“प्रधानमंत्री मोदी के 80वें स्वतंत्रता दिवस भाषण का तथ्यात्मक परीक्षण: उपलब्धियाँ वास्तविक हैं, लेकिन हर दावा अपने साथ एक बड़ा सवाल भी लाता है”
15 अगस्त 2026 को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार 13वीं बार स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्र को संबोधित किया। यह अपने आप में एक राजनीतिक और ऐतिहासिक पड़ाव है—जवाहरलाल नेहरू के बाद नरेंद्र मोदी लगातार 13 स्वतंत्रता दिवस संबोधन देने वाले दूसरे प्रधानमंत्री बने हैं। इस वर्ष के समारोह की केंद्रीय धुरी युवा शक्ति, 2047 तक विकसित भारत और ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष रही। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में नेहरू, सरदार पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सुभाषचंद्र बोस, डॉ. आंबेडकर, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, बिरसा मुंडा और ज्योतिबा फुले को एक साझा राष्ट्रीय विरासत के रूप में स्मरण किया।
प्रधानमंत्री का भाषण मूलतः एक उपलब्धि-पत्र और भविष्य-दृष्टि, दोनों था। इसमें एक ओर पिछले 12 वर्षों को परिवर्तनकारी काल के रूप में प्रस्तुत किया गया, दूसरी ओर 2047 के विकसित भारत के लिए ‘सप्तधारा’ का विजन रखा गया। लेकिन लोकतंत्र में प्रधानमंत्री का भाषण केवल उत्सव का दस्तावेज नहीं होता। वह सरकार की नीतियों, उसके दावों और उसके भविष्य के वादों का सार्वजनिक लेखा-जोखा भी बन जाता है।
इसलिए सवाल यह नहीं कि भाषण प्रभावशाली था या नहीं। सवाल यह है कि “उसमें बताए गए भारत और आंकड़ों से दिखाई देने वाले भारत के बीच कितनी दूरी है?” यही इस भाषण का वास्तविक परीक्षण है।
पहले अच्छी खबर: भारत बदला है, और कई मोर्चों पर सचमुच बदला है
प्रधानमंत्री के दावों को सिर्फ इसलिए खारिज कर देना कि वे सरकार की ओर से आए हैं, उतना ही गलत होगा जितना हर सरकारी दावे को अंतिम सत्य मान लेना।
भारत में पिछले एक दशक में डिजिटल भुगतान, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा, रेलवे विद्युतीकरण, आधारभूत संरचना और औपचारिक वित्तीय समावेशन में वास्तविक परिवर्तन हुए हैं।
उदाहरण के लिए, सरकार के अनुसार 2013-14 में लगभग 127 करोड़ डिजिटल लेन-देन हुए थे, जो 2022-23 में बढ़कर 12,735 करोड़ से अधिक हो गए—यानी लगभग 100 गुना वृद्धि। 2025-26 तक UPI की वार्षिक लेन-देन संख्या 24,162 करोड़ से ऊपर पहुँच चुकी थी और कुल लेन-देन मूल्य ₹314 लाख करोड़ से अधिक रहा।
इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में भी बदलाव वास्तविक है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2014-15 में इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन लगभग ₹1.9 लाख करोड़ था, जो 2024-25 में लगभग ₹12 लाख करोड़ पहुँचा। निर्यात करीब ₹38,000 करोड़ से बढ़कर लगभग ₹3.3 लाख करोड़ हुआ। सरकार का कहना है कि मोबाइल विनिर्माण अकेले लगभग 12 लाख प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगारों का समर्थन करता है।
