…….पण्डित प्रदीप शुक्ल
सावन का आरम्भ होता है तो केवल ऋतु नहीं बदलती, मनुष्य के भीतर भी एक अदृश्य परिवर्तन आरम्भ हो जाता है। तपती धरती पर पहली फुहार पड़ते ही जैसे एक सूखा हुआ वाक्य अचानक कविता में बदल जाए, जैसे लंबे मौन के बाद किसी वीणा का पहला स्वर उठे, वैसे ही सावन प्रकृति के समूचे विधान में एक नया आलोक, एक नई लय और एक नया स्पंदन भर देता है। यह महीना केवल वर्षा का महीना नहीं; यह पृथ्वी की प्यास, आकाश की करुणा, मेघों की गम्भीरता और हरियाली की नवजात मुस्कान का सम्मिलित उत्सव है।
भारतीय ऋतुओं में सावन का स्थान अत्यंत विलक्षण है। ग्रीष्म की प्रचंडता और वर्षा की कोमलता के बीच यह वह पुल है, जहाँ प्रकृति अपनी कठोरता उतारकर सौम्यता धारण करती है। दिन का ताप घटने लगता है, हवा में मिट्टी की सोंधी गंध घुल जाती है, दूर क्षितिज पर काले-भूरे बादल किसी अपरिचित कवि की गहरी पंक्तियों की तरह उतरते हैं और फिर जब बूंदें बरसती हैं, तो लगता है जैसे आकाश ने धरती के माथे पर शीतल आँचल रख दिया हो। सावन में धरती भीगती है, पर उससे अधिक भीगता है मन।
सावन का काव्य-तत्त्व इसी भीगने में छिपा है। यह ऋतु मनुष्य की इंद्रियों को ही नहीं, उसकी स्मृतियों को भी गीला करती है। वर्षा की एक बूँद केवल जल नहीं होती; वह कहीं खोया हुआ बचपन लौटाती है, कहीं किसी अनकहे प्रेम की आह जगाती है, कहीं खेतों में झुकती फसलों के साथ कृषक की उम्मीद को हरा करती है, और कहीं मंदिर की सीढ़ियों पर रखे जलकलशों में श्रद्धा का उजास भर देती है। सावन के भीतर प्रकृति का संगीत भी है और जीवन का संकेत भी।
कृषक के लिए सावन धरती की कोख में सपने बोने का समय है। वह खेत जो ग्रीष्म में फटकर शुष्क हो गया था, अब वर्षा के स्पर्श से पुनः जीवित होने लगता है। फसल केवल अन्न नहीं बनती, वह विश्वास बनती है। हल की रेखाएँ बारिश में चमकती हैं, बीज का छोटा-सा कण भविष्य की विशाल आशा में बदल जाता है। सावन किसान के लिए केवल मौसम नहीं, जीवन की पुनर्रचना है। वह जानता है कि मेघ अगर बरसें, तो हरियाली केवल खेतों में नहीं, उसके जीवन में भी उतर आती है।
प्रेमियों के लिए सावन का अर्थ और भी कोमल हो जाता है। बसंत के बाद यदि कोई दूसरा सबसे अनुकूल मौसम प्रेम के लिए है, तो वह सावन ही है। इस ऋतु में प्रेम वाणी की जरूरत कम और अनुभूति की जरूरत अधिक रखता है। बादल जब बिना रुके बोलते हैं, तो प्रेमी भी चुप्पी में अधिक अर्थ खोजते हैं। बरसात की रातों में खिड़की के पार झांकती बूँदें, टपकती छतें, भीगी पगडंडियाँ, और दूर कहीं से आती कजरी की मद्धम तान—सब मिलकर विरह और मिलन दोनों की समानांतर कथा रचते हैं। साहित्य ने भी सावन को कभी केवल ऋतु नहीं माना; वह तो प्रेम की भाषा का एक अनिवार्य अध्याय रहा है। जहाँ मिलन है, वहाँ उल्लास है; जहाँ विरह है, वहाँ स्मृति है; और जहाँ स्मृति है, वहाँ कविता है।
युवाओं के लिए सावन उमंग का मौसम है। यह वह समय है जब जीवन में एक अनाम चंचलता उतरती है। भीगे रास्तों पर चलना, छतों पर खड़े होकर बरसात देखना, पेड़ों की पत्तियों से फिसलती बूंदों को ताका करना, हवा में तैरते बादलों को देखना—ये सब ऐसे अनुभव हैं जो मन को किसी पुराने, मधुर और अव्याख्येय आनंद से भर देते हैं। सावन युवाओं को भीतर से खिलाता है। यह ऋतु उन्हें बताती है कि जीवन केवल उपलब्धियों की सूची नहीं, एक अनुभूति भी है; और अनुभूति अक्सर बारिश की पहली महक में मिलती है।
लड़कियों के लिए सावन झूले का महीना है। पेड़ों से बंधे झूले, हरी चूड़ियाँ, मेंहदी की शीतल गंध, गीतों की गूँज और सहेलियों की हँसी—इन सबमें सावन एक लोक-नाट्य जैसा प्रतीत होता है। झूले पर बैठी कन्या जब आकाश की ओर उड़ती है, तो वह केवल ऊपर-नीचे नहीं होती; वह अपने सपनों, अपनी कल्पनाओं, अपने भावी जीवन और अपने मन के अनाम रोमांच को भी हवा में झुलाती है। सावन का झूला भारतीय लोक-संस्कृति में केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि स्त्री-मन के उल्लास का प्रतीक है।
