……पण्डित प्रदीप शुक्ल
लोकतंत्र में संसद, अदालत और प्रेस—तीनों की अपनी-अपनी मर्यादा और जिम्मेदारी है। संसद सत्ता से सवाल पूछने की जगह है, अदालत न्याय की, और मीडिया जनता तक तथ्य पहुँचाने की। लेकिन जब समाचार का पहला काम तथ्य बताना न रहकर सत्ता के लिए सुविधा-संपन्न फ्रेम तैयार करना हो जाए, तब पत्रकारिता सूचना नहीं, व्याख्या-नियंत्रित प्रचार में बदलने लगती है। लोकसभा में परीक्षा सुधार विधेयक पर हुई बहस को लेकर अख़बारों की हेडलाइन-राजनीति इसी संकट को उजागर करती है।
विवाद का मूल प्रश्न साधारण था: देश के युवाओं, खासकर परीक्षार्थियों, के साथ बार-बार क्यों अन्याय हो रहा है? पेपर लीक, भर्ती में अनियमितता, परीक्षा-प्रणाली की अस्थिरता और उस पर सरकार की जवाबदेही—यही केंद्रीय मुद्दा था। संसद में कांग्रेस की ओर से गौरव गोगोई और प्रियंका गांधी ने यही प्रश्न उठाए। लेकिन कई अख़बारों ने बहस के इस केंद्र को पीछे धकेलकर बहस की तकरार, असंसदीय शब्दावली, या मंत्री के प्रतिवाद को ही शीर्षक बना दिया। यह केवल संपादकीय चयन नहीं, सूचना की प्राथमिकता का सवाल है।
अमर उजाला जैसी बड़ी हिंदी मीडिया संस्था की लीड यदि “पेपर लीक पर तकरार” बनती है, तो यह अपने-आप में एक सीमित फ्रेम है। तकरार हुई, यह सही है। लेकिन तकरार किस पर हुई, क्यों हुई, और उसका सार्वजनिक महत्व क्या है—यह अधिक महत्वपूर्ण है। यदि चर्चा का केंद्रीय प्रश्न छात्रों के भविष्य पर है, तो हेडलाइन को उसी दिशा में जाना चाहिए। संसद में किसी नेता की एक तीखी टिप्पणी से ज़्यादा ज़रूरी यह था कि देश यह जाने कि परीक्षा-प्रणाली की विफलता पर सरकार का ठोस उत्तर क्या है। हेडलाइन जब टकराव को केंद्र में लाती है और मुद्दे को हाशिये पर रख देती है, तो पत्रकारिता अपनी नैतिक प्राथमिकता खो देती है।
फिर एक और समस्या सामने आती है—चयनात्मक उद्धरण। यदि किसी सांसद का कथन कार्यवाही से हटाया गया, तो अख़बार का दायित्व है कि वह या तो उस कथन का संदर्भ दे, या कम-से-कम यह बताए कि क्या कहा गया था और किस वजह से हटाया गया। केवल यह लिख देना कि “हंगामा हुआ” या “बयान पर विवाद हुआ” पर्याप्त नहीं। मीडिया का काम आधा सच छापना नहीं, पूरे सच की ओर बढ़ना है। अगर बयान मौजूद है, सोशल मीडिया पर उपलब्ध है, संसद के बाहर उसकी चर्चा हो रही है, तो पाठक को उससे वंचित रखना पाठक के अधिकार का हनन है।
यहीं से पत्रकारिता और प्रचार में फर्क शुरू होता है। पत्रकारिता वह है जो असुविधाजनक तथ्य को भी सामने रखे। प्रचार वह है जो असुविधाजनक तथ्य को हेडलाइन से बाहर कर दे। अगर प्रियंका गांधी ने प्रधानमंत्री से “कैमरे का एंगल नहीं, दिल का एंगल बदलने” जैसी टिप्पणी की, तो वह भी खबर है। यदि उस पर हंगामा हुआ, तो वह भी खबर है। यदि टिप्पणी हटाई गई, तो यह भी खबर है। लेकिन सबसे बड़ी खबर यह नहीं कि संसद में कौन-सी पंक्ति हटाई गई; सबसे बड़ी खबर यह है कि छात्रों की पीड़ा पर सत्ता क्या जवाब देती है। जब मीडिया यह क्रम उलट देता है, तब वह अपने पाठक के साथ न्याय नहीं करता।
कुछ अख़बारों ने इस मामले में अपेक्षाकृत बेहतर संतुलन दिखाया। जिन शीर्षकों में छात्र-प्रदर्शन, पुलिस कार्रवाई, अदालत की निगरानी, हिरासत में लिए गए नाबालिगों, या जांच के प्रश्न को प्रमुखता मिली, वहाँ पत्रकारिता की गंभीरता दिखी। वहाँ हेडलाइन ने बताया कि मुद्दा केवल संसदीय शोर नहीं, राज्य-शक्ति की जवाबदेही है। इसके विपरीत जहाँ हेडलाइन ने केवल “प्रियंका के बयान पर हंगामा” या “तकरार” को प्राथमिकता दी, वहाँ समाचार की धार कुंद हो गई। यह विचारधारा का प्रश्न जितना है, उतना ही संपादकीय विवेक का भी।
