चौथे स्तंभ की सुदृढ़ता और लोकतांत्रिक मूल्य: सत्ता से सवाल और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

भारतीय लोकतंत्र की मूल आत्मा इस बात में निहित है कि शासन करने वाले दल या व्यक्ति जनसामान्य के प्रति उत्तरदायी हों। लोकतंत्र में ‘सत्ता’ कोई सर्वोच्च सत्ताधीश नहीं, बल्कि जनता द्वारा चुनी गई एक व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य जनहित और लोककल्याण है। ऐसे में, यदि सत्ता से सवाल पूछने को किसी अपराध की तरह देखा जाने लगे, तो यह न केवल स्वतंत्र पत्रकारिता पर सीधा प्रहार है, बल्कि यह उस संवैधानिक ढांचे के भी विपरीत है जो नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है।

वैधानिक पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही

हाल ही में स्वतंत्र पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के संदर्भ में सामने आए प्रकरण ने कई गंभीर वैधानिक और प्रशासनिक सवाल खड़े किए हैं। एक नागरिक और पत्रकार के रूप में किसी भी व्यक्ति के घर आधी रात को पुलिस का पहुंचना और वह भी तब जब वह व्यक्ति वहां मौजूद न हो, कानून के शासन (Rule of Law) की स्थापित परंपराओं पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

* कानूनी प्रक्रिया की पारदर्शिता: यदि पुलिस के पास कोई वैधानिक आधार या विधिवत दर्ज मुकदमा है, तो उसे पूर्ण पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
* दस्तावेजों की वैधता: प्राथमिकी (FIR) की प्रति मांगने पर पुरानी प्रतियां उपलब्ध कराए जाने जैसे गंभीर आरोप यह दर्शाते हैं कि प्रशासनिक मशीनरी का उपयोग न्यायसंगत प्रक्रिया के बजाय किसी को प्रताड़ित करने के लिए तो नहीं किया जा रहा है। सरकार और पुलिस महकमे को इस पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

पत्रकारिता: प्रशंसा का नहीं, बल्कि सत्य का मंच

लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया को लोकतंत्र का ‘चौथा स्तंभ’ कहा गया है। इसका प्राथमिक कार्य सत्ता की चाटुकारिता या केवल उसकी उपलब्धियों का बखान करना नहीं है, बल्कि नीतियों की समीक्षा करना, खामियों को उजागर करना और जनता की आवाज को शासन तक पहुंचाना है।

* न्यायपालिका का दरवाजा और संघर्ष: किसी स्टोरी के प्रसारण के बाद उसे डिजिटल प्लेटफॉर्म से हटवाया जाना और फिर कानूनी लड़ाई लड़कर उसे दोबारा बहाल करवाना, यह साबित करता है कि सत्य के मार्ग पर चलने वालों को किस प्रकार के संघर्षों का सामना करना पड़ता है।
* सत्ता और तंत्र की तटस्थता: सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन संवैधानिक संस्थाएं और पुलिस तंत्र किसी दल विशेष के प्रति नहीं, बल्कि संविधान के प्रति जवाबदेह होते हैं। राज्य की शक्ति का उपयोग किसी पत्रकार की आवाज को दबाने, उसे भयभीत करने या उसके मनोबल को तोड़ने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष और लोकतांत्रिक दायित्व

अभिषेक उपाध्याय के साथ वैचारिक सहमति या असहमति का प्रश्न पूरी तरह से गौण है। बुनियादी मुद्दा यह है कि क्या एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक देश में किसी पत्रकार को अपने पेशे का निर्वहन करने की एवज में इस तरह के दबाव का सामना करना पड़ेगा? निर्भीक पत्रकारिता का अधिकार और असहमति का सम्मान ही एक जीवंत लोकतंत्र की पहचान हैं।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की यह पंक्तियां वर्तमान परिस्थितियों पर एकदम सटीक बैठती हैं:

“सच है, विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है,
सूरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते।”

लोकतंत्र की रक्षा के लिए यह आवश्यक है कि सत्ता और तंत्र अपनी सीमाओं का सम्मान करें तथा असहमति को दबाने के बजाय स्वस्थ संवाद और पारदर्शिता को प्राथमिकता दें।

Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!