकतंत्र की चौकीदारी करता है।
- और एक सामान्य नागरिक जब अपने से भिन्न धर्म, जाति, भाषा या विचार रखने वाले व्यक्ति के सम्मान की रक्षा करता है—तब वह भारत को बचाता है।
अब हमारी बारी है; हमारे पूर्वजों ने हमें राजनीतिक स्वतंत्रता दी। अब हमारी पीढ़ी का दायित्व है कि वह उसे सामाजिक न्याय, आर्थिक अवसर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य, सुरक्षित जीवन, वैज्ञानिक चेतना और लोकतांत्रिक मर्यादा से अर्थ दे।
हमें यह समझना होगा कि राष्ट्रप्रेम केवल नारे में नहीं होता। राष्ट्रप्रेम उस समय दिखाई देता है जब हम कर ईमानदारी से देते हैं, कानून का सम्मान करते हैं, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करते हैं, महिला का सम्मान करते हैं, बच्चे को शिक्षा देते हैं, गरीब के अधिकार को अपना अधिकार समझते हैं और असहमति रखने वाले नागरिक को भी उतना ही भारतीय मानते हैं जितना स्वयं को।
तिरंगा केवल आकाश में नहीं लहरना चाहिए; वह हमारे चरित्र में भी लहरना चाहिए। संविधान केवल संसद की अलमारी में नहीं होना चाहिए; वह हमारे व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। स्वतंत्रता केवल सीमा की रक्षा से नहीं बचती; वह नागरिक की गरिमा की रक्षा से भी बचती है।
आज़ादी का अर्थ अभी पूरा होना शेष है
79 वर्ष बहुत होते हैं—पर किसी सभ्यता के लिए 79 वर्ष शायद एक लंबी यात्रा का केवल एक पड़ाव हैं। हमने बहुत कुछ पाया है। हमें अपनी उपलब्धियों पर गर्व होना चाहिए। पर हमें अपनी कमियों से भी आँख नहीं चुरानी चाहिए।
क्योंकि सच्चा राष्ट्रप्रेम वह नहीं जो केवल अपनी उपलब्धियों का गुणगान करे; सच्चा राष्ट्रप्रेम वह है जो अपने देश की कमियों को देखकर उन्हें दूर करने का साहस भी रखे। आज स्वतंत्रता दिवस पर हम यह न कहें कि भारत पूर्ण हो चुका है।
हम यह कहें— भारत ने बहुत दूर तक यात्रा की है, पर अभी बहुत दूर जाना है। अभी ऐसा भारत बनाना है जहाँ किसी बच्चे की गरीबी उसके सपनों की सीमा न बने।
- जहाँ किसी किसान का श्रम सम्मान से वंचित न हो।
- जहाँ किसी महिला को भय में जीवन न बिताना पड़े।
- जहाँ बीमारी परिवार की अर्थव्यवस्था न उजाड़ दे।
- जहाँ शिक्षा केवल डिग्री नहीं, विवेक और चरित्र दे।
- जहाँ धर्म मनुष्य को जोड़ने का सेतु बने, दीवार नहीं।
- जहाँ राजनीति सेवा बने, स्वार्थ नहीं।
- जहाँ सत्ता परिवर्तन से लोकतंत्र न बदले, क्योंकि लोकतंत्र संस्थाओं और नागरिक चेतना में गहराई से प्रतिष्ठित हो।
- जहाँ सरकारें जनता से बड़ी न हों।
- जहाँ संविधान सत्ता का सेवक नहीं, सत्ता पर नियंत्रण का सर्वोच्च विधान बना रहे।
- और जहाँ भारत की पहचान केवल एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण, संवेदनशील, लोकतांत्रिक और मानवीय राष्ट्र के रूप में हो।
आइए, स्वतंत्रता के 79वें वर्ष पर अपने शहीदों के सामने सिर झुकाएँ और स्वयं से एक प्रश्न पूछें— “उन्होंने हमें कैसी आज़ादी सौंपी थी, और हम आने वाली पीढ़ियों को कैसी आज़ादी सौंपेंगे?” उत्तर इतिहास की पुस्तकों में नहीं लिखा जाएगा। उत्तर हम अपने कर्मों से लिखेंगे। आइए फिर संकल्प लें—
न संविधान को कमजोर होने देंगे,
न लोकतंत्र को खोखला होने देंगे।
न मनुष्यता को धर्म के नाम पर बाँटने देंगे,
न नागरिक अधिकारों को सत्ता की सुविधा बनने देंगे।
न असहमति को अपराध बनने देंगे,
न बहुमत को निरंकुश बनने देंगे।
न स्वतंत्रता को केवल उत्सव बनाएँगे,
न राष्ट्रप्रेम को केवल नारा रहने देंगे।
हम स्वतंत्रता को जीवन में उतारेंगे।
हम लोकतंत्र को आचरण में उतारेंगे।
हम संविधान को चेतना में उतारेंगे।
हम बंधुत्व को व्यवहार में उतारेंगे।
क्योंकि— आज़ादी केवल वह दिन नहीं था जब अंग्रेज़ भारत से गए; आज़ादी वह सतत् प्रक्रिया है जिसमें प्रत्येक नागरिक भय से मुक्त, गरिमा से युक्त और अधिकारों से संपन्न होकर जी सके।
- यही हमारी उपलब्धि का अगला पड़ाव है।
- यही हमारी कमियों का उपचार है।
- यही हमारे शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
- और यही 2047 के भारत की सबसे बड़ी तैयारी है।
आज़ादी के 79 वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ।
जय हिन्द!
वन्दे मातरम्!

