……पण्डित प्रदीप शुक्ल
लखनऊ से आई यह खबर केवल एक विभागीय पत्र की कहानी नहीं है। यह उस बड़े विमर्श की शुरुआत है, जिसमें राज्य बनाम पत्रकारिता, जवाबदेही बनाम संदेह, और पारदर्शिता बनाम चयनात्मक निगरानी के प्रश्न एक साथ खड़े हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ने 27 जुलाई 2026 को अपने मंडलीय और जिला सूचना कार्यालयों से मान्यता प्राप्त पत्रकारों से जुड़ा वर्षवार विवरण माँगा है—कितने पत्रकारों की मान्यता एक संस्थान से दूसरे में स्थानांतरित हुई, कितनों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हुए, और मुकदमों के कारण कितनी मान्यताएँ निरस्त की गईं। रिपोर्ट के अनुसार, यह जानकारी 28 जुलाई की शाम 5 बजे तक ईमेल से उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था।
काग़ज़ पर यह एक प्रशासनिक अभ्यास लग सकता है। व्यवहार में यह एक नीतिगत संकेत है। और संकेत भी ऐसा, जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। सूचना विभाग का काम राज्य की नीतियों, उपलब्धियों, प्रचार और जनसंपर्क से जुड़ा है; उसके जिला स्तर के कार्यालय भी इसी प्रचार-तंत्र का हिस्सा हैं। ऐसे में यदि वही विभाग पत्रकारों की मान्यता, मुकदमों और निरस्तीकरण का रिकॉर्ड वर्षवार खँगाल रहा है, तो प्रश्न यह नहीं है कि डेटा क्यों माँगा गया। प्रश्न यह है कि किस नज़र से माँगा गया, किस उद्देश्य से माँगा गया, और क्या यह प्रक्रिया समान मानदंडों पर आधारित है।
यही वह बिंदु है जहाँ एक लोकतांत्रिक राज्य की परीक्षा शुरू होती है। यदि सरकार का लक्ष्य पत्रकारिता की शुचिता सुनिश्चित करना है, तो यह स्वागतयोग्य है। फर्जी पहचान, अपात्र मान्यता, और प्रेस-पास व्यवस्था के दुरुपयोग पर लगाम लगनी ही चाहिए। लेकिन यदि यह कवायद केवल असुविधाजनक पत्रकारों की सूची बनाने, आलोचनात्मक आवाज़ों को चिन्हित करने, या मान्यता को दबाव-तंत्र में बदलने की दिशा में बढ़ती है, तो यह पत्रकारिता पर नहीं, सूचना के अधिकार पर चोट होगी। पारदर्शिता का अर्थ केवल रिकॉर्ड जुटाना नहीं होता; उसका अर्थ होता है समान कसौटी, सार्वजनिक जवाबदेही और भेदभाव-रहित प्रक्रिया।
यहाँ सबसे अहम सवाल वही है, जो पत्रकार संगठनों ने उठाना शुरू किया है: यदि जिला मुख्यालय के मान्यता प्राप्त पत्रकारों पर दर्ज मुकदमों का हिसाब माँगा जा रहा है, तो राज्य मुख्यालय से मान्यता प्राप्त पत्रकारों का हिसाब क्यों नहीं? यदि मान्यता निरस्तीकरण का रिकॉर्ड संकलित किया जा रहा है, तो क्या यह नियम लखनऊ तक लागू होगा? और यदि सत्यापन का उद्देश्य व्यवस्था को साफ़ करना है, तो फिर उसका दायरा नीचे तक सीमित क्यों रहे? यही वह असमानता है जो हर सरकारी अभियान को संदिग्ध बना देती है। एक नियम सब पर है, या नियम केवल कुछ पर है—यही लोकतंत्र और प्रशासन के बीच निर्णायक अंतर पैदा करता है।
प्रेस की विश्वसनीयता बचाने के लिए यह भी आवश्यक है कि पत्रकारिता के भीतर मौजूद वास्तविक समस्याओं को नकारा न जाए। हर प्रदेश में, हर दौर में, अपात्र लोग पत्रकारिता के नाम पर प्रवेश करते रहे हैं। प्रेस-पास, मान्यता, सरकारी सुविधाएँ और पहचान-पत्र—इन सबका दुरुपयोग किसी एक राज्य की समस्या नहीं, पूरे देश का संकट है। कई राज्यों में पत्रकार मान्यता की अलग-अलग श्रेणियाँ और ढाँचे हैं, और प्रेस काउंसिल की हालिया रिपोर्ट भी यह रेखांकित करती है कि राज्य तथा जिला मुख्यालयों पर जारी कार्डों के स्वरूप अलग-अलग हैं। यानी पत्रकारिता की मान्यता का प्रश्न एक वास्तविक संस्थागत प्रश्न है, जिसे साफ़ करने की ज़रूरत है।