सेमीकंडक्टर क्षेत्र भी केवल भाषण की कल्पना नहीं रह गया है। अप्रैल 2026 तक सरकार ने 10 परियोजनाओं को मंजूरी दी थी और जुलाई 2026 तक तीन सेमीकंडक्टर सुविधाओं में वाणिज्यिक उत्पादन शुरू होने की आधिकारिक जानकारी दी गई। सरकार ने 2026 के अंत तक पाँच संयंत्रों के संचालन का लक्ष्य भी बताया है।
नवीकरणीय ऊर्जा के मामले में भी आंकड़े महत्वपूर्ण हैं। 30 जून 2026 तक भारत की कुल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 288.58 GW थी, जिसमें अकेले सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता 162.15 GW थी। 2014 के 76.38 GW कुल नवीकरणीय क्षमता से यह एक बड़ा विस्तार है।
रेलवे विद्युतीकरण पर प्रधानमंत्री का दावा भी मोटे तौर पर उस दिशा से मेल खाता है जो सरकारी आंकड़े बताते हैं। जुलाई 2026 तक भारतीय रेल के 99.6 प्रतिशत ब्रॉड-गेज नेटवर्क का विद्युतीकरण हो चुका था। सरकार के अनुसार 2014 के बाद लगभग 24,000 route km से अधिक विद्युतीकरण हुआ, जबकि उससे पहले कई दशकों में करीब 21,801 route km विद्युतीकरण हुआ था।
अर्थात यह कहना गलत होगा कि पिछले 12 वर्षों में कुछ बदला ही नहीं। बहुत कुछ बदला है। समस्या वहाँ शुरू होती है जहाँ उपलब्धि को अंतिम निष्कर्ष बना दिया जाता है।
गरीबी के 25 करोड़: बड़ी उपलब्धि, लेकिन आंकड़े का अर्थ समझना होगा
प्रधानमंत्री ने 25 करोड़ लोगों के गरीबी से बाहर निकलने की बात दोहराई। यह संख्या मुख्यतः नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी के अनुमान से जुड़ी है।
नीति आयोग के अनुसार 2013-14 से 2022-23 के बीच लगभग 24.82 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए और बहुआयामी गरीबी का अनुमानित अनुपात 29.17 प्रतिशत से घटकर 11.28 प्रतिशत हुआ। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य है: 2013-14 और 2022-23 के आंकड़े प्रत्यक्ष सर्वेक्षण से प्राप्त पूर्ण-वर्षीय प्रत्यक्ष अनुमान नहीं, बल्कि प्रक्षेपण/अनुमान की पद्धति से निकाले गए हैं। स्वयं नीति आयोग की रिपोर्ट यह बताती है कि 2013-14 के आंकड़े interpolated और 2022-23 के आंकड़े extrapolated हैं। इसलिए “25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए” एक महत्वपूर्ण नीति संकेतक है, लेकिन इसे यह कहने के बराबर नहीं माना जा सकता कि 25 करोड़ लोग अब समृद्ध या आर्थिक रूप से सुरक्षित हो गए हैं।
बहुआयामी गरीबी में पोषण, शिक्षा, आवास, स्वच्छता, पेयजल, बिजली, cooking fuel आदि कई संकेतक शामिल होते हैं। और यह अच्छी बात है कि इन क्षेत्रों में सुधार हुआ है। लेकिन आर्थिक सुरक्षा, स्थायी रोजगार, आय की वृद्धि और संपत्ति की सुरक्षा अलग प्रश्न हैं। यही कारण है कि सरकारी उपलब्धि और सामाजिक वास्तविकता दोनों को एक साथ देखना जरूरी है।