बच्चों के लिए सावन कागज की नावों का मौसम है। कीचड़, पानी, फिसलन और हँसी—सब एक साथ। वह नाव जो कागज की होती है, पर कल्पना में महासागर पार कर सकती है; वह छोटी-सी खिलखिलाहट जो अचानक बारिश में फूटती है, और फिर देर तक बरसाती धुन पर थिरकती रहती है—इन्हीं सब से बचपन का सावन बनता है। शायद इसलिए सावन केवल प्राकृतिक ऋतु नहीं, स्मृति की ऋतु भी है। हर वयस्क के भीतर एक बच्चा होता है, और सावन उसे फिर से भीगा देता है।
नवविवाहिताओं के लिए सावन एक अलग भावभूमि रचता है। यह मौसम उन्हें मायके की गलियों, आँगन की यादों, सहेलियों की बातें, और उन अनगिनत रिश्तों की ओर लौटाता है जिन्हें विवाह के बाद दूरी ने कुछ देर के लिए मौन कर दिया होता है। कजरी गीतों में स्त्री-मन की विरह-व्यथा, स्नेह, प्रतीक्षा और सौंदर्य का अद्भुत मिश्रण मिलता है। सावन में गाए जाने वाले लोकगीत केवल गान नहीं, स्त्री-जीवन के सामाजिक और भावनात्मक दस्तावेज भी हैं। उनमें प्रेम है, पीड़ा है, चंचलता है, अधूरी चाहत है, और अपनेपन की वह तापस है जो केवल लोक-संवेदना में ही इतनी सजीव बनती है।
बुज़ुर्गों के लिए सावन का अर्थ कुछ और है। उनके लिए यह मौसम खिड़की के पास बैठकर चाय की चुस्कियों में डूब जाने का, पुरानी यादों की गठरी खोलने का, बीते हुए वर्षों के संगीत को फिर से सुन लेने का समय है। बरसात की आवाज़ में उन्हें अपने बचपन के आँगन सुनाई देते हैं, अपने युवा दिनों की गलियाँ दिखती हैं, अपने खोए हुए लोग याद आते हैं। वे जानते हैं कि सावन केवल वर्तमान नहीं, अतीत का भी मौसम है। यह भीतर की स्मृति को भिगो देता है और जीवन को एक नई करुणा देता है।
धार्मिक दृष्टि से तो सावन शिव का प्रिय मास माना गया है। यह महीना भक्ति का, संयम का, उपासना का और जलाभिषेक का महीना है। पवित्र नदियों का जल लेकर भक्त शिवालयों की ओर चलते हैं, कांवड़ उठाते हैं, “बोल बम” के स्वर से पथ को गुंजायमान करते हैं, और शिवलिंग पर जल चढ़ाकर अपने अंतर्मन की थकान, इच्छा, आशंका और पाप-बोध को अर्पित कर देते हैं। शिव सावन के देवता हैं, क्योंकि शिव स्वयं शीतलता, संहार और करुणा के सम्मिलित रूप हैं। जब वर्षा धरती को शीतल करती है, तब शिव का स्वरूप और अधिक सहज रूप से समझ में आता है।
सावन के भीतर लोक और शास्त्र, प्रेम और भक्ति, प्रकृति और संस्कृति, स्मृति और वर्तमान—सब एक साथ मिलते हैं। यही कारण है कि यह महीना भारतीय जीवन की सबसे बहुरंगी ऋतुओं में से एक है। इसमें खेत भी हैं, मेघ भी; मंदिर भी हैं, झूले भी; गीत भी हैं, आँसू भी; बालपन भी है, प्रौढ़ता भी; और ईश्वर की आराधना भी है, मनुष्य की आकांक्षा भी। सावन अपने भीतर जीवन का समूचा वैभव समेटे हुए आता है।
और शायद यही सावन का सबसे बड़ा काव्य-तत्त्व है—वह सबके लिए कुछ न कुछ लेकर आता है। किसान के लिए आशा, प्रेमी के लिए विरह और मिलन, स्त्री के लिए गीत और झूला, बच्चे के लिए कागज की नाव, बुज़ुर्ग के लिए स्मृति, भक्त के लिए शिव, और थके हुए मनुष्य के लिए थोड़ा-सा विश्राम। सावन किसी एक वर्ग, एक भाव या एक विचार का महीना नहीं; वह संपूर्ण जीवन का महीना है।
इसलिए सावन को केवल मौसम की तरह नहीं, एक अनुभूति की तरह जिया जाना चाहिए। उसे देखना भी चाहिए, सुनना भी चाहिए, सूँघना भी चाहिए, और सबसे अधिक महसूस करना चाहिए। जब बरसात की पहली फुहार गिरती है, तो केवल धरती नहीं भीगती—मन भी भीगता है। और जब मन भीगता है, तो कविता जन्म लेती है।
“सभी मित्रों को उनके हिस्से का, उनकी प्रकृति का, उनकी स्मृति का, उनकी आस्था का और उनके प्रेम का सावन मुबारक।”