मीडिया की एक और बड़ी जिम्मेदारी है—सत्ता और विपक्ष दोनों के शब्दों को समान कसौटी पर रखना। अगर किसी विपक्षी नेता की एक तीखी टिप्पणी को “असंसदीय” कहकर बार-बार रेखांकित किया जाता है, लेकिन सत्ता पक्ष की तथ्यहीन सफाइयों, टालू जवाबों या अधूरे स्पष्टीकरणों को सहज मान लिया जाता है, तो संतुलन टूट जाता है। पत्रकारिता का काम भाषा पुलिस बनना नहीं; उसका काम सत्य, संदर्भ और जिम्मेदारी की पुलिस बनना है।
लोकतंत्र में भाषा की मर्यादा महत्वपूर्ण है। लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है सत्य की मर्यादा। यदि कोई मंत्री या सरकार परीक्षा-प्रणाली की विफलता, पुलिस कार्रवाई, या छात्रों पर बल प्रयोग जैसे गंभीर प्रश्नों पर स्पष्ट जवाब देने से बचती है, तो समस्या केवल विपक्ष की भाषा नहीं, सत्ता की जवाबदेही भी है। मीडिया को दोनों पर समान कठोरता रखनी चाहिए। एक तरफ टिप्पणी के शब्दों को नापना और दूसरी तरफ मुद्दे को भुला देना—यह पत्रकारिता नहीं, चयनात्मक नैतिकता है।
पेपर-लीक, छात्र-प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई ऐसे विषय हैं जिन पर देश को साफ़, खुली और निर्भीक रिपोर्टिंग चाहिए। इस तरह के मुद्दों पर अखबारों का पहला कर्तव्य सत्ता को सहज करना नहीं, पाठक को सुसूचित करना है। यदि विद्यार्थी सड़क पर हैं, अदालत तक गुहार पहुँची है, पुलिस-कार्रवाई पर सवाल हैं और संसद में हंगामा है, तो अख़बार का शीर्षक इन सबकी आत्मा को पकड़ना चाहिए। केवल वही शीर्षक जिम्मेदार होगा जो पाठक को बताये कि असल लड़ाई किस पर है—कथनों पर नहीं, व्यवस्था पर।
आज की पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ा संकट यही है कि वह घटनाओं का ब्यौरा दे रही है, लेकिन अर्थ का चयन किसी और के लिए छोड़ रही है। जबकि एक संपादकीय समाज को अर्थ देता है, और हेडलाइन उस अर्थ की पहली घोषणा होती है। अगर हेडलाइन सजावटी हो, टकराव-प्रिय हो, या सत्ता-सुविधाजनक हो, तो समाचार का जनहित कमजोर पड़ जाता है।
देश को ऐसी मीडिया की जरूरत है जो संसद में उठे प्रश्न को उसके मूल रूप में देखे—युवाओं के भविष्य, परीक्षा-प्रणाली की ईमानदारी, पुलिस की जिम्मेदारी, और सरकार की जवाबदेही के रूप में। इस बहस में सबसे ज़रूरी बात यह है कि पाठक को यह बताया जाए कि कौन-सा प्रश्न उठाया गया, किसने उठाया, क्यों उठाया, और सरकार ने उसका क्या उत्तर दिया। जब तक यह चारों बातें साफ़ नहीं होंगी, तब तक रिपोर्टिंग अधूरी रहेगी।
अंततः यह केवल प्रियंका गांधी, गौरव गोगोई, या किसी मंत्री की बहस नहीं है। यह मीडिया की परीक्षा है। क्या अख़बार सत्ता की सुविधा के अनुसार समाचार चुनेंगे, या जनता के हित के अनुसार? क्या वे हंगामे को खबर बनाएंगे, या मुद्दे को? क्या वे भाषा के शोर को प्राथमिकता देंगे, या युवाओं के भविष्य को?
लोकतंत्र में सबसे खतरनाक बात यह नहीं कि नेता शोर मचाएँ। सबसे खतरनाक बात यह है कि मीडिया शोर को ही खबर मानने लगे।
“संसद में सवाल उठाना राजनीति है, लेकिन सवाल को हेडलाइन से गायब कर देना पत्रकारिता का संकट है। समाचार वही है जो जनता को मुद्दा बताए, सत्ता को राहत नहीं।”