भारत बड़ी अर्थव्यवस्था है—लेकिन प्रति व्यक्ति समृद्धि अभी बहुत पीछे है
प्रधानमंत्री ने भारत को तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया। इसमें तथ्य है। IMF के अप्रैल 2026 के अनुमान के अनुसार भारत की वास्तविक GDP वृद्धि 2026 के लिए लगभग 6.2-6.4 प्रतिशत के आसपास आंकी गई है, जो विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में उल्लेखनीय गति है। लेकिन दूसरी तस्वीर भी है।
IMF के 2025 Article IV आंकड़ों में 2023-24 में भारत की nominal GDP लगभग $3.638 ट्रिलियन और प्रति व्यक्ति GDP लगभग $2,530 थी। यानी कुल अर्थव्यवस्था बड़ी हो रही है, लेकिन प्रति व्यक्ति आय अभी भी विकसित देशों से बहुत नीचे है।
यही वह अंतर है जिसे “विकसित भारत” की बहस में केंद्र में रखना होगा। “बड़ी GDP और विकसित समाज एक ही चीज नहीं हैं।” विकसित भारत का अर्थ केवल GDP का आकार नहीं होगा। उसका अर्थ होगा—
- उच्च प्रति व्यक्ति आय,
- उच्च उत्पादक रोजगार,
- बेहतर मानव पूंजी,
- बेहतर स्वास्थ्य,
- बेहतर शिक्षा,
- महिलाओं की अधिक श्रम भागीदारी,
- समान अवसर और
- कम सामाजिक असमानता।
IMF ने भी भारत के लिए मानव पूंजी, महिला श्रम भागीदारी, व्यापार एकीकरण, R&D, नवाचार और उत्पादकता सुधार को महत्वपूर्ण बताया है। इसलिए 2047 का लक्ष्य केवल “कितनी बड़ी अर्थव्यवस्था?” से नहीं, बल्कि “कितना समृद्ध और न्यायपूर्ण समाज?” से मापा जाना चाहिए।
रोजगार: भाषण में युवा केंद्र में, आंकड़ों में अभी अधूरा काम
प्रधानमंत्री ने सही रूप से युवाओं को विकसित भारत का सबसे बड़ा लाभार्थी और वाहक बताया। लेकिन युवा शक्ति का अर्थ केवल जनसंख्या नहीं है।
उसे रोजगार चाहिए। और रोजगार का अर्थ केवल किसी प्रकार का काम नहीं, बल्कि ऐसा उत्पादक काम है जिससे आय, सुरक्षा और सामाजिक गतिशीलता पैदा हो।
मार्च 2026 में जारी PLFS 2025 रिपोर्ट के अनुसार 15 वर्ष और उससे ऊपर के शिक्षित लोगों में सामान्य स्थिति पर बेरोजगारी दर 2024 के 7.0 प्रतिशत से घटकर 2025 में 6.5 प्रतिशत हुई। नियमित वेतन/नौकरी वाले रोजगार का हिस्सा भी 22.4 प्रतिशत से बढ़कर 23.6 प्रतिशत हुआ।
यह सुधार है; लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि रोजगार की समस्या खत्म हो गई। क्योंकि भारत में सबसे बड़ा प्रश्न अक्सर बेरोजगारी से अधिक कम-उत्पादक रोजगार और educated underemployment का है।
युवा इंजीनियर यदि डिग्री के बाद अस्थायी और कम आय वाले काम में फँस जाए, तो केवल बेरोजगारी दर गिरना उसके जीवन की सफलता का पर्याप्त मापदंड नहीं है। इसलिए विकसित भारत का सबसे कठिन सुधार शायद यही होगा— “डिग्री से नौकरी तक, नौकरी से उत्पादकता तक और उत्पादकता से सम्मानजनक आय तक की पूरी श्रृंखला बनाना।”
‘मैन्युफैक्चरिंग’ की उपलब्धि और उसकी सबसे बड़ी अधूरी कहानी
प्रधानमंत्री ने उत्पादन, manufacturing और global value chain में भारत की भूमिका बढ़ाने पर जोर दिया। यह सही दिशा है।
इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन में तेजी इसका उदाहरण है। लेकिन यहाँ भी एक प्रश्न है—”क्या भारत अंतिम उत्पाद assemble करने से आगे बढ़कर उच्च-मूल्य वाले components, design, materials, machinery और R&D में पर्याप्त हिस्सेदारी हासिल कर रहा है?” क्योंकि किसी मोबाइल को भारत में जोड़ना और उसके semiconductor, display, battery chemistry, precision equipment और core intellectual property को भारत में बनाना दो अलग स्तर हैं।
सेमीकंडक्टर कार्यक्रम निश्चित रूप से इस दिशा में एक बड़ा कदम है। तीन परियोजनाओं के वाणिज्यिक उत्पादन तक पहुँचना महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन अभी यात्रा शुरू हुई है।
तीन संयंत्र semiconductor superpower बनने का प्रमाण नहीं, उस दिशा में प्रवेश का प्रमाण हैं।” इसे कमतर आँकना भी गलत होगा और अंतिम विजय घोषित करना भी।
ऊर्जा सुरक्षा: उपलब्धि भी, निर्भरता भी
सौर ऊर्जा पर प्रधानमंत्री का दावा broadly तथ्यात्मक रूप से मजबूत है। भारत की सौर क्षमता जून 2026 तक 162.15 GW पहुँच चुकी थी। लेकिन ऊर्जा सुरक्षा का सबसे कठिन प्रश्न अभी भी कच्चे तेल पर निर्भरता है।
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसलिए तेल की कीमतें, समुद्री मार्ग, पश्चिम एशिया का युद्ध और वैश्विक भू-राजनीति सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था और घरेलू महंगाई को प्रभावित करते हैं।
प्रधानमंत्री ने अपतटीय ऊर्जा अन्वेषण और समुद्री क्षेत्र खोलने की नीति का उल्लेख किया। यह दीर्घकालीन रणनीतिक सोच हो सकती है, लेकिन यहाँ आंकड़ों के साथ सावधानी आवश्यक है। “99 प्रतिशत no-go area” और उससे जुड़े ₹85,000 करोड़ के “समुद्र मंथन” निवेश जैसे दावों का वास्तविक आर्थिक लाभ भविष्य के अन्वेषण और उत्पादन पर निर्भर करेगा। घोषित निवेश और वास्तविक उत्पादन समान नहीं होते।” ऊर्जा सुरक्षा का असली पैमाना होगा—
- कितना crude import घटा?
- कितनी घरेलू गैस बढ़ी?
- कितनी storage capacity बनी?
- कितनी कीमत स्थिर हुई?
- और renewable energy के साथ grid reliability कितनी मजबूत हुई?
यही असली रिपोर्ट कार्ड है।
गैस नेटवर्क और रेलवे: ‘रफ्तार’ के दावे की कीमत भी देखिए
प्रधानमंत्री ने पाइप्ड गैस, रेलवे विद्युतीकरण और परिवहन नेटवर्क की तेजी का उल्लेख किया। रेलवे का आंकड़ा इस मामले में प्रभावशाली है। ब्रॉड-गेज नेटवर्क का लगभग 99.6 प्रतिशत विद्युतीकृत होना महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इससे डीजल की खपत में भी कमी आई है; सरकारी आंकड़ों के अनुसार रेलवे के traction diesel consumption में 2015-16 के 293 करोड़ लीटर से घटकर 2024-25 में 108 करोड़ लीटर रह गया। यह पर्यावरण और ऊर्जा आयात—दोनों के लिए सकारात्मक है। लेकिन यहां भी कहानी का दूसरा हिस्सा है।