लेकिन जो चीज़ इस पूरे प्रकरण को अधिक गंभीर बनाती है, वह है इसका राजनैतिक संदर्भ। भारत में संस्थाओं की कार्यशैली अक्सर तभी सक्रिय होती दिखती है जब सत्ता को किसी नई “सफाई” की भाषा गढ़नी हो। भ्रष्टाचार, फर्जी पहचान, अनियमितता और दागी रिकॉर्ड—ये शब्द तभी याद आते हैं जब उनका उपयोग किसी वर्ग, किसी समुदाय, किसी पेशे या किसी असुविधाजनक तबके को घेरने के लिए उपयोगी हो। पत्रकारों के मामले में भी यही खतरा है। यदि प्रशासन सचमुच मान्यता व्यवस्था को दुरुस्त करना चाहता है, तो उसे यह स्पष्ट करना होगा कि क्या वही सख़्ती सत्ता-निकट, मुख्यालय-समर्थित और प्रभावशाली पत्रकारों पर भी लागू होगी, या यह सख़्ती केवल जिलों तक सीमित रहेगी। यही चयनात्मकता व्यवस्था को खोखला करती है।
यह भी उतना ही सच है कि पत्रकारिता केवल अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी है। पत्रकार की मान्यता कोई निजी विशेषाधिकार नहीं; वह जनहित में सूचना-कार्य की सामाजिक स्वीकृति है। इसलिए पत्रकारों से भी अनुशासन, सत्यनिष्ठा और पेशेवर मर्यादा की अपेक्षा की जानी चाहिए। पर इसी के साथ यह भी उतना ही अनिवार्य है कि सरकार पत्रकारों को वर्गीकृत नागरिक नहीं, समान अधिकारों वाले पेशेवर माने। यदि किसी पर मुकदमा दर्ज है, तो न्यायिक प्रक्रिया चले। यदि मान्यता नियमों के अनुसार रद्द हुई है, तो उसका कारण सार्वजनिक हो। यदि किसी को छूट दी गई है, तो उसका आधार भी सामने आए। अँधेरे में किया गया सत्यापन, पारदर्शिता नहीं कहलाता।
यहीं से इस मुद्दे का बड़ा वैचारिक अर्थ निकलता है। यह केवल पत्रकारों की सूची का मामला नहीं, लोकतांत्रिक निगरानी का मामला है। आज पत्रकारों पर डेटा माँगा जा रहा है, कल वकीलों, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं या अन्य असुविधाजनक पेशों पर भी इसी तरह की चयनात्मक निगाह टिक सकती है। इसलिए सवाल व्यक्तियों का नहीं, सिद्धांतों का है। सरकारें बदलती हैं, विभागीय पत्र आते-जाते हैं, लेकिन संस्थागत मानदंडों की परीक्षा नहीं बदलनी चाहिए। समानता का अर्थ यही है कि शुचिता की माँग सब पर बराबर हो।
इस मामले में सबसे ज़रूरी बात यह है कि सरकार यदि वास्तव में व्यवस्था सुधारना चाहती है, तो उसे अपनी निगरानी को केवल जिलों तक सीमित नहीं रखना चाहिए। लखनऊ, राज्य मुख्यालय और अन्य उच्चस्तरीय मान्यताओं का रिकॉर्ड भी उतनी ही पारदर्शिता से सार्वजनिक होना चाहिए। तभी यह माना जाएगा कि सरकार एक नैतिक सुधार अभियान चला रही है, न कि एक ऐसी छँटाई प्रक्रिया, जिसमें असुविधाजनक पत्रकारों पर शिकंजा और अनुकूल पत्रकारों पर मौन रहे।
अंततः, पत्रकारिता पर निगाह रखना लोकतंत्र का अपराध नहीं है; लेकिन पत्रकारिता को केवल निगाह में रखना, और सत्ता को निगरानी से बाहर रखना—यही लोकतांत्रिक असंतुलन है। जो राज्य पारदर्शिता की बात करता है, उसे पहले अपने ही दर्पण में झाँकना होगा। अन्यथा यह कवायद सुधार नहीं, संदेह पैदा करेगी।
“सच्ची पारदर्शिता वही है, जो नीचे से ऊपर तक एक-सी हो। वरना डेटा केवल चयनात्मक दबाव का दूसरा नाम बन जाता है।”