रेलवे विद्युतीकरण का अर्थ यह नहीं कि पूरी रेलवे व्यवस्था आधुनिक हो गई। punctuality, safety, freight share, station modernization, rolling stock, signalling और यात्री सुविधा की कसौटियां अलग हैं।
इसी प्रकार PNG विस्तार वास्तविक है, लेकिन देश के शहरों और घरों तक पाइप्ड गैस की पहुँच अभी भी विस्तारशील प्रक्रिया है। अप्रैल 2026 में सरकार ने 110 high-priority geographical areas में PNG विस्तार के लिए विशेष अभियान चलाने की बात कही थी—यानी स्वयं सरकार भी अंतिम-मील विस्तार को अभी अधूरा मान रही थी।
यूरिया और DAP: यहां भाषण का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक भ्रम सामने आता है
प्रधानमंत्री ने कहा कि विश्व बाजार में यूरिया की कीमत करीब ₹3,000 प्रति बोरी और DAP लगभग ₹5,000 तक जा रहा है, जबकि भारत में किसानों को बहुत कम कीमत पर उपलब्ध कराया जा रहा है। यह तथ्य एक महत्वपूर्ण आर्थिक उपलब्धि तो दिखाता है— “किसान को अंतरराष्ट्रीय कीमतों के झटके से बचाने की राज्य की क्षमता।” लेकिन तुलना को साफ़ रखना जरूरी है।
अप्रैल 2026 में सरकार के आंकड़ों के अनुसार यूरिया का MRP ₹266.50 प्रति 45 kg बैग और DAP ₹1,350 प्रति 50 kg बैग था। अंतरराष्ट्रीय और घरेलू subsidised price के बीच का बड़ा अंतर सरकारी सब्सिडी से भरा जाता है। इसलिए इसे “सरकार ₹300 में ₹3,000 वाला यूरिया दे रही है” जैसे राजनीतिक वाक्य से आगे समझना होगा।
सवाल यह है— “सरकार किसान को सस्ता उर्वरक दे रही है, यह अच्छी बात है, लेकिन क्या fertilizer subsidy का यह मॉडल लंबे समय तक fiscal रूप से टिकाऊ है?”
- क्या इससे nitrogen imbalance बढ़ता है?
- क्या इससे मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है?
- क्या किसान को organic/chemical-free agriculture की ओर ले जाने के लिए वैकल्पिक उत्पादन लागत मॉडल भी तैयार है?
प्रधानमंत्री ने स्वयं chemical-free farming का उल्लेख किया। अब नीतिगत चुनौती यही है कि subsidy model से sustainable agriculture model की तरफ कैसे जाया जाए।
‘दिमागी नक्सल’ और लोकतंत्र की सबसे कठिन सीमा
भाषण का सबसे विवादास्पद हिस्सा नक्सलवाद पर था। यह निर्विवाद है कि वाम उग्रवाद ने भारत में भारी जन-धन की क्षति की है। गृह मंत्रालय के अनुसार 2004 से नवंबर 2025 तक LWE हिंसा में 8,956 लोग मारे गए, जिनमें बड़ी संख्या नागरिकों की थी।
सरकार ने पिछले वर्षों में हिंसा के भूगोल को भी काफी सीमित किया है। गृह मंत्रालय के अनुसार LWE-affected districts 2018 के 126 से घटकर अक्टूबर 2025 में 11 रह गए, जिनमें केवल तीन सबसे अधिक प्रभावित श्रेणी में थे। 2010 में 1,936 से घटकर 2025 में LWE हिंसा की घटनाएँ 218 हुईं और नागरिक एवं सुरक्षा बलों की मौतें 1,005 से घटकर 93 हुईं।
यह उपलब्धि गंभीर है और इसे स्वीकार करना चाहिए। लेकिन यहीं प्रधानमंत्री के “दिमागी नक्सल” शब्द पर लोकतांत्रिक आपत्ति भी जरूरी है। “सशस्त्र माओवादी और असहमत विचारक एक ही श्रेणी नहीं हो सकते।”
जो हिंसा के माध्यम से राज्य सत्ता पर कब्जा करना चाहता है, उसके खिलाफ राज्य को कठोर होना चाहिए। लेकिन जो व्यक्ति किसी नीति, सरकार या व्यवस्था की तीखी आलोचना करता है, उसे “दिमागी नक्सल” की व्यापक श्रेणी में रख देना लोकतांत्रिक विमर्श को नुकसान पहुँचा सकता है।
राष्ट्र-विरोधी हिंसा और सरकार-विरोधी विचार के बीच स्पष्ट संवैधानिक रेखा बनाए रखना ही स्वस्थ राष्ट्रवाद है। “लोकतंत्र में असहमति की अनुमति कमजोरी नहीं, शक्ति है।”
‘सप्तधारा’ का अर्थ तभी है जब विकास आखिरी व्यक्ति तक पहुँचे
प्रधानमंत्री ने विकसित भारत के लिए manufacturing, technology, energy, agriculture, youth, reforms और अन्य प्राथमिकताओं को एक “सप्तधारा” के रूप में प्रस्तुत किया। यह सोच नीति के स्तर पर महत्वाकांक्षी है, लेकिन 2047 अभी 21 वर्ष दूर है।
इतिहास में 21 वर्ष लंबा समय भी है और बहुत छोटा भी। यदि भारत वास्तव में विकसित राष्ट्र बनना चाहता है तो उसे केवल GDP को तेज़ नहीं करना होगा; उसे productivity को स्थायी रूप से बढ़ाना होगा। इसके लिए पाँच बुनियादी प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण होंगे—
- क्या बच्चे सीख रहे हैं?
- क्या युवा उत्पादक रोजगार पा रहे हैं?
- क्या महिलाएँ बड़ी संख्या में श्रम बाजार में आ रही हैं?
- क्या भारत अपनी शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था को वैश्विक स्तर तक ले जा पा रहा है?
- क्या manufacturing high-value export में बदल रही है?
इन प्रश्नों के उत्तर 2047 की वास्तविक दिशा तय करेंगे।
महिला आरक्षण: कानून बन चुका है, लेकिन चुनावी प्रतिनिधित्व अभी बाकी है
प्रधानमंत्री ने सभी राजनीतिक दलों से संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने में योगदान का आह्वान किया। यहाँ भी तथ्य महत्वपूर्ण है।
2023 का 106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए लगभग एक-तिहाई सीटों के आरक्षण का संवैधानिक ढाँचा पहले ही स्थापित कर चुका है। लेकिन अनुच्छेद 334A के अनुसार यह आरक्षण उस जनगणना के आंकड़ों के बाद होने वाले परिसीमन के बाद प्रभावी होगा जो 2023 के संशोधन के बाद पहली होगी।
अर्थात आज राजनीतिक दलों से “कानून लागू करने” का आह्वान एक राजनीतिक अपील है; कानूनी रूप से इसके लागू होने की प्रक्रिया जनगणना और परिसीमन से जुड़ी हुई है।
यहां प्रधानमंत्री का अगला कदम अधिक महत्वपूर्ण होगा— “क्या सरकार जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया इतनी तेजी से और पारदर्शिता से पूरी करेगी कि महिलाओं का प्रतिनिधित्व वास्तव में राजनीतिक व्यवस्था में दिखाई दे?” क्योंकि कानून की किताब में आरक्षण और संसद की सीट पर आरक्षण—इन दोनों के बीच प्रशासनिक प्रक्रिया की एक लंबी दूरी है।
और अब सबसे कठिन प्रश्न: भाषण में क्या नहीं था?
हर प्रधानमंत्री का स्वतंत्रता दिवस भाषण एक चयनित राष्ट्रीय कथा प्रस्तुत करता है। जो बातें उसमें कही जाती हैं, वे जितनी महत्वपूर्ण हैं, उतनी ही महत्वपूर्ण वे बातें भी हैं जिनका उल्लेख कम हुआ या नहीं हुआ। भारत की सबसे बड़ी समस्याओं में आज भी—
- शिक्षा की गुणवत्ता,
- युवा रोजगार,
- महिला श्रम भागीदारी,
- कृषि आय और ग्रामीण उत्पादकता,
- शहरी असमानता,
- स्वास्थ्य खर्च,
- न्यायिक लंबित मामले,
- MSME की वित्तीय कठिनाइयाँ,
- निर्यात प्रतिस्पर्धा और
- मानवीय पूंजी— सब शामिल हैं।
IMF ने भी भारत के लिए मानव पूंजी, महिला labour force participation, trade integration, R&D और productivity सुधारों को आवश्यक बताया है; इसलिए विकसित भारत की कहानी को केवल infrastructure और technology की कहानी बनाना अधूरा होगा।
प्रधानमंत्री का भाषण—उपलब्धियों की सूची नहीं, अगले 21 वर्षों की परीक्षा
15 अगस्त 2026 का भाषण न तो केवल प्रचार था और न ही पूर्ण आर्थिक रिपोर्ट।
- उसमें उपलब्धियाँ वास्तविक हैं।
- कई आंकड़े प्रमाणित हैं।
- कुछ उपलब्धियाँ उल्लेखनीय हैं।
- कुछ दावे सरकारी अनुमान पर आधारित हैं।
- कुछ संख्याओं का संदर्भ स्पष्ट करना आवश्यक है।
- और कुछ दावे अभी भविष्य की आशाओं पर टिके हैं।
इसलिए इस भाषण को न अंधी प्रशंसा की जरूरत है, न राजनीतिक नकार की। भारत को दोनों से अधिक परिपक्व दृष्टि चाहिए।
- रेलवे विद्युतीकरण हुआ है—इसे स्वीकार कीजिए।
- डिजिटल भुगतान में क्रांति हुई है—इसे स्वीकार कीजिए।
- सेमीकंडक्टर में भारत ने पहली व्यावसायिक छलांग लगाई है—इसे स्वीकार कीजिए।
- नवीकरणीय ऊर्जा 162 GW से अधिक solar capacity तक पहुँची है—इसे स्वीकार कीजिए।
लेकिन उसी सांस में यह भी पूछिए—
- रोजगार की गुणवत्ता कहाँ है?
- प्रति व्यक्ति समृद्धि कितनी है?
- किसान की आय कितनी स्थिर हुई?
- सरकारी स्कूल और अस्पताल कितने बेहतर हुए?
- महिलाएँ आर्थिक शक्ति में कितनी भागीदार बनीं?
- क्या असहमति के लिए पर्याप्त लोकतांत्रिक जगह है?
और सबसे बड़ा प्रश्न— “क्या 2047 का विकसित भारत केवल एक बड़ी अर्थव्यवस्था होगा, या एक ऐसा विकसित समाज भी होगा जिसमें नागरिक की गरिमा, अवसर की समानता और संस्थाओं की विश्वसनीयता भी उतनी ही मजबूत होगी?”
प्रधानमंत्री ने लाल किले से राष्ट्र को 2047 का सपना दिया है। अब इतिहास की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री या किसी एक सरकार की नहीं होगी। “2047 का परिणाम भारत की संस्थाएँ देंगी, भारत का युवा देगा, भारत के किसान देंगे, भारत के श्रमिक देंगे, भारत की महिलाएँ देंगी और अंततः भारत का नागरिक देगा।”
किसी भी सरकार को अपने 12 वर्षों का हिसाब देने का अधिकार है, लेकिन लोकतंत्र नागरिक को भी यह अधिकार देता है कि वह उस हिसाब की ऑडिट करे; और शायद यही स्वतंत्रता का सबसे सुंदर अर्थ है— “सरकार उपलब्धियाँ गिनाए, नागरिक सवाल पूछे; सरकार सपने दिखाए, आंकड़े उन्हें परखें; और राष्ट्र दोनों को जोड़कर अपना भविष्य तय करे।” तभी “विकसित भारत 2047” एक राजनीतिक नारा नहीं, “एक राष्ट्रीय सामाजिक अनुबंध” बनेगा।

